डॉ.निलंति राजपक्ष¹
प्रॉफ़ेसर, विभागाध्यक्ष, भाषा, सांस्कृतिक अध्ययन और प्रसंगिक कला
विभाग, श्री जयवर्धनपुर विश्व विद्यालय, श्री लंका
एन.अपर्णा नेत्रांजली विद्यापति²
शोधार्थी, भाषा, सांस्कृतिक अध्ययन और प्रसंगिक कला विभाग, श्री
जयवर्धनपुर विश्व विद्यालय, श्री लंका
शोध सार :
किसी देश की संस्कृति, वहाँ के लोगों की पहचान जानने में एक
महत्वपूर्ण मार्गदर्शक होती है। प्राचीन काल से भारत और श्री लंका के बीच मौजूद
आपसी सांस्कृतिक संबंध इन देशों को चुनने का एक प्रमुख कारण था। इसलिए मैं उत्तर
भारतीय क्षेत्रों और श्री लंकाई लोक गीतों के माध्यम से प्रकट होनेवाले दोनों
देशों के ग्रामीण समाज की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के बारे में जानकारी का अध्ययन
करना आशा करती हूँ। दोनों देशों के लोक गीतों में व्यक्त सांस्कृतिक सूचनाओं का
अध्ययन करके नये तथ्य एकत्रित करना और ज्ञान प्राप्त करना है। उत्तर भारत और श्री
लंका के ग्रामीण लोगों की संस्कृति, जन्म से लेकर मृत्यु तक कैसे संचालित होती थी,
यह इसकी मुख्य समस्या है। यह शोध, गुणात्मक शोध प्रविधि के आगमनात्मक दृष्ठिकोण के
आधार पर किया गया है। प्राथमिक स्रोतों के तहत, उत्तर भारतीय और श्री लंकाई लोक
गीतों से संबंधित ग्रंथों का प्रयोग किया और द्वितीय स्रोतों के तहत, इससे संबंधित अन्य ग्रंथ, शोध आलेख तथा अंतरजाल
का प्रयोग किया गया। इस शोध आलेख के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि,
दोनों देशों के लोक गीतों से प्राप्त जानकारियों में समानताओं के साथ-साथ भिन्नताओं
को भी दर्शाती है और दोनों देशों के ग्रामीण लोग अपने जन्म से लेकर मृत्यु तक सभी
विशेष अवसरों के लिए लोक गीतों का उपयोग करते हैं।
बीज शब्द : ऋतु,
पर्व, लोक खेल, संस्कार, सांस्कृतिक
भूमिका :
लोक गीत, किसी भी समाज की
सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक संरचना, परंपराओं और जीवन-मूल्यों के सजीव दस्तावेज़
होते हैं। यह केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि किसी समुदाय के इतिहास,
रीति-रिवाज़ों, मान्यताओं, भावनाओं तथा जीवन-दर्शन को भी अभिव्यक्त करते हैं।
उत्तर भारत और श्री लंका दोनों देशों के समृद्ध लोक-सांस्कृतिक परंपराएँ होनेवाले
देश हैं, जहाँ लोक गीत जनजीवन का अभिन्न अंग रहे हैं। ‘उत्तर भारतीय और श्री लंकाई लोक गीतों से
प्रकट होनेवाली सामाजिक और सांस्कृतिक जानकारी’ विषय का अध्ययन, इन दोनों
क्षेत्रों के लोक जीवन, परंपराओं, सांस्कृतिक विविधताओं और सामाजिक समानताओं को
समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। यह अध्ययन न केवल लोक साहित्य के महत्व को
रेखांकित करता है, बल्कि विभिन्न संस्कृति के बीच संवाद, समझ और सामंजस्य स्थापित
करने में भी सहायक होता है। इस शोध आलेख का मुख्य लक्ष्य यह है कि, इन दोनों देशों की सामाजिक और सांस्कृतिक
स्थिति पर लोक गीतों के प्रभाव के बारे में अध्ययन करना।
शोध समस्या :
उत्तर भारतीय और श्री लंकाई लोक गीतों में प्रकट हुई जानकारियों के
अनुसार दोनों देशों की सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि कैसी थी? यह इस शोध आलेख की मुख्य समस्या है।
शोध प्रविधि :
यह शोध गुणात्मक शोध प्रविधि के आगमनात्मक दृष्ठिकोण के आधार पर किया
गया। आँकड़े विश्लेषण करते समय, पाठ विश्लेषण प्रविधि का प्रयोग किया गया।
प्राथमिक स्रोतों के रूप में उत्तर भारतीय और श्री लंकाई लोक गीतों से संबंधित
ग्रंथं का और द्वितीय स्रोतों के रूप में इस शोध के विषय से संबंधित अन्य ग्रंथ,
शोध आलेख तथा अंतरजाल का प्रयोग किया गया।
