Citation
डॉ
.रंजित .एम्
सहायक
आचार्य,एम्. ई .एस. अस्माबी कॉलेज - पी वेंबलूर पीओ
- कोडंगलूर - तृश्शूर जिला 680671
ranjithm@mesasmabicollege.edu.in
शोध सार
आज़ादी के पश्चात
हिंदी की राष्ट्रीय कविताओं में भारतीयता का स्वर अत्यंत सशक्त रूप में उभरकर सामने
आता है। इन कविताओं में देशप्रेम, सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय अस्मिता, सामाजिक विसंगतियाँ
तथा भविष्य की आशाएँ स्पष्ट रूप से व्यक्त होती हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य
स्वतंत्रता-उत्तर कालीन कविताओं के माध्यम से भारतीयता की अभिव्यक्ति का विश्लेषण करना
है। यह अध्ययन दर्शाता है कि भारतीयता केवल भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, नैतिक
और मानवीय मूल्यों का समुच्चय है।
बीज शब्द
भारतीयता, राष्ट्रीय
कविता, स्वतंत्रता, सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय अस्मिता, सामाजिक विसंगतियाँ, राष्ट्रनिर्माण,
युवा शक्ति
प्रस्तावना
भारत, जिसका प्राचीन
नाम आर्यावर्त रहा है, एक समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा वाला राष्ट्र है। 1947 में स्वतंत्रता
प्राप्ति के बाद भारत ने एक गणतांत्रिक राष्ट्र के रूप में विकास किया। इस दौरान साहित्य,
विशेषकर कविता, ने समाज की चेतना को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
संस्कृति को यदि व्यापक अर्थ में देखा जाए तो यह
समाज की उच्चतम मूल्यों की अभिव्यक्ति है, जो व्यक्ति के आचार-विचार, भावनाओं और जीवनशैली
में परिलक्षित होती है। स्वतंत्रता के बाद की राष्ट्रीय कविताओं में यही संस्कृति और
भारतीयता प्रमुख विषय के रूप में उपस्थित है।
हमारे देश का संविधान सम्मत नाम “भारत” है। प्राचीन नाम जो भारत से भी पुराना है वह आर्यावर्त है। आर्यावर्त के साथ-साथ प्राचीन काल से ही इसका
नाम “भारत”
भी व्यवहार में
रहा है. आज हमारे भारतवर्ष को गणतन्त्र के सूत्र
में बन्धे हुए 66 वर्ष
हो चुकें हैं। इन वर्षों में हमने बहुत कुछ पाया
और बहुत कुछ खोया है। गणतन्त्रता का अर्थ
है – हमारा संविधान, हमारी सरकार, हमारे
कर्तव्य और हमारा अधिकार।
सामान्य
रूप से ‘संस्कृति’ शब्द को,सुरुचि
और शिष्ट व्यवहार के रुप में लिया जाता है | विस्तृत
अर्थों में “संस्कृति किसी एक समाज में पाई जाने वाली
उच्चतम मूल्यों की वह चेतना
है,जो सामाजिक
प्रथाओं,व्यक्तियों की चित्तवृति, भावनाओं,मनोवृतियो,आचरण के साथ-साथ उसके
द्वारा भौतिक पदार्थों को विशिष्ट स्वरूप
दिये जाने में अभिव्यक्त होती है |”
अमेरिका के ही प्रसिद्ध साहित्यकार मार्क
ट्वेन ने 1906 में लिखा था,”भारत मानव जाति का पालना,भाषा
की जन्म भूमि,इतिहास की माता,-कथाओं की दादी और परम्पराओं की परदादी रही है |वह ऐसी जन्मभूमि रही है जिसके दर्शन के लिये सब लालायित रहते हैं
|” वर्ष 1884 में
‘डेली ट्रिब्यून’ में छपे अपने आलेख में ब्राउन ने भी स्वीकार किया कि,” यदि हम पक्षपात रहित होकर भली-भांति परीक्षा करें तो हम को स्वीकार
करना पड़ेगा कि हिन्दू ही सारे ससार के साहित्य,
धर्म और सभ्यता के जन्मदाता हैं |”साहित्य
मानव सभ्यता के निरंतर विकास की एक महत्वपूर्ण मानसिक अवस्था व प्रक्रिया
है . साहित्य, समाज में व्याप्त अच्छे व बुरे गतिविधियों
या चलन को जानने व समझने का माध्यम होता है. इस आलेख में सन
उन्नीस सौ संतालीस से आज तक लिखी हुयी
कविताओं के ज़रिये यह खोज हो रहा है
कि हमें अपने देश के प्रति कितना प्यार है ,कितनी ममता है .
