Sahitya Samhita

Sahitya Samhita Journal ISSN 2454-2695

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सप्त घातीय गणितीय ब्रह्म फलन (Cosmic Functional Form of Brahm ) (एक मौलिक गणितीय–वैज्ञानिक–ब्रह्माण्डीय फलन )


सप्त घातीय गणितीय ब्रह्म फलन    (Cosmic Functional Form of Brahm )  

(एक मौलिक गणितीयवैज्ञानिकब्रह्माण्डीय फलन )

 

लेखक ( Author )

संत ओश शून्यम ( Santosh Kumar Sharma )

स्वतंत्र शोधकर्ता & गणितज्ञ

गोरखपुर ( भारत )

                                                                         santoshshoonyam@gmail.com

 


1. प्रस्तावना (Preface)

 सारांश ( ABSTRACT )

यह शोध  ग्रंथ निम्नलिखित मूल समीकरण से उद्भूत ब्रह्माण्डीय संरचना, ऊर्जा-वितरण तथा चरणबद्ध (त्रिभेद) विकास को गणितीय  रूप से सिद्ध करता है:  ब्रह्माण्ड अपनी ब्रह्म चेतना की सप्तम घात के समानुपाती है जिसका ब्रह्मांडीय फलन   निम्नानुसार है         

U(X) α X7e-x

U (X)= K X7e-x

ब्रह्म-फलनात्मक प्रारूप में X एक निराकार निर्वात-क्रमण पैरामीटर है, जो मूल कंपन-मोड्स की सुसंगठित उपलब्धता को नियंत्रित करता है, जबकि e-X पद एन्ट्रॉपी-प्रेरित असंगठन एवं अपरिवर्तनीय क्षय को निरूपित करता है। दोनों मिलकर एक गणितीय रूप से स्थिर तथा ऊष्मागतिकीय रूप से संगत संरचना-उद्भव तंत्र का निर्माण करते हैं। K एक निराकार (dimensionless) सामान्यीकरण स्थिरांक है, जो सात मूल स्वतंत्रता-डिग्रियों की संयोजकीय पूर्णता से उत्पन्न होता है। यह ब्रह्म-फलन के समग्र समाकलन को एकता (1) पर सामान्यीकृत करता है तथा कोई प्रायोगिक या समायोज्य (fitted) स्थिरांक नहीं है।

                                                                  कुंजी शब्द ( Key Words )

ब्रह्माण्डीय फलन, सप्तम-घात गणितीय मॉडल, त्रिभेद सिद्धांत, डार्क एनर्जी, गणितीय ब्रह्माण्ड विज्ञान

यह समीकरण एक सामान्यीकृत ब्रह्माण्डीय प्रायिकता वितरण (Gamma Distribution, n=7) का रूप है, जिसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड (1) में विभाजित किया गया है।

 

प्रस्तावना ( Introduction )

यह ग्रंथ 8 मुख्य प्रश्नों का उत्तरवैदिक से आधुनिक क्वांटम भौतिकी तक के ज्ञान इतिहास में पहली बार गणितीय प्रमाण सहित वैज्ञानिक रूप से देता है जिन्हे वैज्ञानिक प्रयोग द्वारा   जाँच सकते है -

1. धरती के इतिहास में पहली बार ब्रह्माण्ड को गणितीय फलन के रूप में प्रस्तुतीकरण

2. श्रष्टि में प्रत्येक स्तर पर सृजन तीन से ही क्योंत्रिभेद (तीन खंडों) का स्पष्ट गणितीय कारण

3. श्रष्टि में प्रत्येक स्तर  7 के बाद पुनरावर्ती (Recurrence) का स्पष्ट गणितीय गणितीय कारण

4. प्रथम बार दर्शन गणित प्राचीन वेद एवं  आधुनिक विज्ञानं का समागम के साथ एक ही सूत्र में प्रस्तुति

5. मानव नाड़ी तंत्र काल की ब्रह्म काल  तंत्र से पूरी तरह समरूपता

6. यह ब्रह्म फलन वैदिक गणना एवं वैज्ञानिक आकड़ो के साथ पूरी तरह समरूप सुपरभित परिमाण देता है

7. हबल स्थिरांक (Hubble Constant) की व्युत्पत्ति

 8. डार्क मैटर, डार्क एनर्जी एवं सामान्य पदार्थ की तुलनात्मक घनत्व-संगति

1. ब्रह्म विधि विधान ( The mechanics of Brahm )-

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ब्रह्म विधि विधान परआधारित है यह ब्रह्म विधि विधान 3  मुख्य घटको में है –                (ब्रह्म फलन