शोध विस्तार :
उत्तर भारत एक संस्कृति प्रधान देश है। उत्तर भारत की संस्कृति अत्यंत
प्राचीन, विविधतापूर्ण और जीवंत है। यहाँ की परंपराएँ, कला, संगीत और जीवन शैली,
इस क्षेत्र को एक अनूठी पहचान देते हैं। उत्तर भारत की सांस्कृतिक समृद्धि को
समझने के लिए, इस देश की संगीत तथा गायन, नृत्य, वादन आदि कलाओं का अध्ययन करना
महत्वपूर्ण होता है।
विशेषत: हालांकि वर्तमान तकनीकी प्रगति के कारण इस पर
ज़्यादा ध्यान नहीं दिया गया है, लेकिन भारत में सुंदर परिवेश वाली गाँव हैं, साथ
ही कई ग्रामीण और परिवार हैं, जो सरल विचारों और धारणाओं के साथ सादा जीवन जीते
हैं। तो उनके द्वारा उनके लिए अंतर्निहित संस्कार, गायन शैली, नृत्य, संगीत आदि
कलाओं को सृजित किया गया है। उनमें से लोक
गीत अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारतीय
संस्कृति से उत्तर भारतीय लोक गीतों का घनिष्ट संबंध है।
उत्तर भारतीय क्षेत्रों में, जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन में अनेक
संस्कार होते हैं जैसे, गर्भधान पुंसवन, पुत्र जन्म, मुंडन, यज्ञोपवित, विवाह तथा
मृत्यु आदि। इन सभी अवसरों पर भारतीय ग्रामीण लोगों द्वारा लोक गीत गाये जाते हैं। इन संस्कारों में, विवाह और पुत्र जन्म के
अवसरों पर आनंद तथा उल्लास प्रमुख गीत, पुत्री की विदाई के अवसर पर करुणा प्रमुख
गीत और मृत्यु के अवसर पर शोक प्रधान गीत आदि गाये जाते हैं। संभवत: इनका कोई
मनोवैज्ञानिक कारण हो, जिससे दुख संतप्त
सदस्यों को शोक-सहन की क्षमता मिलती है। मानव जीवन की नश्वरता को बोध कराने का
उद्देश्य भी निहित होता है।
उदाहरण :
“कैसी
लगायी नज़रिया
ननदी तूने कैसी लगाई…..
लाल चूड़ी ननदी हमने मँगाई
भूल गई कंगन लगाना,
ननदी तूने कैसी लगाई…..
विशेषत: पुत्र जन्म के अवसर पर पडोस की स्त्रियाँ लोक गीतों की पंडिता
वृद्धाएँ एकत्र होकर, नवप्रसूता स्त्री के ‘सूतिका गृह’ के द्वार पर बैठकर,
मनोरंजक सोहरों को सुना कर, उस घर में अमृत की वर्षा करती हैं। ये सोहर गीत, अवधी,
पूर्वंचल और बिहार का एक अत्यंत लोकप्रिय लोक गीत है। यह वंश वृद्धि की खुशी और
स्त्री के मातृत्व के सम्मान का प्रतीक है। बालक की बारहवीं संस्कार के साथ ही इन
गीतों की समाप्ति होती है।
गर्भवती स्त्री, जिन विभिन्न वस्तुओं को खाने की इच्छा करती है, उसको
‘दोहद’ कहते हैं। कालिदास ने सुदक्षिणा के दोहद का सुंदर वर्णन भी प्रस्तुत किया
है। इन गीतों में दोहद का उल्लेख अनेक स्थानों में किया गया है। और सोहर के कई
गीतों में ऐसे कहते हैं कि, पुत्र के पैदा होने पर महान उत्सव मनाया जाता है। मगर
पुत्री के जन्म के कारण विषाद की गहरी भाव इन गीतों में दिखायीपड़ती है। इसलिए
पुत्री पैदा होने पर ये गीत नहीं गाये जाते हैं।
तो यहाँ हम खूब देख सकते हैं कि, यद्यपि पुत्र के जन्म पर कितना खुशी
है, फ़िर भी पुत्री जन्म पर लोग कितनी दुखी होते हैं।
जन्म के उपरांत छोटे बच्चे को सुलाने
के लिए भी ‘लोरी’ गीत गाये जाते हैं।
उदाहरण :
(छत्तीसगढ़ी)
“आज जा रे निंदियाँ
आ जा रे।
तोला
नोनी ह बोलाथे, आज जा रे।।”
भारतीय संस्कृति में ‘नामकरण’ संस्कार बच्चे के जन्म के बाद पहला और
अत्यंत महत्वपूर्ण उत्सव होता है। इस अवसर पर गाये जानेवाले लोक गीतों को सोहर और
बधाई कहा जाता है।
उदाहरण : (
सोहर गीत )
“चाँद तारों से सुंदर हमारा ललना।
नाम रोशन करेगा हमारा
ललना।”
उत्तर भारत में बच्चे के जन्म के समय से लेकर नामकरण तक ‘सोहर’ गाये
जाने की परंपरा है। इन गीतों में प्रभु राम या कृष्ण के जन्म का प्रसंग गाकर बच्चे
की तुलना इन्हीं देवताओं से की जाती है।
और बधाई गीत मुख्य रूप से नामकरण