सन उन्नीस सौ
सैंतालीस को हमें आजादी मिली ,हमारे शर्तो
पर नहीं आज़ादी देनेवालों की शर्तों पर .पं
माखनलाल चतुर्वेदी जी ने इसका
वर्णन यों किया है -
“जीत हुयी ,पर यह न दीखती जीत राज लेनेवाले की
इसकी सांस सांस पर लिखी है प्रभुता देनेवाले की”
इसके फल स्वरुप स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद भारत का विभाजन
हुआ.आज़ादी पाने से मुश्किल है आज़ादी कायम रखना यह हमारे कवी पहले ही जानते थे . गिरिजा कुमार
माथुर जैसे भविष्यदृष्टा कवी ने अपने 15
अगस्त १९४७ कविता में आनेवाले युगों के बारे में
उसी दिन सूचना इस प्रकार दिया -
“प्रथम चरण है नए स्वर्ग का
है मंजिल का झोर
इस जन मंथन से उठ आई
पहली रत्न हिलोर
अभी शेष है पूरा होना
..............................
शत्रु हट गया लेकिन उसकी
छायाओं से डर है
शोषण से मृत है समाज
कमजोर हमारा घर है “ (15 अगस्त १९४७, गिरिजा कुमार
माथुर)
उस
ज़माने की रचनाकारों में भारत के प्रति भारतीयता के प्रति ज़्यादा रूझाव थे ,
“ये देश हमारा
सोने के दिन है इसके
चाँदी की रात है
हीरों की फसल होती
इसकी क्या बात है “ (ये देश हमारा .चन्द्र सेन
विराट )
भारत देश के बारे में मधुर शास्त्री जी ने लिखा
“इस प्यारी धरती पर
यह भारत देश मनोहर
ममता का मानसरोवर
इसके गाँव स्वर्ग से सुंदर
इसमें प्रताप है ,अकबर
इसके रहीम है रघुवर
इस पर धर्म निछावर
चाँदी जैसी धवल अहिंसा
सत्य स्वरुप सुनहरा भारत देश मनोहर (भारत देश
मनोहर ,मधुर शास्त्री )
भारत क्या है ,इसका वर्णन इन पंक्तियों में दर्शनीय है
“अहिंसा का भारत की अर्थ नहीं कायरता
दंग भरी ललकारें सुनकर रक्त नहीं यह जमता
हम भारतवासी है ,हमने मारना मिटना सीखा
किन्तु मित्र का हित सदैव अपने से बढ़ कर देखा
किया समर्थन जिस जिस ने भी हम उसके आभारी “
(सालाजार के नाम खुला
पत्र .राधेश्याम प्रगल्भ)
“हम
बेटे हिंदुस्तान के, हम बेटे हिंदुस्तान के
दिया
दशमलव का ज्ञान और शून्य जहां को सिखलाया
कारगिल की चोटी पर तिरंगा
हम फहराया ,
मंगल
पर भी अब हमने अपना परचम है लहराया ,
परमाणु शक्ति बनकर दुनिया
को हमने बतलाया ,
हम वही जो जीवित सिंहो के
दांतो को गिन लेते ,
हम वही जो सूरज को भी अपने
मुख में रख लेते ,
हम नहीं कोई कायर , बस झुकते हैं सम्मान पे “
(हम बेटे है
हिन्दुस्तान के ,कुलदीप प्रजापति )
एक ओर तो हम तीव्र गति से विकास की नयी - नयी सीमाओं को छू कर अपने देश का नाम रोशन कर रहे है.उसी वक्त हम अपने कमिओं पर
ध्यान देने से चूक रहे है.मगर कवि पूर्णतः शुद्ध समाज के पक्ष में
है.इसलिए उन्हें कुछ छिपाना नहीं है .भारत के बारे में इसलिए ही उसने लिखा
,
“ मैं जलता हिंदुस्तान हूं,
आतंकवाद बना दामाद मेरा,
भ्र्ष्टाचार ने चुराया चीर मेरा,
हो रहा जो हर धमाका,
चीर देता दिल मेरा,
कहते हैं जब सोने की चिड़ियां, आंख मेरी रोती हैं,
क्योंकि मेरी कुछ संतानें इस युग मैं भूखी सोती हैं,
कई समस्याओं से झुन्झता मैं निर्बल-बलवान हूँ.” (मैं जलता हिंदुस्तान हूं,कुलदीप
प्रजापती
“लूटकर
विदेशियों ने मुझको, अपने
देश को आगे बढ़ाया,
सत्ता में रहने वालों ने, अपने
घर को चमकाया।
आंख में मेरी आते आंसू, उन
वीरों को सोचकर,
कैसे बदल गए लोग यहां के, गर्व
था मुझको उनपर
जान