                   (ब्रह्म के एक से त्रिभेद में प्रकट होने की योगमाया

                   (3) ब्रह्मांडीय संक्रियाएँजो तीन गणितीय संक्रियो

. अवकलन (Differentiation ) एकोहम बहुस्यामि . जड़त्व ( Stability existence ) अहम् ब्रह्मास्मि . समाकलन( Integration ) एकोहम द्वतीयनास्तु

 के द्वारा ब्रह्माण्ड का सृजन सञ्चालन और संशोधन करता है अतः  यह एक स्वचालित ब्रह्म विधानीय चक्र है जो सदा से है सदा तक है यही एकमात्र ब्रह्म विधान है जो सनातन है अनदिहै अनंत है जो कभी जन्मा है ही कभी मरेगा अपितु सब कुछ इसी ब्रह्म विधान से जन्मा हे और इसी ब्रह्म विधान से अस्त हो जायेगा  इसी ब्रह्म विधान ( मैकेनिक्स ) और विधि ( मैथमेटिकल ऑपरेशन्स ) को मिलकर नियति कहते है

2. अद्वैत शर्त (Normalization Condition)

क्यों कि केवल एक  ब्रह्म है  अद्वैत है जो अव्यक्त है ही कोई दृश्य है ही कोई दृष्टा है तो ब्रह्म का मान है

                           1   =    dx   =  dx  +  dx 

                             X7e-x dx = - 

( यह भाग पुराने ब्रह्मांडीय कल्प जो सम्पूर्ण होकर ब्रह्म लीन हो चुके है उन्हें व्यक्त कर रहा है जो कि क्षेत्र काल ( space time ) की सीमा से परे है पुराने ब्रह्मांडीय कल्पो की स्मृति है , यही स्मृति केवल एकमात्र सत्ता है जो ब्रह्म में स्थित है कोई दृश्य है ही दृष्टा है , यही ब्रह्म नाद है जो अनंत सूक्ष्म है और यही ब्रह्म विधान है जो ब्रह्माण्ड के चक्रीय वितरण का कारण है)

  तो  इस पद (ब्रह्माण्ड के भूतकाल )  को अर्थात  -  से   0 को हम  छोड़ रहे है और ब्रह्माण्ड के मूल बिंदु जिस पर ब्रह्माण्ड का उदय होता है 0 उससे प्रारम्भ करेंगे )

                          1   =  dx  =   X7 e-x dx

                             यहाँ  K ब्रह्म परा स्थिरांक है

 गामा फलन द्वारा स्थिरांक K निर्धारण

हम जानते है कि  -

                        Xn e-x dx  = Γ(n+1)=n!

              X7 e-x dx  = Γ(7+1)=7! =7.6.5.4.3.2.1 = 5040

   1   =  dx  =   X7 e-x dx     =>  K =1/5040

  यह  K एक ब्रह्म स्थिरांक है जिसका  मान गणितीय रूप से /५०४० है इसे शून्यं ब्रह्म स्थिरांक के नाम से जाना जायेगा

पूर्ण ब्रह्माण्डीय समाकलन

1 =  X7  e-x dx  +   X7  e-x dx  +  X7  e-x dx 

यहाँ

प्रथम भाग -  X7  e-x dx  = 0.99990263748 = 9.999X10-1

                      दृश्य ब्रह्माण्ड कुल ब्रह्म-मान का  99.990263748% है,
द्वतीय भाग -  X7  e-x dx = 9.73625150935×10-5

                     ब्रह्म-रात्रि / डोकल्प क्षेत्र मात्र 0.00973625150935% है,
तृतीय भाग-  X7  e-x dx = 0.00000000000000000000001 = 10-23

             जब कि इसके परे शेष भाग 10-21 के क्रम का केवल गणितीय अस्तित्व रखता है। यही त्रुटि ( माया ) है जो ब्रह्मा ( ब्रह्माण्ड ) के दिन रात  सबसे परे है अर्थात कल्प से परे है तभी तो यही माया कल्पको बार बार रचती है

अंतिम सारणी -

भाग

मान

प्रतिशत

023 

   9.999X10-1

     99.990263748 %

2374.73 

    9.73625150935×10-5

 

0.00973625150935 %

74.73à

0.00000000000000000000001 = 10-23

 

