Citation
यादव, . मेघना . (2026). एक कहानी यह भी:स्त्री अस्मिता का सामाजिक दस्तावेज़. Sahitya Samhita, 12(4), 1–9. https://doi.org/10.26643/rb.v118i1.7253
डॉ. मेघना यादव
असि. प्रोफेसर
हिन्दी विभाग
नवयुग कन्या
महाविद्यालय, लखनऊ।
Email-
meghanasneh@gmail,com
प्रस्तावना-
बीसवीं सदी के अंतिम दशकों का वैश्विक और भारतीय साहित्यिक परिदृश्य एक युगांतकारी परिवर्तन का साक्षी रहा है। इस दौर में साहित्य के केंद्र में वे विमर्श उभरकर आए, जिन्हें सदियों से वर्चस्ववादी सत्ता संरचनाओं ने हाशिए पर धकेल रखा था। स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और हिजड़ा समुदाय जैसे वंचित समूहों ने अपनी अस्मिता की खोज और सत्ता-केंद्रित सामाजिक जकड़न के विरुद्ध स्वर मुखर करना प्रारंभ किया। इन ‘अस्मितामूलक विमर्शों’ के मूल में वह पीड़ा, दमन और यथार्थ अनुभव थे, जिन्हें पारंपरिक साहित्य ने प्रायः उपेक्षित किया था। यह आलेख बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में उभरे ‘अस्मिता
विमर्श’ और विशेषकर स्त्री आत्मकथाओं के माध्यम से हाशिए के समुदायों की अभिव्यक्ति का विश्लेषण करता है। साहित्य में आत्मकथा केवल निजी जीवन का वृत्तांत न रहकर एक राजनीतिक-सामाजिक दस्तावेज़ बन गई है, जो दमित वर्गों को इतिहास में दर्ज होने का अवसर प्रदान करती है।
भारतीय समाज में स्त्री का संघर्ष ‘ब्राह्मणवादी
पितृसत्ता’ की दोहरी मार झेलने जैसा है, जहाँ जाति और जेंडर के हित परस्पर गुँथे हुए हैं। यह आलेख बुद्धकालीन ‘थेरियों’ से लेकर आधुनिक लेखिकाओं तक की लंबी परंपरा को रेखांकित करता है। विशेष रूप से मन्नू भंडारी की आत्मकथा ‘एक कहानी यह भी’ के माध्यम से यह पड़ताल की गई है कि कैसे एक शिक्षित और स्वावलंबी स्त्री को भी पुरुष के सामंती अहं और वैवाहिक संस्था के भीतर अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष करना पड़ता है। आलेख में यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि आत्मकथात्मक लेखन किस प्रकार हाशिए की आवाज़ों को समाज के मुख्य विमर्श में लाकर उन्हें इतिहास में दर्ज होने का अधिकार प्रदान करता है। आलेख का मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि स्त्री आत्मकथाएँ केवल पीड़ा का बयान नहीं, बल्कि वर्चस्ववादी संस्कृति के विरुद्ध एक कड़ा प्रतिरोध हैं।
कुंजी शब्द-
अस्मिता विमर्श, स्त्री विमर्श, स्त्री आत्मकथा, हाशिएकृत समाज, सामंती समाज, ब्राह्मणवादी पितृसत्ता, मन्नू भंडारी (एक कहानी यह भी), वैवाहिक
संस्था, लेखकीय अस्मिता।
मुख्य आलेख-
साहित्य में बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में हाशिए पर रह रहे विभिन्न वर्ग-समूहों की ‘अस्मिता
विमर्श’ का दौर प्रारंभ हुआ। जिनमें स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श, हिजड़ा विमर्श आदि वर्तमान समय के सबसे ज्वलंत, महत्त्वपूर्ण एवं अनिवार्य विमर्श हैं। इन विमर्शों में सत्ता केंद्रित वर्चस्ववादी जाति-वर्गों
के हाथों
सदियों से
दमित एवं
वंचित रहे
वर्गों द्वारा
भोगी गई
पीड़ा, दुखों तथा उनके यथार्थ अनुभवों की अभिव्यक्ति विभिन्न साहित्यिक विधाओं यथा कविता,