की परवाह न करके, मुझको
तो संभाला,
हाथ में सत्ता रखने वाले, कर
रहे हैं देखो घोटाला।
इसी घोटाले के कारण, नहीं
हो पाई विकसित,
पैसठ वर्ष आजादी के, गाड़ी
चल रही घिस-घिस।“(भारत माता की पुकार ,रवि श्रीवास्तव )
स्वतंत्रता
संग्राम के वीर शहीदों के अमूल्य रक्त से सिंचित
होकर आजादी हमें प्राप्त हुई है। जिस
स्वतन्त्र वातावरण में हम श्वास ले रहें हैं वह हमारे वीर हुतात्माओं की देन है।वर्तमान में हमारे नेता इस आजादी के मूल्य को भूल बैठे
हैं। उनके विचार में
आजादी शायद खिलौना मात्र है, जिसे
जहां चाहा फेंक दिया। जब चाहा अपने पास
रख लिया किन्तु ऐसा नहीं है। हमारे नेताओं ने देश को जिस स्थिति पर लाकर खडा कर दिया है, इस
परिदृश्य को देखते हुए कवि ने ठीक ही कहा
है –
“शहीदों की चिताओं पर न मेले हैं न झमेले हैं।
हमारे नेताओं की कोठियों पर लगे नित्य नये मेले हैं।।“
समय के साथ – साथ भारत का विकास काफी तेजी के साथ हुआ है, जी हाँ हमारा
भारत बदल चुका है.आज़ाद देश के नागरिक अब सुखलोलुपता में पूर्णतः खो
चुके है ,कवी ने ठीक ही समझा और लिखा
“सारा देश विचित्र भावना में उलझा है
हिमगिरी अंगारे बनने को आतुर
रेतीले टीले बन रहे बवंडर मैदानों में जाग रहे धनुधारी
सागर के लहरों में भी उफान है
बाहर भी कोलाहल ,घर के भीतर भी कोलाहल
दक्षिण,उत्तर ,पश्चिम ,पूरब तक फैला कोलाहल ‘(भारत माँ की लोरी
,देवराज दिनेश )
पूरी दुनिया को नेतृत्व करने की क्षमता भारत को है ,मगर आज भारतवासी
इसका प्रयोग नहीं कर रहे है .जो क्षमताएं हमारे हाथों में है उसे न पहचान कर हम दूसरों से ले रहे है . भारत एक चिरंतन राष्ट्र
है , सनातन राष्ट्र है, इसकी याद दिलाने के
लिए कवि बता रहे है .
“वह तपशक्ति दुर्वासा की ,जिसके
आगे दुनिया डरती
विज्ञान शक्ति वह कौशिक की जो नयी सृष्टि अच् सकती
वे पाशुपतास्त्र ,ब्रह्मास्त्र और है कहाँ तुम्हारे अग्निबाण”
(अब जाग देश के नौ जवान ,धर्मपाल अवस्थी)
हमारे पूर्वजों ने कई
जंजीरों को तोड़ कर पूरे समाज को एक सूत्र में
बाँध कर देश को आज़ादी दिलाई थी.लेकिन हम आज टूटे गए जंजीरों को पुनः बना रहे है .इससे
खिन्न भारत का आवाज़ कवि ने सुना और यों लिखा ,
“आज़ादी है खुलना ,खिलना .अपना देश सजाना
आज़ादी से बढ़िया सुंदर कोई नहीं
खजाना
नहीं सताना दीन दुखी को कहती
है आजादी
दुष्ट गुलामी से ही लडती रहती है आज़ादी
आज़ादी गाया करती है पीड़ा मुक्त तराना “(आज़ादी ,शेरजंग गर्ग )
अनेकता में एकता भारतीय
संस्कृति की खासियत है .समाज को सही रास्ते में लाने की कोशिश साहित्यकार कर रहे है .
“भले ही शब्द हो अलग ,अलग अलग हो पंक्तियाँ
अलग –अलग क्रियाएं हो ,अलग –अलग विभक्तियाँ
मगर ह्रदय से पूछिए ,तो अर्थ सबका एक है
बता गयी है कान में ,ये बात शब्द शक्तियां
भले ही अपने सामने
नए नए सवाल हो
मगर हर एक सवाल का जवाब हम ,जवाब तुम (गुलाब हम,गुलाब तुम ,कुअर बेचैन )
जिन लोगों ने भारत की प्राचीन उत्कृष्ट
सांस्कृतिक मान्यताओं अथवा चिकित्सा प्रणाली
इत्यादि को अपनाकर आधुनिकता के नाम पर बेच डाला है,
और अपनी संस्कृति
को किसी भी कारण से हेय मानते हैं, मानो
उन्हें लताड़ते हुए आचार्य सोहनलाल
द्विवेदी कह रहे हैं:-
“प्राणों पर इतनी ममता, और
स्वतंत्रता का सौदा?