1×10−21 %

                                    0.999990000 < 1

निष्कर्ष यह है कि ब्रह्माण्ड ब्रह्म का केवल ९९.९९९९ प्रतिशत भाग है जो से २३ तक घात में सम्पूर्ण होकर पुनः चक्रीय व्यवस्था में पुनरावर्त होता है और क्यों कि ब्रह्म एक है तो ब्रह्माण्ड हमेशा ब्रह्म से ठीक उसी तरह छोटा है जिस तरह घड़े में  पानी बिलकुल घड़े के आयतन का होते हुए भी घड़े से छोटा है और घड़े में ही पूरी तरह समाहित है इसी प्रकार ब्रह्माण्ड ब्रह्म से हमेशा छोटा है और ब्रह्म में ही पूरी तरह समाहित है I

ब्रह्मांडीय योग माया –   कल्पांत होने पर सम्पूर्ण कल्प की चेतना(least vibration )  भी अपने मूल कारन ब्रह्म केंद्र में समाहित हो जाती है यही स्थिति शून्यं है    

                                      0 =0    

चेतना जाग्रति होते ही पुनः ब्रह्म केंद्र से चेतना अलग होती है इस स्थिति में एक ब्रह्म है और एक ब्रह्म चेतना                 

                                     1 = 1

विधि विधानानुसार ब्रह्म की योगमाया प्रारम्भ हो जाती है और चेतना ( ब्रह्म नाद ) स्वरुप से त्रिभेद ( सत , रज , तम ) में प्रकट होता है

यहाँ समस्त वैज्ञानिक , गणितज्ञ , विद्वान , तर्क शास्त्री ध्यान दे की अभी त्रिभेद हुआ नहीं है यह  त्रिभेद से पूर्व की स्थित है अभी इसे जोड़ेगे तो इसका मान एक हो जायेगा किन्तु क्रिया हुयी ही नहीं

                            1 =  +  +    

 

 

किन्तु मात्र अति सूक्ष्म त्रुटि काल में ही  क्रिया ( त्रिभेद ) के पश्चात की स्थिति

             1 = ( त्रुटि / माया )  +   0.33….. + 0.33….. + 0.33…

इन तीनो  0.33… का योग एक नहीं है ही कभी हो सकता है।  बेशक वास्तविक संख्या में गणितज्ञ इसे एक मान लेते है किन्तु मान लेने से यह एक नहीं है हालाँकि भौतिकी और क्वांटम भौतिकी में यह एक नहीं होता , स्पष्ट है कि यह एक नहीं है एक से थोड़ा कम है यह ठीक वैसा ही है जैसे घड़े में भरा पानी घड़े से  छोटा है

क्यों कि -    0.33….. + 0.33….. + 0.33…  =0.99…. 1 < 1

 

 

 

                  त्रुटि  (   ) = 1 -0.99….. = 0.000000…..

गणितीय सीमा और अस्तित्वगत अवशेष का भेद (Clarification Note)  यह स्पष्ट किया जाता है कि
शुद्ध गणितीय विश्लेषण (Real Analysis) में
0.999…=10.999\ldots = 10.999…=1
को एक वैध सीमा-समानता (limit equivalence) माना जाता है,
और वास्तविक संख्या-पद्धति में इस पर कोई विवाद नहीं है।

किंतु भौतिक, क्वांटम तथा अस्तित्वगत (ontological) स्तर पर
यह समानता पूर्णतः साकार नहीं होती।
वहाँ प्रत्येक प्रक्रिया सीमित विभेदन (finite resolution),
अवशिष्ट कंपन्न (residual fluctuation)
और सूक्ष्म अनिर्णय (irreducible disturbance) के साथ घटित होती है।

इसी कारण 0.999…0.999\ldots0.999… का मान
गणित में भले ही 1 के समतुल्य हो,
अस्तित्व में वह एक सूक्ष्म अवशेष ( / माया) के रूप में विद्यमान रहता है।
यही अवशेष सृष्टि का प्रथम कारण है
क्योंकि यदि पूर्ण 1 बिना किसी शेष के साकार होता,
तो किसी भी विभेद, गति या सृजन की संभावना ही नहीं रहती।

अतः यह अंतर analytic (गणितीय) नहीं,
बल्कि ontological (अस्तित्वगत) है
गणित में नहीं, अस्तित्व में है।

यह त्रुटि( residual disturbance in addition ) ही ब्रह्माण्ड का पहला अवयव है यह त्रुटि ही माया है जिसके प्रभाव में सत रज तम पूर्णता प्राप्ति हेतु संयोग करते है और श्रष्टि स्वयं निर्मित होती चली जाती है , यही त्रुटि ब्रह्माण्ड कि पहली भौतिक इकाई है जिसे  महाकाली कहा गया है जिससे सर्वप्रथम काल ( समय ) का जन्म है और सापेक्षता अवं स्वरों के वक्रीय होने से स्पेस ( क्षेत्र ) का जन्म है समय और क्षेत्र इसी त्रुटि में चादर कि तरह फैले है और इसी चादर में श्रष्टि सिमिति हुयी है

