रंजीत कुमार सिंह
शोधार्थी, स्नातकोत्तर मनोविज्ञान विभाग
वीर कुॅवर सिंह विष्वविद्यालय, आरा
डाॅ कुमारी साधना
सहायक प्राध्यापक, मनोविज्ञान विभाग
एच0डी0 जैन काॅलेज, आरा
भारत के सरकारी एवं गैर सरकारी क्षेत्रों में कुल मिलाकर लगभग 5 करोड़ से ऊपर कर्मचारी कार्यरत है। इसमें लगभग 2 करोड़ कर्मचारी सरकारी क्षेत्रों एवं 3 करोड़ के लगभग गैर सरकारी क्षेत्र में कार्यरत है। आधुनिक परिवेष में गैर सरकारी क्षेत्र नौकरी का एक अच्छा क्षेत्र बन चुका है। परन्तु ऐसा पाया गया है कि जो कर्मचारी सरकारी क्षेत्रों में काम कर रहे है उनकी मानसिकता गैर सरकारी क्षेत्र में कार्य कर रहे कर्मचारियों से भिन्न एवं अलग होता है। यह विषय बहुत ही महत्वपूर्ण है कि सरकारी एवं गैर सरकारी क्षेत्र में कार्य कर रहे कर्मचारियों की मनोस्थिति का अध्ययन किया जाये एवं तदानुसार दोनो क्षेत्रों में काम कर रहे कर्मचारियों को उचित मानसिक सुरक्षा एवं प्रोत्साहन दिया जाए।
सरकारी क्षेत्र में कार्य कर रहे कर्मचारियों की मनोस्थिति एवं मानसिकता:-
आर्थिक सुरक्षा एवं समाजिक महत्व किसी भी कर्मचारी के लिए एक ऐसा अवसर होता है जो मानसिक शांति प्रदान करता है। ऐसा पाया गया है कि व्यक्ति आर्थिक एवं सामाजिक सुरक्षा के दायरे में रहना पसंद करता है। जिन व्यक्तियों की नौकरी सरकारी है वे अपने आप को बेहतर स्थिती में पाते है क्योंकि सरकारी नौकरिया सामाजिक एवं आर्थिक सुरक्षा प्रदान करती है। इसमें इनका शोषण कम है एवं अपने आप को आजाद महसूस करते है। उनको ऐसा लगता है कि उनकी नौकरी नहीं छिन सकती है एवं वें एक सुरक्षित परिवेष में जीवन-यापन करते है। सरकारी क्षेत्र में नौकरी वाले व्यक्ति की मानसिक स्थिति सुदृढ़ होती है क्योंकि वह व्यक्ति अपने आप को अच्छे सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति में पाता है। भारत जैसे देष में ऐसा कहावत प्रचलित है कि भगवान एवं सरकारी नौकरी में से चुनना हो तो व्यक्ति हमेषा सरकारी नौकरी ही चुनेगा।
प्रो0 आर0 मजुमदार ने ठीक ही कहा है कि ‘‘मनुष्य हमेषा स्थायित्व की तरफ अग्रसर रहता है एवं उसे गैर सरकारी संगठनों की तुलना में सरकारी क्षेत्र में नौकरी अच्छी लगती है क्योंकि उसे आर्थिक एवं सामाजिक सुरक्षा का बोध होता है।’’
इसके विपरीत सरकारी संगठनों में नौकरी करने वाले व्यक्ति कई प्रकार की गलत प्रवृत्तियाँ पायी जाती है। आधुनिक परिवेष में ऐसा देखा गया है कि सरकारी संगठनों में एवं कार्यालयों में घूसखोरी एवं भ्रष्टाचार के अनगिनत मामले सामने आते है जिससे कर्मचारियों की लापरवाही प्रलक्षित होती है। सरकारी कर्मचारियों की गैर जिम्मेदराना व्यवहार, लेट-लतीफी एवं जनता के प्रति जवाबदेह न होना, जैसा विपरीत लक्षण समय-समय पर उजागर होते है। सामाजिक आलोचक वंषीधर कुमार के अनुसार ‘‘सरकारी कार्यालय नौकरषाही एवं कर्मचारियों के आराम के साधन बन चुके है। इन कार्यालयों में काम कम राजनीति अधिक होती है। यही कारण है कि सरकारी संस्था निजिकरण के तरफ बढ़ रही है। परंतु सरकारी एवं निजि संस्थानों में सामंजस्य स्थापित होना जरूरी है ताकि कर्मचारियों की मानसिक स्वास्थ्य पर कोई विपरीत असर न पड़े।
निजी क्षेत्र में कार्य कर रहे कर्मचारियों की मनोस्थिति एवं मानसिकता:-