बिना तेल के द्वीप जलाने,
का है कठिन कसौदा”
एक हजार वर्षों
की गुलामी के कारण यह भारतीय संस्कृति अब हमारे व्यवहार में से लुप्त हो रही है, अतः
इसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य बनता है। संस्कृति
-भाषा, भूषा, भजन, भोजन, व्यवहार आदि के द्वारा संचरित होती है। संस्कृति के इन सभी वाहनों पर आज विदेशी भाषा सवार है, तब इसमें क्या आश्चर्य कि हम
अपनी संस्कृति तेजी से खो रहे हैं।संस्कृति के सभी वाहनों को पुष्ट करना हमारा प्रथम कर्तव्य हो जाता है। सभी असमताएं भूल कर हम आगे बढ़ पायेंगे ,यह उमंग आज भी कुछ कवियों
की रचनाओं में है .देखिये
“क्षमा ,दया ,संता का हमको हरदम रहता ध्यान है
सदाचार और शक्ति ,सुसंगति पर स्वदेश को मान है
हम भारत के नए जागरण ,सत्य दृष्टि के कूल है
हम स्वतन्त्रता के संरक्षक ,हम विवेक के फूल है
अन्धकार में दीप जलाएंगे ,शुभता सद्भाव के
जीना सिखलाएंगे ,हिम्मतहारों को म शान से “(हम सब रंग बिरंगे फूल है
,राधेश्याम पाठक )
“
पीढ़ियों से जमी है धूल, आज
झाड़ कर उतार दो l
हर परस्पर भेदभाव को, आज
भूलकर बिसार दो Il
हो
कहीं भी दूरियां-दस्तूरियाँ, उनको
अब मिटा दो
चरैवेति-चरैवेति, स्वर
चहुँओर- वह हमें भी सूना दो “ll
(पीढ़ियों
से जमी है धूल झाड़
कर उतार दो ,प्रवीन गुगनानी )
आज इस देश के पास विश्व
की सबसे अधिक युवा शक्ति है-परंतु उनमें से कितने लोग इस राष्ट्रीय संकल्प के प्रति प्रतिबद्घ हैं कि हम देश को पुन:
विश्वगुरू के सम्मानित स्थान पर विराजमान कराएंगे? कवयित्री सब से बिनती
कर रही है ,
“टूटती आवाज़ में फिर कह रहा हूँ
साथियों अपने वतन से प्यार करना” (सिपाही की अंतिम इच्छा ,ज्ञानवती सक्सेना
)
भारत की युवा पीढ़ी को इसकी शक्ति के इस वास्तविक , मूल और नैसर्गिक तत्व
को समझना होगा , इसे
संरक्षित और विकसित करना होगा। तभी भारत 21 वीं सदी में विश्व का नेतृत्व कर पाएगा.
“सबसे पहले तुम ही जागे ,फिर जगा दिया संसार सकल
अब चादर ताने पड़े हुए ,है युवक आज आलस्य विकल
फिर एक बार लो अंगडाई” ........ (अब जाग देश के नौ जवान ,धर्मपाल अवस्थी
भारतीयता वस्तुतः मानवता का प्रतीक है. इसलिए भारतीय संस्कृति का वास्तविक
अभिप्राय मानव संस्कृति से है. यह संस्कृति एक विशुद्ध विज्ञान है, जिसका आधार प्रकृति के जड़ परमाणु नहीं वरन प्राणी के गहन अन्तराल में रहनेवाली वह चेतना है जो यदि स्वस्थ दिशा में विकसित हो जाय तो आनन्द के
फव्वारे की तरह फुट पड़ती है और चारो और पवित्रता
,शांति ,स्नेह सोंदर्य और सुख ही सुख फैला
देती है . भारत में जो शान्ति थे अब कम होने का कारण क्या है ? हमसे भूल हुई और पहली
भूल रही कि हमने स्वयं को अपनी प्राचीनता से काटा,
अपने सांस्कृतिक मूल्यों से और गौरवपूर्ण अतीत से और अपने मूल से काटा। प्रत्येक मनुष्य आदिपुरूष का नवीन संस्करण होता है। प्रकृतिचक्र
को देखिए पुरातन ही नूतन बन रहा है। पुरातन और
नूतन के इस सत्य को जो समझ लेता है वही
सनातन के रहस्य को जान लेता है
आज सारा विश्व अशांत है और शांति को कब्रों
पर मोमबत्ती जला जलाकर खोज रहा है।
पर शांति उससे आंख मिचौली कर रही है। कारण केवल एक ही है कि शांति की खोज का ढंग विपरीत दिशा में काम कर रहा है। काम अशांति के और खोज
शांति की हो रही है। भारत की प्राचीन संस्कृति