और छठी के मौके पर गाये जाते हैं। इनमें बच्चे के जन्म पर मिलनेवाली
बधाइयों और रिश्तेदारों के हर्ष का वर्णन होता है।
‘अन्नप्राशन’ भी अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार है। इस अवसर पर गाये
जानेवाले पारंपरिक लोक गीत हैं और सोहर गीत, बच्चों के इस महत्वपूर्ण संस्कार में
खुशियाँ और मंगल कामनाएँ भर देते हैं। यह आध्यात्मिक गीत बच्चों को सात्विक और
उत्तम आहार देने की प्रेरणा देती है और समारोह के दौरान पूजा में बहुत गाया जाता
है।
उदाहरण :
“शुभ अन्नप्राशन का यह,
संदेश
सुनाता है,
जैसा खाते अन्न हमारा,
मन वैसा बन जाता है”।
मुंडन संस्कार भी एक विशेष अवसर है। यह भारत के सोलह संस्कारों में से
एक महत्वपूर्ण संस्कार है। बालक जब बड़ा होने लगता है, तब उसका मुंडन संस्कार किया
जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य बच्चे के स्वास्थ्य की रक्षा, बेहतर शारीरिक विकास
और शुद्धता प्राप्त करना है। इस अवसर पर मुंडन के गीत गाना विशेष है। इस संस्कार
के पहले, बालक के बालों को काटना निषिद्ध है। बालक के जन्म के विषम वर्ष में, इस
कार्य संपादित किया जाता है और इसमें अधिक विलम्ब करना अनुचित है। किसी पवित्र
तीर्थस्थान में नदी के किनारे, अपने बालकों का मुंडन कराते हैं।
उदाहरण :
“मुंडन की आई बहार हो चली आव
मोरी ननदी
भाभी तोहर दिलदार हो चली
आव मोरी ननदी
मुंडन की आई बहार हो चली
आव मोरी ननदी”
यज्ञोपवित भी एक विशेष संस्कार है जो प्राचीन काल से बड़ा महत्व था।
इस पवित्र अवसर पर महिलाओं द्वारा मंगल गीत, सोहर और भजन आदि गाये जाते हैं, जो
बालक को विद्या और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। आज भी भारतीय समाज
के उच्च वर्ण-ब्राह्मण तथा क्षत्रीय के लोग, इसको बड़े उत्सव के साथ करते हैं।
प्राचीन भारतीय समाज में यज्ञोपवित संस्कार के पश्चात, छात्र, गुरु के पास गुरुकुल
में भेज दिया जाता है, इसलिए इस संस्कार को ‘उपनयन’ कहते हैं। यज्ञोपवित धारण करने
के समय से ब्रह्मचारी को कुछ नियमों का पालन करना आवश्यक होता है, जैसे ब्राह्मण बालक का आठवें वर्ष में,
क्षत्रीय बालक के ग्यारहवें वर्ष में वैश्य का बारहवें वर्ष में ही यज्ञोपवित
संस्कार करना सम्मत है। इस संस्कार में भिक्षा माँगना एक प्रमुख विधि है। विभिन्न भारतीय भाषाओं जैसे हिंदी, अवधी,
भोजपुरी और मैथिली में गाये जानेवाले यज्ञोपवीत के प्रमुख संस्कार गीत होते हैं।
उदाहरण :
“छूटि-छूटि
अँगना में,
माटी खोदाई हो,
बरुआ के अंगना...
‘विद्यारंभ’ संस्कार से बच्चे का अक्षर लिखना आरंभ करता है। यह बच्चे
की औपचारिक शिक्षा शुरू करने का एक पावन हिंदू संस्कार है। इस अवसर पर माँ सरस्वती
और गणेश जी की वंदना गाकर ज्ञान की देवी का आशीर्वाद लिया जाता है।
उदाहरण :
“बुद्धि के दाता तुम हो गणपति महाराज,
शुभ घड़ी में आज हम करते हैं काज।
विद्यारंभ का ये पावन है
संस्कार,
कृपा
करो माँ, तुम पर है आधार।।”
भारतीय समाज में जन्म संस्कार के बाद सबसे
महत्वपूर्ण संस्कार है, ‘विवाह’। इस समाज में विवाह, सांस्कृतिक जीवन आवश्यक अंग
है। विवाह के गीत, वर और कन्या दोनों के घरों में गाये जाते हैं। जिस दिन वर का
तिलक चढ़ता है, उसी दिन से विवाह के गीतों का आरंभ होता है। जहाँ वर पक्ष के गीतों
में उछाह तथा उत्साह की प्रचुर मात्रा में दिखायी पड़ती है, वहाँ कन्या पक्ष के
गीतों में विषाद की गहरी रेखा पायी जाती है।
उदाहरण : ( वर पक्ष के लोक गीत)
“जितनी जी ने भेजा, शादी
का जोड़ा बन्नी,
जितनी
दिन भेजा वो चुनरी ओढ़ाएगा,
बन्नी तेरा बन्ना चुनरी ओढ़ाएगा।
बन्नी
तेरा बन्ना चुनरी ओढ़ाएगा...”