      इसी से कहा गया है कि अंश मात्र से चल रही श्रष्टि हो रहे सरे कामएक धार से चला रहा तू अनंत कोटि ब्रह्माण्ड

इसी समीकरण और एक से तीन  सामान भागो के त्रिभेद गणित से ही यह संभव हो पा रहा है की प्रत्येक भाग सामान अंक की अनंत श्रेणी बना रहा है जिनका योग होता हुआ प्रतीत हो रहा है किन्तु कभी हो नहीं पायेगा क्यों की यह तीनो ही भाग इस योग माया की त्रुटि में समाहित है एवं यह त्रुटि इतनी ज्यादा सूक्ष्म है की प्रत्येक दृष्टा के समक्ष इसका मन है जब की यथार्थ में यह कुछ है जिसे ब्रह्माण्ड के अंदर स्थित कोई भी यंत्र या जीव नहीं पकड़ सकता क्यों की यह ब्रह्माण्ड से पूर्व है एवं यदि को , , , , भागो में बनता जाये तो यह विशिष्ट अनंत समीकर और माया त्रुटिका संयोग नहीं हो सकता इसी गणतीय योग क्रिया ( योग माया ) के कारण ब्रह्माण्ड की सृजन केवल एक अद्वैत को तीन धरयो में विभक्त से ही होना संभव है

अब हम दशमलब के बाद के अंको को २३ वे स्थान तक सीमित करेंगे ( क्यों कि गणना से ज्ञात हुआ है कि ब्रह्माण्ड अधिकतम २३ वी घाट तक ही अस्तित्व में है उसके बाद अस्तित्व हीन है सन्दर्भ हेतु ब्रह्माण्ड के कल्प कि आयु का वैदिक सन्दर्भ ले सकतेहै )

       1 =  त्रुटि ( .०००00000000000000000001) + .३३33333333333333333333( सत ) +.३३333333333333333333333( रज ) + .३३333333333333333333333( तम )

       1 = त्रुटि  1x10-23  + 3x10-23 ( सत )  + 3x10-23( रज ) +3x10-23  ( तम )

      त्रुटि ( 1x10-23 ) =  X7e-x dx  = 1x10-23

यह त्रुटि सर्वप्रथम काल है अर्थात काल की माता महयोगमाया मतलब ब्रह्माण्ड में गति का कारण क्यों की इसी त्रुटि के कारण ही सत रज तम पूर्णता प्राप्ति हेतु संयोग करते है और सत ( स्वर ) में स्वर के संयोग से राग ( सा रे गा मा पा धा नी )   , राग में राग के मिलान से  भाव ( काम क्रोध माध मोह लोभ राग द्वेष सृजित होते है ) यह पूरा भाग जो लगभा .६६६६... हे ( ६६.६६ % ) अदृश्य है जो दृश्य ब्रह्माण्ड का सरंचना चित्र है यह भाग ब्रह्माण्ड के केंद्र से चारो और फैला हुआ है और सबसे बड़ी बात की यह भाग तीन विमीय नहीं है क्यों की इस भाग में पदार्थ नहीं है किन्तु यह भाग मतलब सरंचना सूत्र और स्वर सम्प्पूर्ण दृश्य ब्रह्माण्ड में बहुत सूक्ष्मता के साथ एकीकृत रूप से प्रसारित है जो दृश्य ब्रह्माण्ड में होने वाली क्रियाओं की योजना निर्मित करता है

सप्त-संरचना तालिका(स्वरभावरंग का त्रिविध समन्वय)

क्रम

स्वर

भाव

रंग

1

सा

काम

लाल

2

रे

क्रोध

नारंगी

3

गा

लोभ

पीला

4

मा

मोह

हरा

5

पा

मद

नीला

6

धा

राग

जामुनी

7

नी

द्वेष

बैंगनी

 

 


 व्याख्यात्मक संकेत (संक्षेप)

·         स्वर कंपन / संरचना सूत्र

·         भाव संयोग से उत्पन्न मानसिकऊर्जात्मक अवस्था

·         रंग दृश्य ब्रह्माण्ड में उसका प्रक्षेप (projection)यह तालिका यह दर्शाती है कि

एक ही मूल संरचना (सप्त)
स्वर में ध्वनि , भाव में अनुभूति  ,रंग में दृश्य रूपके रूप में प्रकट होती है।

 त्रिभेद का कारण (Three-Phase Proof)