जो इस पावन भूमि पर वास्तविक शांति स्थापित
कराने में सहायक बनी थी ,उसी की पुन: स्थापना पर बल देते हुए तथा वर्तमान विश्व सभ्यता को धिक्कारते हुए रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा :-
“घूम रही सभ्यता दानवी शांति! शांति करती भूतल में।
पूछे कोई भिगो रही वह क्यों अपने विषदंत गरल में।।“( मां भारती की वंदना
,दिनकर )
अब भी समय है कि हम अपनी उल्टी नीतियों की उल्टी परिणतियों से कुछ सीखें
और भविष्य के लिए सावधान होकर वर्तमान का
सही परिपे्रक्ष्य में आंकलन, परीक्षण
और अनुशीलन करें।
आज़ादी के बाद की राष्ट्रीय कविताओं में भारतीयता
(डॉ .रंजित .एम् .सहायक
आचार्य,एम्.ई .एस. कललटी कोलेज कोलेज,मन्नार्क्काड 678583)
हमारे देश का संविधान सम्मत
नाम “भारत” है। प्राचीन नाम जो भारत से भी पुराना है वह आर्यावर्त है। आर्यावर्त के
साथ-साथ प्राचीन काल से ही इसका नाम “भारत” भी व्यवहार में रहा है. आज हमारे भारतवर्ष
को गणतन्त्र के सूत्र में बन्धे हुए 66 वर्ष हो चुकें हैं। इन वर्षों में हमने बहुत
कुछ पाया और बहुत कुछ खोया है। गणतन्त्रता का अर्थ है – हमारा संविधान, हमारी सरकार,
हमारे कर्तव्य और हमारा अधिकार।
सामान्य रूप से ‘संस्कृति’
शब्द को,सुरुचि और शिष्ट व्यवहार के रुप में लिया जाता है | विस्तृत अर्थों में “संस्कृति
किसी एक समाज में पाई जाने वाली उच्चतम मूल्यों की वह चेतना है,जो सामाजिक प्रथाओं,व्यक्तियों
की चित्तवृति, भावनाओं,मनोवृतियो,आचरण के साथ-साथ उसके द्वारा भौतिक पदार्थों को विशिष्ट
स्वरूप दिये जाने में अभिव्यक्त होती है |”
अमेरिका के ही प्रसिद्ध साहित्यकार मार्क
ट्वेन ने 1906 में लिखा था,”भारत मानव जाति का पालना,भाषा की जन्म भूमि,इतिहास की माता,-कथाओं
की दादी और परम्पराओं की परदादी रही है |वह ऐसी जन्मभूमि रही है जिसके दर्शन के लिये
सब लालायित रहते हैं |” वर्ष 1884 में ‘डेली
ट्रिब्यून’ में छपे अपने आलेख में ब्राउन ने भी स्वीकार किया कि,” यदि हम पक्षपात रहित
होकर भली-भांति परीक्षा करें तो हम को स्वीकार करना पड़ेगा कि हिन्दू ही सारे ससार
के साहित्य, धर्म और सभ्यता के जन्मदाता हैं |”साहित्य मानव सभ्यता के निरंतर विकास
की एक महत्वपूर्ण मानसिक अवस्था व प्रक्रिया है . साहित्य, समाज में व्याप्त अच्छे
व बुरे गतिविधियों या चलन को जानने व समझने का माध्यम होता है. इस आलेख में सन
उन्नीस सौ संतालीस से आज तक लिखी हुयी
कविताओं के ज़रिये यह खोज हो रहा है
कि हमें अपने देश के प्रति कितना प्यार है ,कितनी ममता है .
सन उन्नीस सौ सैंतालीस को हमें आजादी मिली ,हमारे शर्तो पर नहीं आज़ादी
देनेवालों की शर्तों पर .पं माखनलाल चतुर्वेदी जी ने इसका वर्णन यों किया है -
“जीत हुयी ,पर यह न दीखती
जीत राज लेनेवाले की
इसकी सांस सांस पर लिखी
है प्रभुता देनेवाले की”
इसके फल स्वरुप स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद भारत का विभाजन हुआ.आज़ादी पाने से मुश्किल है आज़ादी कायम रखना यह हमारे कवी पहले ही जानते थे . गिरिजा कुमार माथुर
जैसे भविष्यदृष्टा कवी ने अपने 15 अगस्त १९४७
कविता में आनेवाले युगों के बारे में उसी दिन
सूचना इस प्रकार दिया -
“प्रथम चरण है नए स्वर्ग
का
है मंजिल का झोर
इस जन मंथन से उठ आई
पहली रत्न हिलोर
अभी शेष है पूरा होना
..............................