कहानी, उपन्यास, आत्मकथा आदि के माध्यम से हुई है। इनमें आत्मकथा विधा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक विधा है। वर्तमान समय में आत्मकथा हाशिएकृत समुदायों की आवाज़ बनकर उभरी है। अर्चना वर्मा कहती हैं कि— “आत्मकथा उन लोगों की अभिव्यक्ति का औज़ार बन चुकी है जो अभी तक हाशिए पर रहते आए हैं और स्वयं अपने इतिहास से भी अपरिचित हैं। इतिहास में दाखिल होने के लिए भाषा में अंकित होना ज़रूरी है।... इस संदर्भ में आत्मकथा अभिव्यक्ति के एक साहित्यिक प्रकार की अपेक्षा राजनीतिक-सामाजिक दस्तावेज़ के रूप में अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है।”1
समाज के
वंचित, हाशिएकृत समुदायों—जिनमें मुख्य रूप से स्त्रियाँ, दलित, आदिवासी, हिजड़ा और घुमंतू आदि हैं—उन्हें उनके जीवन, रीति-रिवाजों, परंपराओं तथा वर्चस्ववादी पितृसत्तात्मक समाज द्वारा दिए गए अपमान, शोषण और उपेक्षा को उन्होंने किस प्रकार देखा, सहा और कैसे उस पर प्रश्न उठाने का साहस किया, कैसे उनका विरोध करने की चेतना जगी, इसका वास्तविक परिचय हमें इन आत्मकथाओं से ही प्राप्त होता है।
भारत एक
जातियों पर
आधारित समाज
है, जहाँ जाति-समाज के साथ गठित पितृसत्ता का स्वरूप ‘ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक
समाज’ का है। जिसमें रहते और घुटते हुए स्त्री लेखिकाओं के अनुभव बीते कुछ दशकों में आत्मकथा विधा में सशक्त
रूप से माध्यम सामने आए हैं। समकालीन स्त्री लेखिकाओं की ये आत्मकथाएँ उनके निजी
जीवन और समाज द्वारा उनके साथ किए गए व्यवहार की कथाएँ हैं। इन कथाओं में उनके
संघर्ष-संकल्पों, टूटने-बिखरने, विरोध-विद्रोह और
अनकहे प्रश्नों की
अनेकों कहानियाँ हैं। आत्मकथा में उनकी अपनी आवाज़ है। उनके अपने जीवन के अनुभव, सुख-दुख, घर-परिवार और समाज
को अपनी दृष्टि से देखना तथा विश्लेषण करना इन आत्मकथाओं में मौजूद है। स्त्रियों
की निजी अनुभूतियों तथा उनके द्वारा सही गई अंतहीन यंत्रणाओं का इतिहास ही 'स्त्री लेखन' है।
स्त्रियों की
इसी लेखन परंपरा को यदि हम देखें तो कह सकते हैं कि बुद्ध काल की 'थेरियों' से लेकर मीरा, आंडाल, अक्का महादेवी, लल्लद्यद, महादेवी आदि का लेखन भले ही प्रचलित साहित्यिक विधा में आत्मकथा न भी हो, फिर भी उसके भीतर का वास्तविक तत्व उन
स्त्रियों द्वारा भोगा हुआ यथार्थ ही है। जिसमें स्त्री को गुलाम बनाकर रखने वाले
पुरुष-वर्चस्व का
विद्रोह था। उनका भोगा हुआ यथार्थ ही उनके लेखन का आधार बना।
वहीं आधुनिक
काल में भी कुछ स्त्रियों के आत्मकथात्मक अंश संस्मरणों के रूप में मिलते हैं, जिनमें ताराबाई शिंदे की 'स्त्री पुरुष तुलना', पंडिता रमाबाई की 'द हाई कास्ट हिंदू वुमन', अज्ञात हिंदू औरत की 'सीमंतनी उपदेश', तथा दुखिनी बाला की 'सरला: एक विधवा की आत्म जीवनी', प्रमुख हैं। इन सभी में मुख्य स्वर यह है कि कैसे पितृसत्ता
तथा पारंपरिक व्यवस्थाएँ न सिर्फ इनका दमन व शोषण करती हैं, बल्कि इनके विचारों और सपनों को भी मार
देती हैं। ऐसे में ये स्त्रियाँ किस प्रकार अपनी चेतना को जगाकर पितृसत्तात्मक
समाज द्वारा स्थापित मूल्य-व्यवस्थाओं का
विरोध करती हैं एवं उसे चुनौती देने की कोशिश करती हैं?
