मैं खुद से ही क्यों थक जाती हूँ।
_______________________
मैं खुद से ही क्यों थक जाती हूँ,
अपनी दिशा देख क्यों रुक जाती हूँ?
औरों को सिखाते सिखाते,
खुद क्यों भूल जाती हूँ।
ऐसा क्या है, जो मिला नहीं,
या अब तक जिसकी तलाश है?
कोई अधूरा सपना,
या कल की चिंता का वास है?
रात को नींद नहीं, दिन को चैन नहीं,
सब सही है, पर कुछ भी सही नहीं।
कभी हंसी की फुहार है,
तो कभी दुखों के थपड़े हैं।
सब तरफ हँसी का मेला है,
सब रंगीन और सुनहरा है;
ऐसा लगता है, बस गमों के बादल छटने को हैं,
पर फिर एक बंद दरवाज़ा, फिर वही एक तलाश है।
इस भागती-दौड़ती ज़िंदगी में,
बस... खुद की तलाश है।
Anupama arya


0 Comments