Sahitya Samhita

Sahitya Samhita Journal ISSN 2454-2695

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कौन हूँ मैं? Who Am I?


 

कौन हूँ मैं? अपने अंतर्मन की आवाज़ हूँ,

दर्पण हूँ, अपने कल के सपनों की।
अपनी ऊंची उड़ान की पंख हूँ,
खुशबू हूँ अपनी ही बगिया की।
​अपने ही सवालों का जवाब, उन जवाबों का शोर हूँ।
अपने जीवन की, जलती-बुझती दिए की लौ हूँ,
अपने ही जीवन की सर्वश्रेष्ठ कहानी, एक ज़िद्दी पतवार हूँ।
​अडिग हूँ अपनी बातों पर, अपने सुनहरे कल पर,
मैं भीड़ का हिस्सा नहीं, भीड़ से अलग हूँ।
अपने ही रास्ते की, एक अनोखी दास्तान हूँ,
'कौन हूँ मैं' के सवाल से अब बहुत आगे हूँ।
​अब फर्क नहीं पड़ता दुनियादारी और समाज से,
फर्क पड़ता है तो बस अपने 'होने' के एहसास से।
इस सरल जीवन को लोगों ने कठिन बनाया था,
मुश्किलों के वक्त मुझे बहुत डराया था।
​पर अब फर्क हार जाने से नहीं, खुद से रूठ जाने से पड़ता है,
फर्क औरों का नहीं, खुद से खुद का पड़ता है।
अब ये दिल दुनिया के शोर में नहीं खोता,
ये वजूद अब खुद अपनी ही धुन में जीता। 

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