उन्नीसवीं
शताब्दी के शुरुआती दौर से ही विभिन्न भारतीय भाषाओं (बंगला, मराठी आदि) में महिलाओं
द्वारा आत्मकथाएँ लिखी गईं। इन आत्मकथाओं के लेखन से भारतीय नवजागरण तथा स्त्री
शिक्षा के विकास पर बड़ा प्रभाव पड़ा,
जिसने स्त्रियों
को बहस के केंद्र में लाने का कार्य किया। इन्हीं बहसों के बीच स्त्रियों ने अपने
जीवन में छिपे गहन अनुभवों और अपनी पीड़ा को समाज को बताने का हौसला दिखाया।
ये महिला
आत्मकथाएँ केवल स्त्री जीवन का लेखा-जोखा ही नहीं
हैं, अपितु इसमें भारतीय समाज की पितृसत्तात्मक
व्यवस्था की व्याख्या भी की गई है कि कैसे यह समाज के संस्कारों, विचारों, मान्यताओं, रीति-रिवाजों सब में व्याप्त है। इसे जानने-समझने के लिए महिला आत्मकथाएँ
महत्त्वपूर्ण साहित्यिक सामग्री हैं। “स्त्री आत्मकथा स्वयं में बारंबार कहा जाने वाला अनुवाद-रहित अनकहा
संदेश है। यह संदेश उनके लिए है जो वर्चस्वशाली संस्कृति के उच्च पदों पर बैठे
हैं। यह
संदेश स्त्रियों द्वारा दिया जा रहा है, हाशिए की अस्मिताओं द्वारा दिया जा रहा है, उन सभी की ओर से जो समाज के हाशिए पर
स्थित हैं।”2 इसका यह अर्थ नहीं है कि ये आत्मकथाएँ पूरे समाज का विरोध
कर रही हैं, बल्कि इसमें उनके उन भावों और मनोदशाओं
को आवाज़ मिली है जो सिर्फ एक स्त्री की ही नहीं, पूरे समाज, इतिहास, वर्ग-वर्ण संघर्षों
से लड़ती-जूझती लाखों स्त्रियों की आवाज़ बन जाती
हैं।
वर्तमान दौर
में जो हिन्दी की प्रमुख स्त्री आत्मकथाएँ रही हैं, उनमें चंद्रकिरण सौनरेक्सा की ‘पिंजरे की मैना’, प्रभा खेतान की ‘अन्या से अनन्या’, मैत्रेयी पुष्पा की ‘कस्तूरी कुंडल बसै’ एवं ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’, रमणिका गुप्ता की ‘हादसे’ और ‘आपुहुदरी’, मन्नू भंडारी की ‘एक कहानी यह भी’ का नाम आता है। इसके साथ ही अन्य दो और महत्त्वपूर्ण आत्मकथाएँ रही हैं—कौशल्या बैसंत्री की आत्मकथा ‘दोहरा अभिशाप’ और सुशीला टाकभौरे की ‘शिकंजे का दर्द’। इनमें जातियों एवं श्रेणियों में विभाजित समाज में दलित स्त्री के जीवन का
स्वरूप सामने आया है कि कैसे दलित स्त्रियाँ न केवल जातिवाद, बल्कि दलित समाज में व्याप्त पितृसत्ता
के भी अधीन हैं। जब हम स्त्रीवादी नज़रिये से जाति, वर्ग, धर्म और जेंडर को देखते हैं, तो पाते हैं कि ये सब परस्पर गहरे रूप
में गुँथे हुए हैं, जहाँ एक को जानने और समझने के लिए दूसरे
