सुना है मैंने बहुत कुछ अपने बारे में,
सबकी कहानियों में खुद को अलग-थलग पाया है।
कहीं कोई किरदार, कहीं रंग-रूप,
तो कहीं सिर्फ नज़रियों का साया है।
कभी चाल-ढाल, तो कभी वक्त की रफ़्तार थी मैं,
कभी खुद के गिरने, तो कभी उठने की पुकार थी मैं।
कभी ज़िद्दी-अड़ियल, कभी बिखरी, कभी सिमटी हुई,
कभी रास्तों पर भटकती, कभी मंज़िल से लिपटी हुई।
कभी महफ़िल में घुलती, कभी अनजान निकलती,
कभी बदतमीज़ कहलाती, कभी सबसे झगड़ती।
हाँ, सबकी कहानियों में बिल्कुल जुदा थी मैं,
मगर अपनी हकीकत में, खुद की ही अदा थी मैं।
एक कहानी ऐसी भी थी, जिसमें पूर्ण थी मैं,
जहाँ अपने ही असली रंग और नूर में थी।
बिना किसी नकाब के, बिना किसी पर्दे के,
खुद के हक के लिए खड़ी, अपने ही गुरूर में थी।
मुझे ऊंचे आसमानों को छूना था,
ख्वाबों के नए ताने-बाने बुनना था।
सफलता की राहों पर तन्हा ही निकलना था,
गिरकर खुद की ही बाँहों में संभलना था।
अपनी मुस्कान को खुद ही थामना था,
बहते हुए अश्कों को खुद ही रोकना था।
किसी के सहारे नहीं, खुद के साथ चलना था,
औरों के किस्सों में नहीं, अपनी कहानी में ढलना था।
अपने ही अंतर्मन की गहराइयों को पढ़ना था,
सूरज सा जलना था और तारों सा चमकना था।
अब किसी और की आँखों में नहीं झाँकना मुझे,
खुद के ही दर्पण में, बस खुद से ही मिलना था।
Anupama Arya
Place: Agra, Uttar Pradesh