ये गीत ‘बन्नी गीत’ कहा जाता है, जो शादी में उल्लास भर देते हैं। जब
दूल्हा बारात लेकर दुल्हन के घर जाने के लिए तैयार होता है, तब इन गीतों की शुरूआत
होती है।
उदाहरण : ( कन्या
पक्ष के लोक गीत )
“कहे बाबा से रो
रो लिपट के,
रोए दादी के आँचल
में छिप के,
प्यारे बाबा मेरी
प्यारी दादी मेरी सुनते जाना
दादी बाबा हमें नई
भुलाना”
यह भारतीय विवाह परंपरा का एक भावुक और महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये गीत
बेटी को विदा करते समय गाये जानेवाले भावुक गीत हैं, जो माता-पिता और भाई-बहनों के
वियोग को व्यक्त करते है।
उदाहरण :
“दिनवा हरेलू ए बेटी भुखिया रे पिअसिया
रतिया हरेलू आँखि निनियाँ नु हो”
यहाँ वेदनाभरी भाव इस गीत में प्रकट होती है। यदि पिता कहीं योग्य वर
न मिलने की चिंता से व्याकुल है तो, कहीं माता,
पुत्री जन्म के कारण अपने भाग्य को कोस रही है। इसलिए इन गीतों में एक प्रथा उल्लेख है, जो
साधारणत: भारतीय समाज में नही पायी जाती।
किसी विवाह के साथ पुत्री की विदाई होती है, उसको ‘गवना’ अर्थात जाना कहते हैं।
उत्तर भारतीय लोग विवाह के पश्चात, लड़की की विदाई करने के अवसर पर गवना के गीत
गाते हैं।
मानव जीवन का अंतिम संस्कार है, ‘मृत्यु’। जैसे ही उत्तर भारत में
बहुत संस्कारों के अवसर पर लोक गीत गाये जाते हैं, वैसे ही मृत्यु के अवसर पर भी
गीत गाये जाते हैं। इनमें विषाद की गहरी रेखा पायी जाती है।
प्राय: इन गीतों में किसी छोटे बच्चे की मौत हो गयी तो, उसकी सुंदरता,
रूप, भोलापन आदि का उल्लेख किया जाता है। परिवार के किसी ‘कमासुत’ व्यक्ति मर गया
तो, परिवार की आर्थिक दुर्दशा का चित्रण, इन लोक गीतों में प्रस्तुत होता है। ऐसे
उत्तर भारतीय समाज में मृत्यु के विविध गीत सुनाये जाते हैं।
उदाहरण : “साजन न झुलमे द्वार,
हरि
रे किसन कैसे तिरयऔ।
काए
के कारण गऊ दाई
काए के दिए गऊ दान।”
उपर्युक्त ब्रज भाषा के मृत्यु गीत में, मृत व्यक्ति के अनेक प्रिय
पदार्थों के नाम लेकर शोक प्रकट किया जाता है। और मृत्यु के समय गोदान का भी
उल्लेख है।
इनके अतिरिक्त, भारत में पावस ऋतु में जो गीत गाये जाते हैं, उनको
‘बारहमासा’ कहते हैं। जीवीकोपार्जन के लिए अपने पति परदेश जाकर, बरसों से लौट नहीं
आने के कारण, ऐसी दशा में विरहिणी वेदना की चरमोत्कर्ष पर पहूँच जाती है और उसकी
मनोव्यथा बारहमासे के रूप में इन गीतों में प्रकट होते हैं।
उदाहरण : (छत्तीसगढ़ी लोक गीत)
“आसाढ़ माह ब्रिज
लागत ललिता।
चुहुं दिसि बादल
पावे।।”
श्री लंका में, सिंहली ग्रामीण जीवन सामूहिकता पर आधारित है। लोक
गीतों को एक शक्तिशाली माध्यम के रूप में वर्णित किया जा सकता है, जिसके माध्यम से
सिंहली लोगों द्वारा जन्म से मृत्यु तक के जीवन के विभिन्न पहलुओं, उनके
व्यक्तित्व के निर्माण तथा उस सामाजिक-सांस्कृतिक पुष्ठिभूमि के बारे में जानकारी
प्राप्त कर सकता है, जिसमें वे रहते हैं। श्री लंका में भी भारत की तरह जन्म से
लेकर विवाह तक के अवसर पर लोक गीतों से घनिष्ट संबंध है। उस समय श्री लंकाई
ग्रामीण लोगों का मानना था कि, बच्चे के जन्म के समय, धार्मिक अनुष्ठानों पर
आधारित ‘गर्भवस्था जुलूस’ करके गर्भस्थ शिशु की सुरक्षा के लिए शांति करना आवश्यक
था। इस जुलूस के बाद, महिलाओं में एक गहरी तड़प पैदा होती है, जो किसी चीज़ के लिए
एक तीव्र इच्छा होती है।
उदाहरण : “कन्द उडिन् गेनेना मल् सुवद
दीदी
बण्डक्का मट कन्नट सितुणि नॉदी
वं
गेडिये कॉटला मिरिस् कुडु नॉदी
गॅब् गत् दा पटन् मट दॉलदुक उपदी”