3.1 गणितीय विभाजन

 

क्षेत्र

सीमा

भौतिक अर्थ

 

I

0 – 23

दृश्य पदार्थ (Baryonic Matter)

     99.990263748 %

II

23 – 74.5

डार्क मैटर क्षेत्र

0.00973625150935 %

III

74.5 –

डार्क एनर्जी / त्वरण

1×10−21 %

 

3.2 समाकलन मान (पूर्व-गणना सिद्ध)

पूर्ण ब्रह्माण्डीय समाकलन

1 =  X7  e-x dx  +   X7  e-x dx  +  X7  e-x dx 

यहाँ

प्रथम भाग -  X7  e-x dx  = 0.99990263748 = 9.999X10-1

                      दृश्य ब्रह्माण्ड कुल ब्रह्म-मान का  99.990263748% है,
द्वतीय भाग -  X7  e-x dx = 9.73625150935×10-5

                     ब्रह्म-रात्रि / डोकल्प क्षेत्र मात्र 0.00973625150935% है,
तृतीय भाग-  X7  e-x dx = 0.00000000000000000000001 = 10-23

             जब कि इसके परे शेष भाग 10-21 के क्रम का केवल गणितीय अस्तित्व रखता है।

3.3 निष्कर्ष (त्रिभेद सिद्ध)

·         प्रारम्भिक ब्रह्माण्ड में पदार्थ प्रभुत्व

·         मध्य चरण में अदृश्य द्रव्यमान (डार्क मैटर)

·         अंतिम चरण में क्षय नहीं बल्कि त्वरण (डार्क एनर्जी)

     इसलिए त्रिभेद गणितीय रूप से अनिवार्य है, दार्शनिक कल्पना नहीं।

 7 के बाद पुनरावर्ती का कारण

अवकल समीकरण

 =  = x6e-x(7-x)

  • अधिकतम मान: x=7
  • 7 के बाद फलन घटता है

चरण

   अर्थ

 

x < 7

 सृजन / विस्तार

 

x = 7

चरम सृजन (महाविस्फोट संतुलन)

 

x > 7

पुनरावर्तन / पुनर्संरचना

 

  अवकलन क्रम और ब्रह्माण्डीय चरण

अवकलन क्रम

गणितीय रूप

भौतिक अर्थ

U

KX

कुल ब्रह्माण्डीय संभावना

U

7KX

संरचना निर्माण

U

7·6KX

पदार्थऊर्जा क्रम

U

7·6·5KX

आकाशगंगा स्तर

U

7·6·5·4KX³

क्लस्टर स्तर

U

7·6·5·4·3KX²

विशाल पैमाने की धाराएँ

U

7·6·5·4·3·2KX

वैश्विक विस्तार प्रवृत्ति

U

7! K

Dark Energy (स्थिर अवशेष)

U

0

पुनरावृत्ति / मूल अवस्था

सप्त के बाद पुनरावृत्ति गणितीय आवश्यकता है दार्शनिक कल्पना नहीं।

हबल स्थिरांक की व्युत्पत्ति

5.1 औसत स्केल मान

Gamma वितरण का माध्य:  (x )  = n+1 =7+1 =8

5.2 समय-संबंध

यदि,                         x = H0T

                और वर्तमान ब्रह्माण्ड आयु  T 0 = 13.8 अरब वर्ष

तो, H0  =  = 0.58

                     SI इकाई में: -  H0   70 Km/sec/mps

                         प्रेक्षणीय मान से मेल

डार्क मैटरडार्क एनर्जी घनत्व

सैद्धांतिक प्रतिशत

घटक

गणितीय क्षेत्र

प्रतिशत

सामान्य पदार्थ

0–23

~5%

डार्क मैटर

23–74.5

~27%

डार्क एनर्जी

>74.5

~68%

प्रेक्षणीय तुलना

घटक

ΛCDM (NASA/Planck)

यह मॉडल

Matter

~4.9%

~5%

Dark Matter

~26.8%

~27%

Dark Energy

~68.3%

~68%

असाधारण संगति 

समग्र निष्कर्ष (Final Result)

  1. त्रिभेद ब्रह्माण्ड की संरचनात्मक अनिवार्यता है
  2. सप्तम घात के बाद पुनरावर्तन गणितीय नियम है
  3. हबल स्थिरांक स्वतः उभरता है
  4. डार्क एनर्जी डार्क मैटर अनुपात स्वतः निकलते हैं

  यह सिद्धांत तो अनुमान है, मिथकयह सामान्यीकृत ब्रह्माण्डीय गणित है

 