शत्रु हट गया लेकिन उसकी
छायाओं से डर है
शोषण से मृत है समाज
कमजोर हमारा घर है “
(15 अगस्त १९४७, गिरिजा कुमार माथुर)
उस ज़माने की रचनाकारों में भारत के प्रति
भारतीयता के प्रति ज़्यादा रूझाव थे ,
“ये देश हमारा
सोने के दिन है इसके
चाँदी की रात है
हीरों की फसल होती
इसकी क्या बात है “ (ये
देश हमारा .चन्द्र सेन विराट )
भारत देश के बारे में मधुर
शास्त्री जी ने लिखा
“इस प्यारी धरती पर
यह भारत देश मनोहर
ममता का मानसरोवर
इसके गाँव स्वर्ग से सुंदर
इसमें प्रताप है ,अकबर
इसके रहीम है रघुवर
इस पर धर्म निछावर
चाँदी जैसी धवल अहिंसा
सत्य स्वरुप सुनहरा भारत
देश मनोहर (भारत देश मनोहर ,मधुर शास्त्री )
भारत क्या है ,इसका वर्णन इन पंक्तियों
में दर्शनीय है
“अहिंसा का भारत की अर्थ
नहीं कायरता
दंग भरी ललकारें सुनकर
रक्त नहीं यह जमता
हम भारतवासी है ,हमने मारना
मिटना सीखा
किन्तु मित्र का हित सदैव
अपने से बढ़ कर देखा
किया समर्थन जिस जिस ने
भी हम उसके आभारी “
(सालाजार के नाम खुला पत्र
.राधेश्याम प्रगल्भ)
“हम बेटे हिंदुस्तान के, हम बेटे हिंदुस्तान
के
दिया दशमलव का ज्ञान और शून्य जहां को सिखलाया
कारगिल की चोटी पर तिरंगा हम फहराया ,
मंगल पर भी अब हमने अपना परचम है लहराया ,
परमाणु शक्ति बनकर दुनिया को हमने बतलाया ,
हम वही जो जीवित सिंहो के दांतो को गिन लेते
,
हम वही जो सूरज को भी अपने मुख में रख लेते
,
हम नहीं कोई कायर , बस झुकते हैं सम्मान पे
“
(हम बेटे है हिन्दुस्तान
के ,कुलदीप प्रजापति )
एक ओर तो हम तीव्र गति से विकास की नयी
- नयी सीमाओं को छू कर अपने देश का नाम रोशन कर रहे है.उसी वक्त हम अपने कमिओं पर ध्यान
देने से चूक रहे है.मगर कवि पूर्णतः शुद्ध समाज के पक्ष में
है.इसलिए उन्हें कुछ छिपाना नहीं है .भारत के बारे में इसलिए ही उसने लिखा
,
“ मैं जलता हिंदुस्तान
हूं,
आतंकवाद बना दामाद मेरा,
भ्र्ष्टाचार ने चुराया
चीर मेरा,
हो रहा जो हर धमाका,
चीर देता दिल मेरा,
कहते हैं जब सोने की चिड़ियां,
आंख मेरी रोती हैं,
क्योंकि मेरी कुछ संतानें
इस युग मैं भूखी सोती हैं,
कई समस्याओं से झुन्झता
मैं निर्बल-बलवान हूँ.” (मैं जलता हिंदुस्तान हूं,कुलदीप प्रजापती
“लूटकर विदेशियों ने मुझको,
अपने देश को आगे बढ़ाया,
सत्ता में रहने वालों ने,
अपने घर को चमकाया।
आंख में मेरी आते आंसू,
उन वीरों को सोचकर,
कैसे बदल गए लोग यहां के,
गर्व था मुझको उनपर
जान की परवाह न करके, मुझको
तो संभाला,
हाथ में सत्ता रखने वाले,
कर रहे हैं देखो घोटाला।
इसी घोटाले के कारण, नहीं
हो पाई विकसित,
पैसठ वर्ष आजादी के, गाड़ी
चल रही घिस-घिस।“(भारत माता की पुकार ,रवि श्रीवास्तव )
स्वतंत्रता संग्राम के वीर शहीदों के अमूल्य रक्त से सिंचित होकर आजादी हमें
प्राप्त हुई है। जिस स्वतन्त्र वातावरण में हम श्वास ले रहें हैं वह हमारे वीर हुतात्माओं
की देन है।वर्तमान में हमारे नेता इस आजादी के मूल्य को भूल बैठे हैं। उनके विचार में
आजादी शायद खिलौना मात्र है, जिसे जहां चाहा फेंक दिया। जब चाहा अपने पास रख लिया किन्तु
ऐसा नहीं है। हमारे नेताओं ने देश को जिस स्थिति पर लाकर खडा कर दिया है, इस परिदृश्य
को देखते हुए कवि ने ठीक ही कहा है –
“शहीदों की चिताओं पर न
मेले हैं न झमेले हैं।
हमारे नेताओं की कोठियों
पर लगे नित्य नये मेले हैं।।“
समय के साथ – साथ भारत का विकास काफी तेजी
के साथ हुआ है, जी हाँ हमारा भारत
बदल चुका है.आज़ाद देश के नागरिक अब
सुखलोलुपता में पूर्णतः खो चुके है ,कवी
ने ठीक ही समझा और लिखा
“सारा देश विचित्र भावना
में उलझा है
हिमगिरी अंगारे बनने को आतुर
रेतीले टीले बन रहे बवंडर
मैदानों में जाग रहे धनुधारी
सागर के लहरों में भी उफान
है
बाहर भी कोलाहल ,घर के
भीतर भी कोलाहल
दक्षिण,उत्तर ,पश्चिम
,पूरब तक फैला कोलाहल ‘(भारत माँ की लोरी ,देवराज दिनेश )
पूरी दुनिया को नेतृत्व करने की क्षमता भारत को है ,मगर आज भारतवासी
इसका प्रयोग नहीं कर रहे है .जो क्षमताएं हमारे हाथों में है उसे न पहचान कर हम दूसरों से ले रहे है . भारत एक चिरंतन राष्ट्र
है , सनातन राष्ट्र है, इसकी याद दिलाने के लिए कवि बता रहे है .