को जानना-समझना बहुत
आवश्यक है। आज जब स्त्रियाँ आत्मकथाओं के माध्यम से अपने विचारों और अनुभवों को
सामने ला रही हैं,
तो समाज को भी
उसे स्त्री के दृष्टिकोण से देखने और समझने का प्रयास करना चाहिए। स्त्री
आत्मकथाएँ उनके दृष्टिकोण,
उनके प्रश्नों, उनकी आवाज़ और उनके यथार्थबोध के अध्ययन
के लिए महत्त्वपूर्ण साहित्यिक सामग्री हैं।
इक्कीसवीं सदी की चर्चित आत्मकथाओं की
बात करें तो इनमें प्रमुख है हिन्दी की प्रख्यात लेखिका मन्नू भंडारी की आत्मकथा ‘एक कहानी यह भी’। मन्नू भंडारी अपनी आत्मकथा को आत्मकथा न मानकर ‘कहानी’ मानती हैं जो उनकी लेखकीय जीवन-यात्रा पर केंद्रित है। यह उनके लेखकीय
व्यक्तित्व के साथ-साथ उनके निजी, सामाजिक और सांसारिक जीवन के कई पक्षों को सामने लाती है।
अपनी इस आत्मकथा में लेखिका ने अपने बचपन से लेकर युवावस्था, स्कूल-कॉलेज की यादों से लेकर एक कहानीकार और
राजेन्द्र यादव की पत्नी बनने तक का वर्णन किया है। विवाह के बाद घर-परिवार की ज़िम्मेदारियों की व्यस्तताओं
के बीच अपने भीतर के लेखक को जीवित रखने, लेखकों के सत्संग, फिल्म, टी.वी. के कार्य और उसके साथ ही अपने दाम्पत्य
जीवन के द्वंद्व को लिखा है। वे लिखती हैं कि किस प्रकार स्त्रियों को पुरुषों से
कमतर मानने की शुरुआत बचपन में परिवार से ही होती है। बचपन से ही उन्हें बात-बात पर चलने, उठने-बैठने और बात
करने की ‘स्त्रियोचित’ तमीज़ सिखाई जाने लगती है। पारिवारिक और सामाजिक संस्कार बचपन में ही उसे उसके ‘लड़की’ होने का अहसास दिलाने लगते हैं। मन्नू भंडारी कहती हैं— “मारवाड़ी परिवार... लड़की की जात (नीची नज़र और बंद ज़बान का ठप्पा जिस पर
जन्म के साथ ही चस्पाँ कर दिया जाता था।”3
भारतीय समाज
में स्त्री-पुरुष के संबंध
को सामाजिक स्वीकृति ‘पति-पत्नी’ के रूप में ही मिली है। यह संबंध विवाह संस्था के कारण मौजूद है, परन्तु विवाह संस्था में बँधते ही
स्त्री को पुरुष से कमतर माना जाने लगता है और उसे दोयम दर्जे का नागरिक स्वीकार
किया जाता है। जॉन स्टुअर्ट मिल ने ‘द सब्जेक्शन ऑफ विमेन’ में विवाह संस्था पर प्रश्नचिह्न लगाते
हुए लिखा है, “कानून पति को जो निरंकुश सत्ता देता है
वह एक वजह हो सकती है कि पत्नी किसी भी उस समझौते के लिए तैयार हो जाए जो उनके बीच
सत्ता-विभाजन से संबंधित हो, लेकिन पति के सहमत होने के पीछे यह कारण
