Sahitya Samhita

Sahitya Samhita Journal ISSN 2454-2695

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​मैं खुद से ही क्यों थक जाती हूँ। Why I get Tired of Myself Poem



​मैं खुद से ही क्यों थक जाती हूँ।
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मैं खुद से ही क्यों थक जाती हूँ,
अपनी दिशा देख क्यों रुक जाती हूँ?

औरों को  सिखाते सिखाते, 
खुद क्यों भूल जाती हूँ।

​ऐसा क्या है, जो मिला नहीं,
या अब तक जिसकी तलाश है?
कोई अधूरा सपना,
या कल की चिंता का वास है?

​रात को नींद नहीं, दिन को चैन नहीं,
सब सही है, पर कुछ भी सही नहीं।

 कभी हंसी की फुहार है,
तो कभी दुखों के थपड़े हैं।

​सब तरफ हँसी का मेला है,
सब रंगीन और सुनहरा है;
ऐसा लगता है, बस गमों के बादल छटने को हैं,
पर फिर एक बंद दरवाज़ा, फिर वही एक तलाश है।

​इस भागती-दौड़ती ज़िंदगी में,
बस... खुद की तलाश है।

 Anupama arya 


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