मेरा घर उस गली में बसता है,

जहाँ लोगों का दिल और दिमाग खुलता है।

​बड़ा सा बगीचा, उसमें झूलता एक झूला,
शाम की चाय और पड़ोसियों से गपशप का सिलसिला।

​उसके अंदर बैठक सा एक प्यारा कमरा,
दीवारों पर सजी यादों का वो गहरा घेरा;
वो तस्वीरें जो अपनों का हाल बताती हैं,
पुरानी यादों को फिर से ताज़ा कर जाती हैं।

​किताबों का शौक, जिनमें आधी अभी छुई भी नहीं,
ऐसी सुकून भरी जगह, शायद कहीं और नहीं।

​बगल में रसोई, जहाँ स्वादिष्ट खाना बनता है,
सोने के कमरे, जहाँ सपनों का ताना-बाना बुनता है।

मेरे ही रंग-रूप से सजा, मेरा वो घर दिखता है,
मेरे ही साये में ढलकर, वो मेरा अपना घर बनता है।

​घर के बाहर खुली सड़कें, रेहड़ी वालों का शोर,
खिल उठता है मेरा मोहल्ला, जब होती है नई भोर।

पड़ोसियों की रौनक से ही, तो वो मोहल्ला सजता है,
उन्हीं की बातों से, मेरा हर दिन गुज़रता है।

​शुरुआत से अंत तक का, एक खूबसूरत सफर है,
तभी तो मुकम्मल हुआ, मेरा ये छोटा सा घर है।

"आशीर्वाद" नाम से ही, मेरी पहचान बनती है,
मेरा घर उसी गली में, बड़े मान से बसता है।