नहीं हो सकता।”4 इससे स्पष्ट होता है कि वैवाहिक संबंधों में भी स्त्री की
स्वतंत्रता का प्रश्न प्रासंगिक है। 'एक कहानी यह भी' में मन्नू भंडारी भी इसी मुद्दे को उठा रही हैं।
राजेंद्र यादव
से विवाह के पहले ही मन्नू भंडारी एक कहानीकार के रूप में हिंदी साहित्य जगत में आ
चुकी थीं। उनके लेखकीय स्वरूप को सराहना मिल रही थी। राजेंद्र से शादी के बाद
मन्नू को स्वयं को एक लेखक के रूप में आगे बढ़ाना था और मन्नू भंडारी यह भी स्वीकार
करती हैं कि उनके लेखक को राजेंद्र के साथ ने हमेशा प्रोत्साहित किया, लेकिन विवाह के बाद वह एक लेखक होने के
साथ-साथ अब पत्नी
भी थीं। मन्नू कहती हैं कि— “बहुत सपने देखे थे इस ज़िंदगी को लेकर... सब लोग सोचते थे और मुझे भी लगता था कि
एक ही रुचि...
एक ही पेशा...
कितना सुगम रहेगा जीवन! मुझे अपने
लिखने के लिए तो जैसे राजमार्ग मिल जाएगा, लेकिन एक ही पेशे के दो लोगों का साथ जहाँ कई सुविधाएँ
जुटाता है, वहीं दिक्कतों के अंबार भी लगा देता है—कम-से-कम मेरा यही अनुभव रहा”5
राजेंद्र यादव
के साथ विवाह से अपने लेखकीय व्यक्तित्व को सँवारने की जो अपेक्षाएँ मन्नू भंडारी
को थीं, वे न सिर्फ टूटीं बल्कि उनके साथ
राजेंद्र द्वारा दिए गए 'समानांतर ज़िंदगी' के फॉर्मूले ने एक स्त्री के विवाह-परिवार के सपने को भी तोड़कर रख दिया।
राजेंद्र यादव की 'समानांतर जीवन' की अवधारणा का सच उनके विवाहेतर संबंध थे, जिसने मन्नू भंडारी को एक पत्नी के रूप में हमेशा दुखी रखा। “राजेंद्र के दिमाग में एकाएक समानांतर
ज़िंदगी की जो यह अवधारणा पैदा हुई है, निश्चित ही उसके सूत्र कहीं और ही हैं।”6 मन्नू भंडारी ने कई ऐसे प्रसंगों का
ज़िक्र किया है जिनमें राजेंद्र यादव,
मन्नू भंडारी
को कष्टों में छोड़कर अपने ज़रूरी कामों पर चले जाते थे। घर-परिवार के प्रति राजेंद्र यादव की
उदासीनता के कारण मन्नू भंडारी हमेशा दुखी रहीं। राजेंद्र यादव पत्नी और बच्चों के
प्रति असंवेदनशीलता दिखाते थे।
राजेंद्र यादव
का अहंपूर्ण, कुंठाओं से ग्रसित व्यक्तित्व तथा उनके
विवाहेतर संबंधों के कारण उनकी स्त्री-अस्मिता का यह
पक्ष हमेशा मन्नू भंडारी को दुखित करता रहा। “सामंती संस्कारों से ओत-प्रोत इस
पौरुषेय अहं की कचोट को मैं समझती नहीं होऊँ, यह बात नहीं थी, पर उसका निराकरण मेरे पास नहीं, राजेंद्र के अपने पास था।”7 मन्नू भंडारी का पत्नी रूप राजेंद्र के
