कुछ ना भी हुआ तो क्या होगा?
मैं चलते-चलते रुक जाऊँगी।
रुककर मैं शायद देर से चल पाऊँगी,
अपनी कहानी को दुनिया के सामने, देर से रख पाऊँगी।
इसी झुंझलाहट में,
मैं मायूसी के ग़म में बह जाऊँगी।
मुझसे आगे बहुत सारे लोग निकल जाएँगे,
पहले वो अपनी कहानी सबको सुनाएँगे।
इन सबके बीच भी मैं मुस्कुराऊँगी,
अपनी बारी में, मैं फिर खड़ी हो जाऊँगी।
मुझसे बेहतर भला,
मेरी कहानी कौन बताएगा?
अंधेरे के साये में,
उम्मीद का दिया मुझसे बेहतर कौन जलाएगा?
मेरे सपनों को नए रंगों से,
मेरे अलावा और कौन सजाएगा?
आज कुछ ना भी हुआ तो क्या होगा?
कल फिर आएगा।
नए पंखों को नई उड़ान मिलेगी,
जीत की एक और नई कहानी मिलेगी।
जिसमें सिर्फ़ मैं और मेरी जीत होगी,
हार के बाद की एक मुकम्मल कहानी होगी।
Anupama Arya