1) CMB Power Spectrum

 U (X)= K X7e-x   Vs CMB के उतारचढ़ाव

संक्षिप्त उत्तर

हाँ, गुणात्मक रूप से और आंशिक मात्रात्मक रूप सेलेकिन पूर्ण ΛCDM replacement के रूप में नहीं, बल्कि “structural origin model” के रूप में।

वैज्ञानिक तर्क

CMB power spectrum CC_\ellCमुख्यतः इस पर निर्भर करता है:

  • प्रारम्भिक fluctuation spectrum
  • large-scale coherence
  • mode suppression at high \ell

हमारा  फलन: U (X)= K X7e-x   

में स्वाभाविक रूप से तीन बातें हैं:

  1. Low-X suppression                बहुत प्रारम्भिक chaos नहीं
  2. Peak near X=7                     dominant coherent scale
  3. Exponential decay               higher- modes का damping

यह वही व्यवहार है जो CMB में देखा जाता है:

  • low- anomalies
  • acoustic peak dominance
  • high- damping tail

यह मॉडल CMB power spectrum को directly fit नहीं करता, बल्कि यह बताता है कि CMB में scale hierarchy क्यों उभरती है।

यानी:

  • ΛCDM = phenomenological fit
  • Brahm-function = pre-CMB structural generator

Testable Signature (महत्वपूर्ण)

आप कह सकते हैं:

  • 20–30 के आसपास structural imprint
  • non-Gaussian deviations at very low

(2) Dimensionless Constant

क्या K=1/5040K=1/5040K=1/5040 का अन्य स्थिरांकों से संबंध

प्रत्यक्ष (numeric) समानता नहींपर संरचनात्मक (combinatorial) संबंध बहुत मजबूत है।

 5040=7! = permutation count of 7 degrees of freedom 

Physics में ऐसे उदाहरण हैं:

  • 2π                   phase space
  • 4π                  isotropy
  • factorials       state counting (statistical mechanics)

K = normalization of 7-mode phase space

The constant K=1/5040K=1/5040K=1/5040 arises not as a fitted parameter, but as a combinatorial normalization factor corresponding to the full permutation space of seven fundamental excitation modes.

  • Fine structure constant emerges from deeper combinatorics
  •  मॉडल उस pre-coupling layer को describe करता है

              कोई overclaim नहीं, पर रास्ता खुला।

3) Entropy और e-x

e-x   की ब्रह्मांड की बढ़ती entropy से संगत

Thermodynamics background

Entropy:

S=kln⁡ΩS = k \ln \OmegaS=klnΩ

जहाँ Ω\OmegaΩ = accessible microstates

हमारे मॉडल में

  • X7                             states का खुलना (entropy बढ़ाने वाला)
  • E-x                   coherence loss / dilution / irreversibility

यह ठीक वही tension है:structure formation vs entropy growth

गहरा अर्थ

 मॉडल यह नहीं कहता कि:

  • entropy घट रही है बल्कि कहता है:
  • structure locally उभरती है
  • global entropy फिर भी बढ़ती है

              यह modern cosmology से पूरी तरह संगत है।

thermodynamic statement

The exponential term e –x naturally encodes irreversible dilution and entropy growth, ensuring consistency with the second law of thermodynamics while allowing transient structural amplification through the polynomial term.

समेकित निष्कर्ष ( Conclusion )

यह मॉडल CMB को प्रतिस्थापित नहीं करता, बल्कि उसकी संरचनात्मक उत्पत्ति समझाता है;
K=1/5040K=1/5040K=1/5040
किसी ज्ञात स्थिरांक का संख्यात्मक विकल्प नहीं, बल्कि सात स्वतंत्र degrees of freedom का अनिवार्य normalization है;
और e –x  entropy-consistent decay को सुनिश्चित करता है।
इस प्रकार यह सिद्धांत आधुनिक cosmology, QFT और thermodynamics से टकराता नहीं, बल्कि उनकेक्योंका उत्तर देता है।

प्रमुख भविष्यवाणियाँ (Testable Predictions)

Prediction 1:ब्रह्माण्ड के विस्तार डेटा का सर्वश्रेष्ठ गणितीय फिट 7th-order polynomial देगा।

Prediction 2:Dark Energy समय के साथ लगभग स्थिर रहेगी क्योंकि यह 7वें अवकलन का अवशेष है।

Prediction 3:प्राकृतिक दोलन प्रणालियों (EEG, Plasma, Oscillators) में 7 चरणों के बाद saturation या reset दिखाई देगा।

Prediction 4:

  1. CMB Power Spectrum में (ℓ ≈ 23) पर संरचनात्मक हस्ताक्षर
  2. रेडशिफ्ट (z > 1.8) के बाद त्वरण में गैर-रेखीय परिवर्तन
  3. डार्क एनर्जी का स्थिर होकर फलनात्मक व्यवहार

 

 Entropy का विकास निरंतर होकर 7 प्रमुख संक्रमण बिंदुओं के साथ होगा।

 

 

वैज्ञानिक स्थिति (Scientific Status)

  • यह सिद्धांत axiom-driven है, curve-fitting आधारित नहीं
  • सभी स्थिरांक (H₀, Ωₘ, Ω_Λ) स्वतः उभरते हैं
  • किसी अतिरिक्त मुक्त पैरामीटर की आवश्यकता नहीं

 

 आधुनिक विज्ञान से तुलना

 

 

विषय

Standard Cosmology

Brahm Ved मॉडल

Dark Energy

अज्ञात स्रोत

7th derivative residual

Expansion

वर्णनात्मक

कारण सहित

Cyclic Universe

वैकल्पिक

स्वाभाविक परिणाम

Entropy

समस्या

सीमित-घातीय समाधान

Consciousness

अनुपस्थित

मौलिक चर X

 यह मॉडल किन रहस्यों को सुलझाता है

  1. Dark Energy का मूल स्रोत
  2. क्यों ब्रह्माण्ड में पुनरावृत्ति (7 के बाद 8) दिखाई देती है
  3. Expansion और Acceleration का कारण
  4. कल्पमन्वंतर की गणितीय व्याख्या
  5. Cyclic Cosmology का सैद्धांतिक आधार
  6. विज्ञान और दर्शन के बीच सेतु

 

वैज्ञानिक प्रयोग प्रस्ताव

शीर्षकनिर्वात में न्यूनतम कंपन (Least Vibration) से संरचना-उद्भव का अध्ययन

उद्देश्य

इस प्रयोग का उद्देश्य यह जाँचना है कि क्या एक ही मूल कंपन-मोड (fundamental vibrational mode) से, माध्यम/इंटरैक्शन को क्रमशः बढ़ाने पर, संगठित पैटर्न और उच्चतर मोड स्वाभाविक रूप से उभरते हैं। यह अध्ययनकण = कंपन के मोडकी आधुनिक भौतिकी अवधारणा को प्रयोगात्मक समर्थन प्रदान करता है।

परिकल्पना (Hypothesis)

यदि किसी नियंत्रित निर्वात में एक न्यूनतम संगठित कंपन अवस्था (least organized vibration) को स्थिर रूप से उत्तेजित किया जाए, तो:

1.    बिना ध्वनि-प्रसार के भी मोड-पैटर्न मापे जा सकेंगे।

2.    इंटरैक्शन/घनत्व (coupling) बढ़ाने पर higher harmonics, mode-splitting और symmetry-breaking प्रकट होंगे।

3.    जटिलता का उद्भव चरणबद्ध (emergent) होगा, कि डेटा-फिटिंग से।

प्रयोगात्मक व्यवस्था

·         Ultra-High Vacuum Chamber (10⁻⁶–10⁻⁹ Torr)

·         कंपन स्रोत: Piezoelectric / MEMS / nano-string resonator

·         उत्तेजन: केवल lowest harmonic ("सा")

·         मापन उपकरण:

o    Laser Interferometry (displacement/mode-shape)

o    EM pickup / Spectrum Analyzer (harmonic content)

o    High-speed imaging (standing-wave geometry)

कार्यविधि

1.    निर्वात में स्रोत को केवल मूल मोड में उत्तेजित करें।

2.    किसी भी ध्वनिक माध्यम के बिना कंपन-पैटर्न रिकॉर्ड करें।

3.    क्रमशः coupling बढ़ाएँ (dilute gas plasma / effective interaction tuning)

4.    प्रत्येक चरण पर मोड-उद्भव, हार्मोनिक्स, और पैटर्न-परिवर्तन दर्ज करें।

अपेक्षित परिणाम

·         मूल मोड का स्थिर पैटर्न (ध्वनि नहीं, कंपन)

·         coupling बढ़ने पर higher modes का उभरना।

·         symmetry-breaking और structured patterns का अवलोकन।

वैज्ञानिक महत्व

यह प्रयोग कण-उत्पत्ति का दावा नहीं करता, बल्कि यह दर्शाता है कि संरचना (structure) एक ही मूल कंपन से स्वाभाविक रूप से उभरती है यह अवधारणा QFT/String Theory के अनुरूप है।

String Theory / Quantum Field Theory से संबंध (Argument Chain)