व्यवहार से सदैव आहत रहा,
जिसकी अंतिम
स्थिति विवाह के पैंतीस वर्ष के बाद अलगाव के रूप में हुई। विवाहेतर संबंधों के
कारण पत्नी की स्थिति किस हद तक नारकीय हो जाती है और वह भी उस स्थिति में जब उसने
माता-पिता से
विद्रोह करके अंतरजातीय प्रेम विवाह किया हो, इस बात को यह कहानी साबित करती है।
पारिवारिक
ढाँचे में स्त्री की सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका होने पर भी उसे किसी भी प्रकार का
कोई भी फ़ैसला लेने का अधिकार नहीं दिया जाता। भारतीय समाज में परिवार एक ऐसी इकाई
है जहाँ स्त्री सदैव पुरुषों द्वारा शासित होती है। पतिव्रत-धर्म, यौन शुचिता आदि उस पर सामाजिक नियंत्रण सुनिश्चित करते हैं। रजतरानी मीनू कहती
हैं— “पुरुष-प्रधान सामाजिक व्यवस्था में उसे
चाभियों का गुच्छा कमर में लटकाकर घर-संसार की मालकिन का खिताब तो पुरुषों द्वारा दे दिया गया है, लेकिन कोई अधिकार प्रदान नहीं किया गया
है; उल्टा उसे घर के कामकाज में बाँधकर
दुनिया से काट दिया गया है। वह बिना इजाज़त के न तो घर का भंडार भर सकती है और न ही
खाली कर सकती है।”8
मन्नू भंडारी
ने अपनी आत्मकथा में अपनी माँ और पिता के जिस रूप को दिखाया है, वह एक मध्यमवर्गीय भारतीय परिवार का
यथार्थ चित्रण है। “पिता का चरित्र अपनी सारी गरिमा, सारी करुणा और सारे अंतर्विरोधों के साथ
मेरे मन में ज्यों-का-त्यों अंकित है... पिता के ठीक विपरीत थीं हमारी बेपढ़ी-लिखी माँ। पिताजी की हर ज़्यादती को अपना
प्राप्य और बच्चों
की हर उचित-अनुचित फ़रमाइश
और ज़िद को अपना फ़र्ज़ समझकर बड़े ही सहज भाव से स्वीकार करती थीं वे।”9 वास्तविकता तो यह है कि विवाह संस्था की नींव जिन मूल्यों-विचारों पर आधारित है, वे सामाजिक न्याय के मूल्यों के ही विपरीत हैं। सामाजिक
जीवन निभाने और घर-गृहस्थी की गाड़ी सुचारु रूप से चल सके, इसलिए दोनों के हिस्से में कुछ काम आना
ज़रूरी है, परन्तु स्त्री के श्रम को अनुत्पादक
कार्यों में लगाकर उसे घर-परिवार सँभालने
की ज़िम्मेदारी देकर बाँध दिया जाता है,
जबकि पुरुष घर
से बाहर रहने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र होता है।
इस संदर्भ में
अपनी फिल्म के सेट पर फिल्म निर्देशक बासु दा द्वारा कही गई मज़ाकिया लहजे की बात— “अरे स्त्री को पति के चरणों में ही
लेटना चाहिए...