इसके अतिरिक्त, बच्चे के जन्म के समय, श्री लंका के विभिन्न क्षेत्रों
में बोली जानेवाली भाषा में अनेक अंतर देख सकते हैं। जैसे दाई, बच्चे को अपने
हाथों में लेकर इस तरह जवाब देती है। “हमको या तुझको ?” तब उसके जवाब से आस-पास के
रिश्तेदार समझ जाते हैं कि, लड़का या लड़की पैदा हुई।
उत्तर भारत की तरह श्री लंका में भी अन्नप्रशान संस्कार होता है।
सिंहली में इसको ‘रंकिरी कट गैम’ या ‘इंदुल् कट गैम’ कहते हैं। इस अनुष्ठान के
दौरान कविताएँ गाने की परंपरा है, जब किसी बच्चे को पहली बार स्तनपान के अलावा कोई
अन्य भोजन दिया जाता है। बच्चे के स्वास्थ्य और भविष्य की समृद्धि की कामना की
जाती है।
उदाहरण :
“अते तियेन रन् मुदुवेन् किरि अरगेन
कटे गानवा अपे पुंचि
पुतुट मेलेसिन्
दिगासिरि पता देवि
पिहिटेन् सॅमविटम
बुदुन् सरण यन दरुवेक्
वेवा निरतुरुव”
इस लोक गीत में यह कहता है कि, हाथ से दूध लेकर, छोटे बच्चे के मुंह
में डालने के बाद उसको दीर्घायु की कामना करता है।
उत्तर भारत की तरह श्री लंका में भी, जब बच्चा पाँच साल का होता है,
तब एक शुभ समय निर्धारित करके ’विद्यारंभ’ करता है। इससे बच्चा पहली बार अक्षर
लिखना आरंभ करता है। इस अवसर पर सरस्वती देवी से माँगते हैं कि मुझे अक्षर पढ़ने
की बुद्धि प्रधान करें।
उदाहरण : “सरस्वती मैणियनि वरम् देवा
अकूरु कियवन्नट मट नॅण
देवा”
बच्चियाँ बचपन से यौवनारंभ में प्रवेश करती हैं, तब श्री लंका में
विभिन्न व्रतों के साथ-साथ एक उत्सव के रूप में होता है। उस अवसर को सिंहली में
‘मल्वर मगुल’ संस्कार कहते हैं। यह लड़कियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण अवसर होता है।
यद्यपि यह श्री लंका में बडे उत्सव के साथ करते हैं फ़िर भी उत्तर भारत में इस
अवसर पर लड़कियाँ विशेष कुछ नहीं करती और चुपचाप रहती हैं।
उदाहरण : “दॉलॉस् वियट पत् मेकुमरि वसना
संद सॅपेन नॉमिन
नॉलॉस्व ऐ मल्वर वी सकियनि वॅडिविय
पॅमिणित….”
यौवनारंभ के बाद जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अवसर, ‘विवाह’ होता है। बहुत
लोग मानते हैं कि, सिंहली समाज में स्वीकृत विवाह का तरीका, मामा की बेटी से शादी
करना है। पुराने समय उसके लिए भी लोक गीत निर्मित थे। पर आजकल इस विचार इतना नहीं
होता।
उदाहरण : “मीरा अयिति कितुले कल वॅद्दाटयि
नैना अयिति काट द मस्सिनाटयि…”
श्री लंकाई समाज में विवाह के समय दहेज देना, एक प्रथा था। यहाँ
दुल्हन की माँ-बाप अपनी बेटी को उसके नये जीवन के लिए उपयोगी उपहार देते हैं। पर
आजकल प्राय: इस प्रथा नहीं देख सकता। यद्यपि श्री लंका में इस प्रथा का बड़ा महत्व
नहीं, फ़िर भी उत्तर भारत में दहेज की प्रथा, एक मुख्य संस्कार होता है।
उदाहरण : “नॅन्दे नुंबे दुव देनवद बक महट
कासि मुदल नॅत बैनो दुव देन्ट
कासि
मॉटद गह कॉल नम् हॉदयि मट”
उपर्युक्त सिंहली लोक गीत में यह कहता है कि, एप्रिल माह में उसकी
मामी की बेठी को शादी करने के लिए माँगता है, तब वह कहती है कि, हमारे पास पैसे
नहीं। फ़िर वर कहता है कि, पैसे नहीं चाहिए, सिर्फ़ संपदा अच्छा है।
इनके अतिरिक्त भारत में कई ऋतुओं से संबंधित लोक गीत भी होते हैं।
उनसे विशेष रूप से उत्तर भारत के सांस्कृतिक जानकारी प्रस्तुत होते हैं। उनमें
प्राय: जन-मानस पूर्ण तरंगित दिखायी पड़ती है। ऋतु संबंधित गीत गाने की
प्रथा, उत्तर भारत में बहुत समय से पहले
चली आ रही है और यहाँ के कई राज्यों में विभिन्न ऋतुओं के गीत गाने की परंपरा
प्रचलित है।
सावन अर्थात अगस्त के मन-भावन महीने के भारतीय उत्तर क्षेत्रों में
‘कजली’ गीत गाने की प्रथा है। कजली की लोकप्रियता भोजपुरी क्षेत्र में अधिक है।
