सुबह की वो घंटी, नींद से जगाती थी,
माँ की आवाज़ में
ही दुनिया बस जाती थी।
कंधे पे बस्ता, सपनों
से भरा हुआ,
काग़ज़ की नावों में
कल तैरा हुआ।
स्कूल चले हम,, स्कूल
चले हम,
मिट्टी की खुशबू, काग़ज़ी
से ग़म।
ना नंबर का डर,
ना वक़्त की रेस,
हँसी में छुपा था
हर एक केस।
स्कूल चले हम,, स्कूल
चले हम।
टिफ़िन खोलते ही दोस्ती महकती
थी,
एक पराठा, चार हिस्से – यही
दौलत लगती थी।
पीरियड के बीच वो
मैदान की शान,
एक गोल में जीत,
एक हार में जान।
स्कूल चले हम,, स्कूल
चले हम,
बेंच पे लिखे नाम,
दिल के थे सनम।
होमवर्क अधूरा, बहाने हज़ार,
फिर भी वो दिन
थे सबसे बेमिसाल।
टीचर की डाँट में
भी अपनापन था,
गलती पे समझाना, यही
तो बचपन था।
रिज़ल्ट के दिन की
धड़कन याद है,
पास हो गए तो
पूरा मोहल्ला साथ है।
आज कैलेंडर बदला, ज़िम्मेदारियाँ बढ़ीं,
पर उस यूनिफ़ॉर्म में
आज भी रूह अटकी।
ना मोबाइल था, ना स्क्रीन
की कैद,
फिर भी हर पल
था सबसे ज़्यादा लाइव।
स्कूल चले हम,, स्कूल
चले हम,
खोया जो बचपन, ढूँढ
लें हर दम।
वो दोस्त, वो मैदान, वो
पहली जीत,
यादों की क्लास में
आज भी हूँ मैं
सीट।
अगर मिल जाए फिर
से वो एक सुबह,
तो कहूँगा मुस्कुरा के —
स्कूल चले हम…
By Sahil