“वह तपशक्ति दुर्वासा की ,जिसके आगे दुनिया डरती
विज्ञान शक्ति वह कौशिक
की जो नयी सृष्टि अच् सकती
वे पाशुपतास्त्र ,ब्रह्मास्त्र
और है कहाँ तुम्हारे अग्निबाण”
(अब जाग देश के नौ
जवान ,धर्मपाल अवस्थी)
हमारे पूर्वजों ने कई जंजीरों को तोड़ कर पूरे समाज को एक सूत्र में बाँध कर देश
को आज़ादी दिलाई थी.लेकिन हम आज टूटे गए जंजीरों को पुनः बना रहे है .इससे खिन्न भारत
का आवाज़ कवि ने सुना और यों लिखा ,
“आज़ादी है खुलना ,खिलना
.अपना देश सजाना
आज़ादी से बढ़िया सुंदर कोई नहीं खजाना
नहीं सताना दीन दुखी को कहती है आजादी
दुष्ट गुलामी से ही लडती
रहती है आज़ादी
आज़ादी गाया करती है पीड़ा
मुक्त तराना “(आज़ादी ,शेरजंग गर्ग )
अनेकता में एकता भारतीय संस्कृति की खासियत
है .समाज को सही रास्ते में लाने की कोशिश साहित्यकार कर रहे है .
“भले ही शब्द हो अलग ,अलग
अलग हो पंक्तियाँ
अलग –अलग क्रियाएं हो
,अलग –अलग विभक्तियाँ
मगर ह्रदय से पूछिए ,तो
अर्थ सबका एक है
बता गयी है कान में ,ये
बात शब्द शक्तियां
भले ही अपने सामने
नए नए सवाल हो
मगर हर एक सवाल का जवाब
हम ,जवाब तुम (गुलाब हम,गुलाब तुम ,कुअर बेचैन
)
जिन लोगों ने भारत की प्राचीन उत्कृष्ट
सांस्कृतिक मान्यताओं अथवा चिकित्सा प्रणाली इत्यादि को अपनाकर आधुनिकता के नाम पर
बेच डाला है, और अपनी संस्कृति को किसी भी कारण से हेय मानते हैं, मानो उन्हें लताड़ते
हुए आचार्य सोहनलाल द्विवेदी कह रहे हैं:-
“प्राणों पर इतनी ममता,
और स्वतंत्रता का सौदा?
बिना तेल के द्वीप जलाने,
का है कठिन कसौदा”
एक हजार वर्षों की गुलामी के कारण
यह भारतीय संस्कृति अब हमारे व्यवहार में से लुप्त हो रही है, अतः इसकी रक्षा करना
हमारा कर्तव्य बनता है। संस्कृति -भाषा, भूषा, भजन, भोजन, व्यवहार आदि के द्वारा संचरित
होती है। संस्कृति के इन सभी वाहनों पर आज विदेशी भाषा सवार है, तब इसमें क्या आश्चर्य
कि हम अपनी संस्कृति तेजी से खो रहे हैं।संस्कृति के सभी वाहनों को पुष्ट करना हमारा
प्रथम कर्तव्य हो जाता है। सभी असमताएं भूल कर हम आगे बढ़ पायेंगे ,यह उमंग आज भी कुछ
कवियों की रचनाओं में है .देखिये
“क्षमा ,दया ,संता का हमको
हरदम रहता ध्यान है
सदाचार और शक्ति ,सुसंगति
पर स्वदेश को मान है
हम भारत के नए जागरण ,सत्य
दृष्टि के कूल है
हम स्वतन्त्रता के संरक्षक
,हम विवेक के फूल है
अन्धकार में दीप जलाएंगे
,शुभता सद्भाव के
जीना सिखलाएंगे ,हिम्मतहारों
को म शान से “(हम सब रंग बिरंगे फूल है ,राधेश्याम पाठक )
“ पीढ़ियों से जमी है धूल,
आज झाड़ कर उतार दो l
हर परस्पर भेदभाव को, आज
भूलकर बिसार दो Il
हो कहीं भी दूरियां-दस्तूरियाँ,
उनको अब मिटा दो
चरैवेति-चरैवेति, स्वर
चहुँओर- वह हमें भी सूना दो “ll
(पीढ़ियों से जमी है धूल झाड़ कर उतार
दो ,प्रवीन गुगनानी )
आज इस देश के पास विश्व की सबसे अधिक युवा
शक्ति है-परंतु उनमें से कितने लोग इस राष्ट्रीय संकल्प के प्रति प्रतिबद्घ हैं कि
हम देश को पुन: विश्वगुरू के सम्मानित स्थान पर विराजमान कराएंगे? कवयित्री सब से बिनती कर रही है ,
“टूटती आवाज़ में फिर कह
रहा हूँ
साथियों अपने वतन से प्यार
करना” (सिपाही की अंतिम इच्छा ,ज्ञानवती सक्सेना )
भारत की युवा पीढ़ी को
इसकी शक्ति के इस वास्तविक , मूल और नैसर्गिक तत्व को समझना होगा , इसे संरक्षित और
विकसित करना होगा। तभी भारत 21 वीं सदी में विश्व का नेतृत्व कर पाएगा.