जनसंख्या की दृष्टि से भारत एक विषाल देष है एक अरब 40 करोड़ लोगों का समायोजन सरकारी कार्यालयों में असंभव है। यही कारण है कि निजी क्षेत्र भारत को नागरिकों के लिए एक सुलभ एवं सुगम समायोजन प्रदान करता है। सरकारी क्षेत्र की तुलना निजी कंपनियों में लगभग 25 गुना लोग काम करते है। धीरे-धीरे भारत के लोगो की मानसिकता बदल रही हैं एवं वे निजि क्षेत्र में नौकरी पाने के लिए उत्सुक एवं अग्रसर हो रहे है। आज के वैष्वीकरण के युग में जहाॅं पर धीरे-धीरे पूॅजीवाद, समाजवाद एवं सभ्यवाद का स्थान ले रहा है, यह स्थिति और भी सुखद एवं प्रषंसनीय है। इससे सरकारी क्षेत्रों का समायोजन का भार कम हो रहा है।
प्रो0 रजत कुलकर्णी के अनुसार ‘‘निजी क्षेत्र में बढ़ता अवसर भारतीय नागरिको को एक नया अवसर प्रदान कर रहा है क्योंकि आज के वैष्वीकरण के युग में भारत जैसे विषाल जनसंख्या वाले देष के लोगो का सरकारी क्षेत्र में समायोजन दिन प्रतिदिन कम होते जा रहा है। आज के दौर में लोग निजी क्षेत्र में नौकरी पाने के लिए काफी उत्सुक हैं। वे निजी क्षेत्र के जरूरतो को पूरा कर रहे हैं‘‘। भारत के लाखों कम्पनियों में कई करोड़ लोग कार्यरत है एवं देष के विकास में ठोस योगदान दे रहे हंै।
निजी क्षेत्र में कार्य कर रहें कर्मचारियों की मनोस्थिति उस प्रकार की नहीं होती जितनी अच्छी सरकारी क्षेत्र में कार्य कर रहें कर्मचारियों की होती है। निजी क्षेत्र में कार्य कर रहें कर्मचारियों को इस बात का हमेषा भय रहता है कि उनकी नौकरी कभी भी समाप्त हो सकती है। उनकी नौकरी में स्थायित्व का अभाव होता है, क्योकि उनके प्रदर्षन पर उनके नौकरी का स्थायित्व तय होता है। दूसरी तरफ ऐसा देखने में आता है कि उनसे अधिक काम के बदले कम भत्ता दिया जाता है। यह स्थिति उनके अन्दर हीन भावना को पैदा करती है। काम के तनाव का ज्यादा होना उन्हें मानसिक रूप से कमजोर करता है। प्रो0 सत्यजीत राठौर के अनुसार ‘‘काम का अधिक बोझ होना, भत्ता का कम होना, नौकरी का स्थाई न होना एवं समाजिक एवं अधिक शोषण का होना, निजी क्षेत्र में कार्य कर रहें लोगों के मन में एक भम्र पैदा करता है, जो उनकी मानसिकता स्थिति को कमजोर करता है‘‘। ऐसा भी देखने को मिलता है कि समाज में निजी क्षेत्र में काम कर रहे लोगों का कोई सम्मान नहीं रहता जबकि ये बहुत ही बड़ा क्षेत्र है।
निषकर्ष:-
निजी क्षेत्र में कार्य कर रहे कर्मचारी के मानसिक स्वास्थ्य में सुधार तब तक नहीं किया जा सकता है, जब तक निजी क्षेत्र में एक बेहतर सेवा की स्थिति हो। निजी क्षेत्रों में भी अच्छा वेतन भत्ता के साथ-साथ कार्य कर रहें व्यक्तियों के नौकरियों में स्थायीकरण की व्यवस्था हो। सेवा शर्ताे में एक लचीलापन हो ताकि व्यक्ति अपने आप को मानसिक रूप से समृद्ध महसुस कर सके। जब तक कर्मचारी मानसिक रूप से स्वस्थ नही होगा, उसकी कार्यषैली हमेषा प्रभावित होती रहेगी। इसलिए आवष्यक है कि सरकारी एवं निजी क्षेत्र में कार्य कर रहें लोगों की सेवा शर्त एक प्रकार की हो एवं व्यापक हो।
संदर्भ सूची:-
1. प्रो0 आर मजुमदार, भारत का समाज: एक अध्ययन, राज कमल प्रकाषन, नई दिल्ली, 2016
2. वंषीधर कुमार, समाजवाद: एक आलोचनात्मक अध्ययन, पंकज प्रकाषन प्राईवेट लिमिटेड, नई दिल्ली 2004
3. प्रो0 सत्यजित राठौड, Public-Private Partnership : An Introduction, Kumar Paperback, New Delhi, 2020


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