वर्षा के ऋतु में काले बादलों से भरे आकाश के नीचे, एक खुले मैदान में ग्रामीण लोग
कजली गाये जाते हैं। सावन की फुहारों और प्रकृति के सौंदर्य का वर्णन करते हुए
कजली गीत निर्मित है।
उदाहरण : “सजनी सावन मास सुहावन,
बोले मोर पपीहा।
रिमझिम बरसे सावन बदरिया,
सखियाँ झूलन जायँ।”
सावन के माह में उत्तर भारत की बहुत गाँवों में, बाग या किसी नात्णाव
के किनारे झूले लगाये जाते हैं, जिनमें गाँव की स्त्रियाँ और पुरुष झूल झुलाते
हैं। इस झूल लगाने के लिए सुंदर काट के चौकोर खंड को रंगीन रस्सी से बाँधकर, किसी पेड़ की शाखा से उसको लटका देते हैं।
उसके बाद, ‘होली’ भारत का एक सार्वजनिक उत्सव है, जो फालगुन मास में
मनाते हैं। फालगुन मास में होने के कारण, इसको भोजपुरी प्रदेश में ‘फगुआ’ और
मैथिली में ‘फाग’ भी कहते हैं। इस दिन बहुत गाँववाले किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के
द्वार पर एकत्र होकर, फगुआ के गीत गाये जाते हैं। होली के अवसर पर गालियों के गाने
की भी बड़ी प्रथा है, उसको ‘कबीर’ कहते हैं।
उदाहरण : “अररर अररर भइया, सुन लेउ मोर कबीर।”
यहाँ उत्तर भारत के विविध क्षेत्रों के लोगों द्वारा होली मनाने की
विधि और विश्वास को प्रस्तुत होता है।
एक विशेष ऋतु संबंधी गीत प्रकार है, ‘चैता’। चैत्र के महीने में गाये
जाने के कारण इनको चैता कहते हैं। भोजपुरी में इसको ‘घाँटों’ कहते हैं और मैथिली
में इसको ‘चैतावार’ कहते हैं। ये गीत झाल कूटकर, बजाकर समूह में गाया जाता है, पर
कुछ समय कोई व्यक्ति विशेष गाया जाता है। इन गीतों में प्राय: वसंत की मस्ती और
रंगीन भावनाओं का अनोखा सौंदर्य अंकित किया गया है।
उदाहरण : “चैत बीति जयतइ हो रामा
तब
पिया की करे अयतइ।
आरे अमुआ मोजर गेल,
फरि
गेल टिकोरवा”
पावस ऋतु में जो गीत गाये जाते हैं, उनको ‘बारहमासा’ कहते हैं।
जीविकोपार्जन के लिए अपने पति परदेश जाकर, बरसों में लौट नहीं आने के कारण, ऐसी
दशा में विरहिणी वेदना की चरमोत्कर्ष पर पहूँच जाती है और पत्नी की मनोव्यथा
बारहमासे के रूप में इन गीतों में प्रकट होता है।
उदाहरण : (छत्तीसगढ़ी
गीत)
“आसाढ़ माह ब्रिज लागत ललिता
चुहूं दिसि बादल पावे।।”
उपर्युक्त लोक गीत में पुराने समय भारतीय समाज में हुई गरीबी, बेबसी
आदि व्यंग रूप से दिखाया गया है।
किसी देश की संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग है, व्रत। उत्तर भारत में
प्रत्येक माह में कोई-न-कोई पर्व या व्रत होते हैं। इन सभी अवसरों पर बड़े उत्साह
से स्त्रियों द्वारा मनाया जाता है और इनमें गीत गाना एक प्रथा होता है। महीनों के
क्रम से इन पर्वों का संक्षिप्त वर्णन प्रस्तुत हो जाता है।
श्रावण शुक्ल पंचमी को ‘नाग पंचमी’ कहते हैं। इस दिन में सर्प की पूजा
की जाती है और भारत में नाग पूजा अत्यंत पुराने समय से चली आ रही है।
उदाहरण : “आला
बाई श्रावण सण पंचमीचा
छंड
महोरचा मला छंड महोरचा।।
सशकूया जावा मिकुनी शेल्या
सर्वच आपुल्या माहेराला”
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को ‘गोधन’ का व्रत मनाया जाता है। उत्तर
प्रदेश में पूर्वी ज़िलों में इस दिन गोबर से मनुष्य की प्रतिमा बनायी जाती है और
स्त्रियाँ उसको मूसल से कूटती हैं। पुराने समय गोवर्धन पूजा ‘गोधन’ के रूप में आज
होता है। इस अवसर पर भी गीत गाते हैं।
इनके साथ-साथ, श्री लंका में
विभिन्न त्योहार मनाये जाते हैं। उनमें से नये वर्ष का त्योहार, बड़ा प्रसिद्ध और
सिंहली लोगों को एक महत्वपूर्ण पर्व है। सिंहली नया वर्ष सांस्कृतिक परंपराओं से