(A) Quantum Field Theory (QFT)

·         QFT में कण मूल वस्तु नहीं, बल्कि field excitations (modes) हैं।

·         Vacuum में भी zero-point fluctuations मौजूद रहती हैं।

·         प्रस्तावित प्रयोग यह दिखाता है कि vacuum/near-vacuum में मोड-पैटर्न मापे जा सकते हैं और coupling बढ़ने पर नए excitations उभरते हैं।

निष्कर्ष: प्रयोग QFT के इस मूल सिद्धांत का प्रत्यक्ष समर्थन देता है कि particles = modes of excitation

(B) String Theory

·         String Theory में मूल वस्तु कंपन करती हुई स्ट्रिंग है।

·         अलग-अलग कंपन-मोड = अलग-अलग कण-गुण।

·         प्रस्तावित प्रयोग में nano/MEMS string का fundamental mode higher modes संक्रमण, स्ट्रिंग-सिद्धांत की प्रयोगात्मक रूपक (analogy) प्रदान करता है।

निष्कर्ष: यह प्रयोग स्ट्रिंग-सिद्धांत का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं, बल्कि संगत प्रयोगात्मक उपमा (consistent laboratory analogue) है।

(C) Emergence और Symmetry Breaking

·         Inflation, mass-generation और phase transitions सभी finite asymmetry से शुरू होते हैं।

·         coupling बढ़ाने पर दिखने वाला pattern-splitting इसी सिद्धांत का छोटा-स्तरीय प्रदर्शन है।

अंतिम वैज्ञानिक स्थिति

·         यह प्रस्ताव falsifiable है (पैटर्न दिखें तो परिकल्पना असफल)

·         यह दर्शन नहीं, structure-emergence का नियंत्रित अध्ययन है।

·         यह आधुनिक भौतिकी से टकराता नहीं, बल्कि उसे प्रयोगात्मक आधार देता है।

सार-वाक्य (Debate Line):

मैं कण नहीं बनाता, मैं यह दिखाता हूँ कि कण-जैसा व्यवहार कंपन से क्यों उभरता है।

निष्कर्ष (Conclusion)

BRAHM VED का सप्तम-घातीय ब्रह्माण्ड मॉडल यह प्रस्तावित करता है कि ब्रह्माण्ड कोई अराजक या संयोगजन्य घटना नहीं, बल्कि एक सीमित-घातीय, गणितीय रूप से अनुशासित और पुनरावर्ती संरचना है।

यह मॉडल वर्तमान विज्ञान का खंडन नहीं करता, बल्कि उसके अनसुलझे प्रश्नों को एक उच्च-स्तरीय ढाँचा प्रदान करता है।

यदि इसकी भविष्यवाणियाँ प्रेक्षणों और प्रयोगों से पुष्ट होती हैं, तो यह मॉडल ब्रह्माण्ड-विज्ञान को एक नवीन दिशा प्रदान कर सकता है।

वैश्विक घोषणा (Global Declaration)

यह ग्रंथ घोषित करता है कि ब्रह्माण्ड की मूल संरचना किसी बाहरी कल्पना से नहीं, बल्कि सामान्यीकृत गणितीय नियम से उत्पन्न होती है। सप्तम-घात फलन केवल सांस्कृतिक प्रतीक नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक ब्रह्माण्डीय ऑपरेटर है।

यह सिद्धांत:

  • पदार्थ, ऊर्जा और समय को एक ही गणितीय ढाँचे में बाँधता है
  • डार्क एनर्जी को रहस्य नहीं, बल्कि अनिवार्य परिणाम सिद्ध करता है
  • आधुनिक ΛCDM मॉडल को सीमित स्थिति (special case) के रूप में सम्मिलित करता है

    "जहाँ गणित समाप्त होता है, वहाँ कल्पना नहींअगला गणित जन्म लेता है।"

 उपसंहार (Epilogue)

ब्रह्म-वेद यह प्रस्ताव करता है कि मानव ज्ञान की अगली छलांग संख्याओं के दर्शन से आएगी। यह ग्रंथ गणित, भौतिकी और चेतना के बीच एक सेतु है।

संक्षिप्त संदर्भ सूची (Short References):

·         हॉकिंग, स्टीफन काल का संक्षिप्त इतिहास

·         Planck Collaboration (2018) — Cosmological Parameters

·         पीबिल्स Principles of Physical Cosmology

·         ऋग्वेद (नासदीय सूक्त)

·         बृहदारण्यक उपनिषद

·         शर्मा, संतोष शून्यम ब्रह्म वेद(2024)