“सबसे पहले तुम ही जागे
,फिर जगा दिया संसार सकल
अब चादर ताने पड़े हुए
,है युवक आज आलस्य विकल
फिर एक बार लो अंगडाई”
........ (अब जाग देश के नौ जवान ,धर्मपाल अवस्थी
भारतीयता वस्तुतः मानवता का प्रतीक है. इसलिए भारतीय संस्कृति का वास्तविक अभिप्राय मानव संस्कृति से है. यह संस्कृति एक विशुद्ध विज्ञान है, जिसका आधार प्रकृति के जड़
परमाणु नहीं वरन प्राणी के गहन अन्तराल में
रहनेवाली वह चेतना है जो यदि स्वस्थ दिशा में विकसित हो जाय तो आनन्द के फव्वारे की
तरह फुट पड़ती है और चारो और पवित्रता ,शांति ,स्नेह सोंदर्य और सुख ही सुख फैला देती
है . भारत में जो शान्ति थे अब कम होने का कारण क्या है ? हमसे भूल हुई और पहली भूल
रही कि हमने स्वयं को अपनी प्राचीनता से काटा, अपने सांस्कृतिक मूल्यों से और गौरवपूर्ण
अतीत से और अपने मूल से काटा। प्रत्येक मनुष्य आदिपुरूष का नवीन संस्करण होता है। प्रकृतिचक्र
को देखिए पुरातन ही नूतन बन रहा है। पुरातन और नूतन के इस सत्य को जो समझ लेता है वही
सनातन के रहस्य को जान लेता है
आज सारा विश्व अशांत है और शांति को कब्रों
पर मोमबत्ती जला जलाकर खोज रहा है। पर शांति उससे आंख मिचौली कर रही है। कारण केवल
एक ही है कि शांति की खोज का ढंग विपरीत दिशा में काम कर रहा है। काम अशांति के और
खोज शांति की हो रही है। भारत की प्राचीन संस्कृति जो इस पावन भूमि पर वास्तविक शांति
स्थापित कराने में सहायक बनी थी ,उसी की पुन: स्थापना पर बल देते हुए तथा वर्तमान विश्व
सभ्यता को धिक्कारते हुए रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा :-
“घूम रही सभ्यता दानवी
शांति! शांति करती भूतल में।
पूछे कोई भिगो रही वह क्यों
अपने विषदंत गरल में।।“( मां भारती की वंदना ,दिनकर )
अब भी समय है कि हम अपनी
उल्टी नीतियों की उल्टी परिणतियों से कुछ सीखें और भविष्य के लिए सावधान होकर वर्तमान
का सही परिपे्रक्ष्य में आंकलन, परीक्षण और अनुशीलन करें।
निषकर्ष .
आज़ादी के बाद की राष्ट्रीय कविताओं
में भारतीयता एक व्यापक और बहुआयामी रूप में अभिव्यक्त हुई है। इन कविताओं में केवल
देशप्रेम ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों, सामाजिक यथार्थ और राष्ट्रीय
चेतना का समन्वित चित्र प्रस्तुत होता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के उत्साह के साथ-साथ
विभाजन की पीड़ा, सामाजिक विसंगतियाँ, भ्रष्टाचार और नैतिक पतन जैसे यथार्थ भी कवियों
ने ईमानदारी से चित्रित किए हैं।
इन रचनाओं से यह स्पष्ट होता है कि भारतीयता कोई स्थिर अवधारणा नहीं, बल्कि
समय के साथ विकसित होने वाली जीवंत चेतना है। इसमें अतीत की सांस्कृतिक धरोहर, वर्तमान
की चुनौतियाँ और भविष्य की संभावनाएँ समान रूप से समाहित हैं। कवियों ने भारतीय समाज
को उसकी जड़ों से जोड़ते हुए एक जागरूक, संगठित और मूल्यनिष्ठ राष्ट्र के निर्माण का
आह्वान किया है।
अतः कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता-उत्तर
राष्ट्रीय कविताएँ भारतीयता की सशक्त वाहक हैं, जो न केवल राष्ट्रीय गौरव को स्थापित
करती हैं, बल्कि समाज को आत्मचिंतन और सुधार की दिशा में प्रेरित भी करती हैं।
सन्दर्भ ग्रन्थ
१.आज़ादी के बाद की चुनी हुयी राष्ट्रीय कवितायें ....राधेश्याम
प्रगल्भ ,डायमंड पाकेट बुक्स


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