समृद्ध समय है, जो लोक गायन और संगीत से गहराई से जुड़ा हुआ है। खासकर प्राचीन
अनुष्ठानों और नव वर्ष के कुछ खेलों के दौरान, ये लोक गीत गाये जाते हैं।
सिंहली नव वर्ष के दौरान सिर पर तेल लगाना एक विशेष व्रत होता है। तेल
लगाने की रस्म में, जीवन, रंग, खुशी, शक्ति और ज्ञान के पांच आशीर्वादों की कामना
करते हुए कविताएँ गायी जाती हैं।
उदाहरण : “नुग
पत् पॅलद देपयिन्,
करद
पत् हिस मत तबा
देवियन् बंदिना लेसिन्,
नानु गा तेल तबनु मॅनवि”
सिर और पैरों पर सरसों या तिल के तेल जैसे औषधीय तेल लगाने की परंपरा
है। इसके बाद, वे उचित रंगों के वस्त्र पहनते हैं और दिशा की ओर देखकर, आशीर्वाद
देते हैं।
ये लोक गीत नये वर्ष के लोक खेलों और गतिविधियों की सांस्कृतिक
समृद्धि को खूबसूरती से दर्शाते हैं। उनमें से ‘पंच केलिय’, ‘ऑलिंद केलिय’, ‘मेवर केलिय’ आदि विशेष हैं। ऑलिंद केलिय अर्थात रत्ती का खेल, एक अद्भूत लोक खेल है
जिसको रत्ती का उपयोग करके खेला जाता है, जिसमें रत्त को उपयुक्त छेदों में डाला
जाता है और रत्ती की कविताएँ गायी जाती हैं।
उदाहरण :
“केलिमु ऑलिंद अपि देपिल बेदीला
कियमु अमुतु रस बस् अंगवाला
बला मदेस दॅक बॅरि पिटुपाल
पिरिमि
सिटिति कवि देपस बेदीला”
मेवर केलिय, लड़कियों द्वारा खेले जानेवाले इस प्राचीन खेल में, वे एक
घेरे में खड़ी होती हैं, एक-दूसरे का हाथ पकड़ती हैं और ज़मीन पर एक कान की बाली
गिराती हैं। वह सोने का आभूषण होता है। उसके बाद एक व्यक्ति उसको अपने पैर से
छुपाकर ढूँढती है। यहाँ उस कान की बाली को ‘मेवरया’ कहा जाता है।
उदाहरण : “सार
सदिसि पेति पेर नेलन कल वर गियदो मगे
मेवरया
नैनो
उंब पल् नुंबे दरुवन् पल् अप दुटुवे नॅत
मेवरया
कहवतु कन्दे कह कॉटना दा वर गिय दो मगे मेवरया
नैनो
उंब पल् नुंबे दरुवन् पल् अप दुटुवे नॅत
मेवरया”
हालांकि श्री लंका में यह प्रथा अब धीरे-धीरे लुप्त हो गयी है, लेकिन
झूला झूलना नव वर्ष के मौसम के दौरान एक विशेष लोक गतिविधि के रूप में वर्णित किया
जा सकता है, जो प्राचीन काल से गाँवों में देखा जा सकता है। इसके लिए भी
अंतर्निहित लोक गीत होते हैं।
उदाहरण : “मितुरु
मेनुंब अप एक्व सियल्ला
कतुरु लेसट बॅद रन् ऑचिल्ला
नतर
लमिन् गुवने ऑचिल्ला
मेवर
पदिमु अपि रन् ऑचिल्ला”
यहाँ झूले को सिंहली में ‘ऑंचिल्ला’ कहते हैं। इस लोक गीत से यह कहता
है कि, सभी मित्र मिल जुलकर कैंची की तरह बाँधे हुए सोने के झूले को आसमान में
रुकते हुए झूलेंगे।
इस प्रकार उत्तर भारतीय और श्री लंकाई लोक गीतों में प्रकट होनेवाले
संस्कार तथा ऋतुओं, पर्वों, लोक खेलों और गतिविधियों आदि से युक्त सांस्कृतिक
जानकारी को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया जा सकता है।
निष्कर्ष :
किसी देश की संस्कृति का अध्ययन, उसके ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और समाज को
समझने का एक महत्वपूर्ण तरीका माना जाता है। अतः यह स्पष्ट है कि, किसी देश की
सांस्कृतिक जानकारी की अच्छी समझ वहाँ के लोगों के साहित्य के माध्यम से प्राप्त
की जा सकती है। तो मेरे द्वारा चयनित उत्तर भारतीय और श्री लंकाई लोक गीतों से उन
दोनों देशों की सांस्कृतिक जानकारी प्रस्तुत होती हैं।
इस अध्ययन में, उत्तर भारत एक महान सांस्कृतिक महत्व वाले देश के रूप
में एक अद्वितीय स्थान रखता है। अर्थात्, यह स्पष्ट है कि उत्तर भारतीय समाज में
जन्म से लेकर मृत्यु तक, हर विशेष समारोह में लोक गीतों का एक प्रमुख घटक के रूप
में उपयोग किया जाता है। ये लोकगीत जन्म से लेकर बचपन तक, बारह वर्ष की आयु में,