वहीं अच्छी लगती है वह”10 —को सोचते हुए मन्नू भंडारी लिखती हैं— “पर एक बात उन दिनों ज़रूर मेरे मन में
घुमड़ती रही थी कि पहली बात बासु दा ने चाहे मज़ाक में ही कही हो, पर क्या पुरुष मात्र का सामंती अहं इस
बात से तुष्ट नहीं होता कि स्त्री उसके चरणों का स्पर्श करे... उसके चरणों में
लोटे?”11
बदलते वक्त और
परिवेश के साथ आज भी पुरुषों की इस भूमिका में किसी प्रकार का कोई अधिक बदलाव नज़र
नहीं आता। वर्तमान समय में शिक्षित स्त्री से घर और कार्यस्थल की दोहरी ज़िम्मेदारी
निभाने की अपेक्षा की जाती है। स्त्रियाँ तो ये ज़िम्मेदारियाँ निभा भी रही हैं, परन्तु पुरुष घर के काम करने में संकोच
महसूस करता है। मन्नू भंडारी तो अपने परिवार के लिए पूरी तरह समर्पित थीं। वे घर -परिवार की प्रत्येक ज़िम्मेदारी और
आर्थिक समस्याओं को स्वयं सुलझा रही थीं, फिर भी घर पर रहते हुए भी राजेंद्र द्वारा बच्ची की देख-भाल करने से उनके पुरुषोचित गर्व को चोट पहुँचती थी। “मैं नौकरी करने जाऊँगी और वे बच्ची को
लेकर घर रहेंगे तो उनके लेखक मित्र यही तो समझेंगे कि ये बच्ची की आयागिरी कर रहे
हैं, जो उन्हें किसी भी सूरत में बर्दाश्त
नहीं था।”12
राजेंद्र यादव
के इस व्यवहार को लगातार झेलते हुए मानसिक तनाव के कारण अंततः वे लेखन कार्य से ही
अलग हो गईं।
वर्तमान समय
में स्त्री, पुरुष के साथ अपने संबंधों को सिर्फ
शारीरिक संबंधों तक ही सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि उसे बौद्धिक,
सामाजिक और
राजनीतिक जीवन के स्तर तक ले जाकर जीना चाहती है। वह विवाह के पारंपरिक अर्थों में
केवल ‘अर्धांगिनी’ ही नहीं बने रहना चाहती,
बल्कि वह पुरुष
से मित्रता चाहती है, उसका सहयोग चाहती है और परिवार व्यवस्था
में अपनी लोकतांत्रिक भागीदारी चाहती है। ‘मेरे सपनों का भारत’
में गांधीजी
स्त्री क्षमताओं को मान्यता देते हुए कहते हैं— “स्त्री पुरुष की साथिन है जिसकी बौद्धिक
क्षमताएँ पुरुष की बौद्धिक क्षमताओं से किसी तरह कम नहीं हैं। पुरुष की
प्रवृत्तियों में,
उन प्रवृत्तियों के प्रत्येक अंग और उपांग में भाग लेने का उसे अधिकार है और
आज़ादी तथा स्वाधीनता का उसे उतना ही अधिकार है जितना पुरुषों को है। जिस तरह पुरुष
अपनी प्रवृत्ति के क्षेत्र में सर्वोच्च स्थान का अधिकारी माना गया है, उसी तरह स्त्री भी अपनी प्रवृत्ति के
क्षेत्र में मानी जानी चाहिए।”13 आज की स्त्री प्रेम, काम और विवाह को परंपरागत मापदंडों से अलग करके देखना चाहती है। वह जानना
चाहती है कि आखिर क्यों वह इन सब अपूर्णताओं के बीच पूर्ण दिखती हुई भी सब कुछ
सहने के लिए मजबूर है? इन कारणों की खोज करते हुए एक पत्नी के
रूप में मन्नू भंडारी यही समझ पाती हैं कि ब्राह्मणवादी मानसिकता वाले
पितृसत्तात्मक समाज द्वारा जो रीति-रिवाज और कानून
बने हैं, उनसे न तो स्त्री मुक्त हो सकती है और न
ही पुरुष समाज। ये शिकंजे आज भी दोनों को अपनी जकड़ में बाँधे हुए हैं। ये
आत्मकथाएँ बताती हैं कि सामंतवादी संस्कार आज भी हमारे समाज पर अपनी मज़बूत पकड़ रखे
हुए हैं और आज भी स्त्री एक पारंपरिक पितृसत्तात्मक समाज में रहने के लिए विवश है।
उनके तमाम सवाल आज भी पुराने रूप में मौजूद हैं, जिनके उत्तर की खोज की जानी बाकी है। इसके साथ ही ये आत्मकथाएँ इस मान्यता पर
