Sahitya Samhita

Sahitya Samhita Journal ISSN 2454-2695

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कुछ ना भी हुआ तो क्या होगा? What Happens


 

कुछ ना भी हुआ तो क्या होगा?

मैं चलते-चलते रुक जाऊँगी।
रुककर मैं शायद देर से चल पाऊँगी,
अपनी कहानी को दुनिया के सामने, देर से रख पाऊँगी।
​इसी झुंझलाहट में,
मैं मायूसी के ग़म में बह जाऊँगी।
मुझसे आगे बहुत सारे लोग निकल जाएँगे,
पहले वो अपनी कहानी सबको सुनाएँगे।
​इन सबके बीच भी मैं मुस्कुराऊँगी,
अपनी बारी में, मैं फिर खड़ी हो जाऊँगी।
मुझसे बेहतर भला,
मेरी कहानी कौन बताएगा?
​अंधेरे के साये में,
उम्मीद का दिया मुझसे बेहतर कौन जलाएगा?
मेरे सपनों को नए रंगों से,
मेरे अलावा और कौन सजाएगा?
​आज कुछ ना भी हुआ तो क्या होगा?
कल फिर आएगा।
नए पंखों को नई उड़ान मिलेगी,
जीत की एक और नई कहानी मिलेगी।
​जिसमें सिर्फ़ मैं और मेरी जीत होगी,
हार के बाद की एक मुकम्मल कहानी होगी।

Anupama Arya