विवाह के समय, मृत्यु के समय, साथ ही भारत की अनूठी विभिन्न ऋतुओं और त्योहारों के
दौरान किये जानेवाले अनुष्ठानों और प्रक्रियाओं के बारे में बहुत तथ्य प्रकट करते
हैं।
उसी तरह श्री लंका में भी जन्म से लेकर मृत्यु तक कई अवसरों पर किये
जानेवाले पुराने संस्कार और विशेषत: नये वर्ष के त्योहार में किये जानेवाले लोक
खेल तथा गतिविधियों को श्री लंकाई लोक गीतों से खूब प्रकट करते हैं।
उत्तर भारत के लोक गीतों में बेटे के जन्म पर होनेवाले प्रतिक्रिया के
साथ-साथ बेटी के जन्म पर समाज द्वारा महसूस किये जानेवाले शोक को स्पष्ट रूप से
दर्शाया गया है। और बहू-सास के बीच की दुर्घटनाएँ उनसे नारी की स्थिति खूब
प्रस्तुत होती हैं। और विवाह के अवसर पर कन्या पक्ष के गीत, बहुत मर्मस्पर्ष होते
हैं और वर पक्ष के गीत, उल्लास के साथ गाते हैं। भारतीय लोग मौत के अवसर पर भी लोक
गीत गाये जाते हैं।
श्री लंका में भी बच्चियों के बारह साल होने पर ‘मल्वर नॅकत’ संस्कार
करते हैं। विवाह होने के लिए अपने मामा की बेटी से करवाना एक विशेष बात है। इन
विशेष सूचनाओं के अतिरिक्त, कई समानताएँ भी होती हैं।
गर्भवती समय में दोनों देशों की स्त्रियों को विभिन्न चीज़ें खाने की
इच्छा करती हैं। और इन लोक गीतों से ये प्रकट होते हैं कि, बचपन में, अन्नप्रशान’
या ‘रंकिरि कट गैम’, विद्यारंभ करना, विवाह के अवसर में कन्या पक्ष से दहेज देना
आदि सभी संस्कार उत्तर भारत तथा श्री लंका दोनों देशों में होते हैं।
इनके बाद उत्तर भारत और श्री लंका दोनों देशों में लोग विभिन्न पर्व
मनाते हैं। इन अवसरों पर गाये जानेवाले लोक गीतों से उन उत्सव में करनेवाले सभी
सांस्कृतिक संस्कार और गतिविधियों को प्रस्तुत करते हैं, फ़िर भी उनमें असमानताएँ
होती हैं। समस्त रूप से यह स्पष्ट है कि, दोनों देशों के लोक गीतों द्वारा
समानताओं तथा असमानताओं के साथ-साथ सांस्कृतिक आश्चर्य को अच्छी तरह प्रकट करते
हैं।
संदर्भ ग्रंथ सूची :
हिन्दी ग्रंथ :
• पंडित त्रिपाठी रामनरेश, कविता कौमुदी-पाँचवा भाग, हिंदी मंदिर
प्रयाग, 1929, पृ. 110 -131
• डॉ. शर्मा. कृष्णदेव, लोक साहित्य : समीक्षा, नई सड़क दिल्ली, अशोक
प्रकाशन, 1974, पृ. 56 – 111
• डॉ. उपाध्याय. कृष्णदेव, भोजपुरी लोक साहित्य का अध्ययन, Digital library
India Jaigan, 1960, पृ. 62 – 117
• डॉ. कपूर. नवरत्न, उत्तर भारत के लोक पर्व, North zone
cultural centre, Patiala, 1999, पृ. 8 – 20
• डॉ. उपाध्याय. कृष्णदेव, लोक साहित्य की भूमिका, लोक भारती प्रकाशन
साहित्य भवन, 1957, पृ. 65 – 89
शोध आलेख :
• डॉ. शुक्ल अजय कुमार , “छत्तीसगढ़ी और भोजपुरी लोक गीतों का
तुलनात्मक अध्ययन”, International Journal of Mechanical Engineering, Vol.6, Issue
Nov-Dec 2021, पृ. 1076-1082, Kalahari Journals.
सिंहली ग्रंथ :
• सरच्चन्द्र एदिरिवीर, सिंहल गॅमि नाटकय, कॉलंबो, सी/स एस् गॉडगे
& ब्रदर्स, 1966, पृ.25-28
• अहुबुदु अरिसेन्, हेल
अवुरुदु वग, बॉरलॅस्गमुव, पॉलयिट्
मुद्रणालय, 2006, पृ. 28-30
• प्रॉफेसर अमरसेकर. दया, जन
कविय सह गॅमि समाजय, कॉलंबो, सी/स एस् गॉडगे & ब्रदर्स, 2015, पृ. 105-114
Links :
• https://mihira.lk - (2026.06.02)
• https://www.scribd.com -
(2026.05.25)
• https://www.exoticindiaart.com -
(2026.05.28)
• https://archive.org (2026.05.04)
लगु चिह्न तालिका :
• ल / ग - हेल वग (हलंत न होनेवाले अक्षरों
को दर्शाता है।)
• पृ. -
पृष्ठ
• प्रॉ -
प्रॉफे़सर
• डॉ. -
डॉक्टर


0 Comments