भी प्रश्नचिह्न लगाती हैं कि क्या उच्च शिक्षा व आर्थिक स्वावलंबन स्त्री-मुक्ति को अनिवार्यतः सुनिश्चित करता है? यह आत्मकथा जो लेखकीय चिंतन-सरोकारों से प्रारंभ हुई थी,
इसमें स्त्री-अस्मिता, राजनीतिक, सामाजिक, वैयक्तिक और साहित्यिक परिप्रेक्ष्य के साथ-साथ भारतीय पितृसत्तात्मक समाज की भी पड़ताल की गई है।
निष्कर्षतः
कह सकते हैं कि भारतीय समाज में स्त्री
का संघर्ष केवल लिंग आधारित न होकर ‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता’ की जटिल संरचना से आबद्ध है, जहाँ निजी अनुभूतियाँ व्यक्तिगत न रहकर
एक वृहत्तर सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ का हिस्सा बन जाती हैं। यह आलेख इस
महत्वपूर्ण सत्य को रेखांकित करता है कि आधुनिक शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता
मात्र से स्त्री की पूर्ण मुक्ति सुनिश्चित नहीं होती, क्योंकि पुरुषों का ‘सामंती अहं’ और वर्चस्ववादी मानसिकता वैवाहिक संस्था के भीतर आज भी स्त्री-अस्मिता को दोयम दर्जे पर ही बनाए रखने
का प्रयास करती है। अतः ये आत्मकथाएँ वर्चस्वशाली संस्कृति के विरुद्ध एक ‘अनुवाद-रहित संदेश’ हैं। ये केवल उनके आत्म-विलाप नहीं हैं,
बल्कि उस
पितृसत्तात्मक व्यवस्था की गहरी पड़ताल और पुनर्व्याख्या हैं, जो आज भी आधुनिकता के आवरण में सामंती
मूल्यों को जीवित रखे हुए है। स्त्री आत्मकथाएँ भविष्य के एक समतामूलक समाज के
निर्माण के लिए अपरिहार्य ऐतिहासिक और सामाजिक दस्तावेज़ हैं।
संदर्भ ग्रन्थ
1. सं0 राजेन्द्र यादव, देहरी भई विदेस,
किताबघर
प्रकाशन, नई दिल्ली, 2013, पृ. 25।
2. गरिमा श्रीवास्तव, स्त्री आत्मकथाः सिद्धान्त और विचार, बहुवचन अंक 24, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, पृ. 140।
3. मन्नू भंडारी, एक कहानी यह भी, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016, पृ. 17।
4. जॉन स्टूअर्ट मिल, अनु. प्रगति सक्सेना, स्त्रियों की पराधीनता, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016, पृ. 87।
5. मन्नू भंडारी, एक कहानी यह भी, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016, पृ. 56।
6. मन्नू भंडारी, एक कहानी यह भी, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016, पृ. 57।
7. मन्नू भंडारी, एक कहानी यह भी, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016, पृ. 66।
8. रजत रानी मीनू, नवें दशक की हिन्दी दलित कविता,
दलित साहित्य
प्रकाशन संस्था, नई दिल्ली, पृ. 1-2।
9. मन्नू भंडारी, एक कहानी यह भी, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016, पृ. 18-19।
10. मन्नू भंडारी, एक कहानी यह भी, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016, पृ. 123।
11. मन्नू भंडारी, एक कहानी यह भी, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016, पृ. 124।
12. मन्नू भंडारी, एक कहानी यह भी, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016, पृ. 74।
13. डॉ. के. एम. मालती, स्त्री विमर्शः भारतीय परिप्रेक्ष्य,
वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2017, पृ.156।


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