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Sahitya Samhita Journal ISSN 2454-2695

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सुभाष चन्द्र कुशवाहा के कहानी संग्रह ‘लाला हरपाल के जूते’ में ग्रामीण सामाजिक परिवर्तन: चुनौतियाँ एवं संभावनाएँ Subhash Chandra Kushwaha

Citation

यादव, . युगल . किशोर ., & सिंह, . श्याम . शंकर . (2026). सुभाष चन्द्र कुशवाहा के कहानी संग्रह 'लाला हरपाल के जूते' में ग्रामीण सामाजिक परिवर्तन: चुनौतियाँ एवं संभावनाएँ. Sahitya Samhita, 12(3), 1–11. https://doi.org/10.26643/rb.v118i8.7704

युगल किशोर यादव

पीएच. डी. शोधार्थी, हिन्दी विभाग

राजीव गाँधी विश्वविद्यालय

रोनो हिल्स, अरुणाचल प्रदेश

 

प्रो. श्याम शंकर सिंह

प्रोफ़ेसर, हिन्दी विभाग

राजीव गाँधी विश्वविद्यालय

रोनो हिल्स, अरुणाचल प्रदेश

 

21वीं सदी की दुनिया विविधताओं और यांत्रिकता की दुनिया है। इस दुनिया ने जितनी जटिलतायें पैदा की है, उतने अवसर भी परोसे हैं। हम एक ओर जहाँ उन्मुक्तता में साँस लेने का भ्रम पाल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर विसंगतियों के मकड़ जाल में भी फंसते चले जा रहे हैं। हमारे सामाजिक सरोकार, हमारे जीवन मूल्य और हमारी संवेदनाओं में कृत्रिमता आ गयी है। न सिर्फ भारत में बल्कि पूरे विश्व की सामाजिक संरचना बदल रही है। अत: भारतीय ग्रामीण समाज भी अपने पूराने पारंपरिक स्वरूप में परिवर्तन को स्वीकार रहा है। ग्रामीण समाज भारतीय संस्कृति की रीढ़ मानी जाती है। ग्रामीण समाज अपनी पारंपरिक सांस्कृतिक मान्यताओं के कारण भारतीय संस्कृति को जीवित रखने का प्रयास करती है। किन्तु वर्त्तमान समय की आधुनिक और यांत्रिक युग ने भारतीय ग्रामीण समाज को जड़ से प्रभावित किया है। भारतीय गाँव अब अपनी प्राचीन छवि से आधुनिक बनने की दौड़ में शामिल हो चुका है। फलस्वरूप गाँवों की जीवनशैली आधुनिकता की चादर ओढ़े आधुनिक दुनिया के साथ अपना तादात्म्य स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। इस प्रक्रिया में ग्रामीण समाज परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। आय दिन कुछ न कुछ परिवर्तन देखने को मिल रहा है। परिवर्तन की इस प्रक्रिया ने ग्रामीण समाज को प्रभावित तो अवश्य किया है, किन्तु ग्रामीण समाज अपने पिछड़ेपन की स्थिति से पूरी तरह से उभर नहीं पाया है। विकास की राह में कई सारी चुनौतियों- अशिक्षा, रोजगार की कमी, पलायन, अंधविश्वास एवं कुरीतियाँ, जातिवाद, नशीले पदार्थों का सेवन, स्वास्थ्य एवं जन सेवाओं की कमी, पारिवारिक विघटन तथा आर्थिक संसाधनों का विकेन्द्रीकरण आदि से जूझ रहा है। परन्तु यह भी सत्य है कि वर्तमान भारतीय गाँव पहले की अपनी पिछड़ी हुई स्थिति से धीरे-धीरे उभर भी रही है। एक ओर जहाँ ग्रामीण समाज के विकास की राह में अनेक चुनौतियाँ हैं तो वहीं दूसरी ओर सामजिक परिवर्तन के सकारात्मक संभावनाएँ भी उभरकर सामने आ रही है।

ग्रामीण चेतना के प्रखर रचनाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने अपनी रचनाओं में ग्रामीण समाज की वास्तविकता का खुला चित्रण किया है। उनकी कहानी संग्रह ‘लाला हरपाल के जूते’ भारतीय गाँवों की यथार्थ स्थिति को अभिव्यक्त करती है। ग्रामीण समाज की सुन्दरता के पीछे छिपे संघर्ष को अभिव्यक्त करती है। सपनों तथा कल्पना में निर्मित गाँव के स्थान पर गाँव की ज़मीनी हकीक़त को उजागर करती है। वे ग्रामीण समाज को विकट चुनौतियों से उभारने के लिए बदलाव की उम्मीदें रखते हुए सकारात्मक कदम उठाने को प्रमुखता देते हैं।



चुनौतियाँ

सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने वर्तमान गाँव की छवि को बहुत ही बारीकी से उकेरा है। ग्रामीण समाज में हो रहे परिवर्तन का सूक्ष्मता से चित्रण करते हुए यह सिद्ध किया है कि भारतीय गाँव अब पहले जैसा नहीं रहा। परिवर्तन के दौर ने ग्रामीण समाज की विचारधारा में परिवर्तन लाया है, मानवीय संबंधों को प्रभावित किया है, वहीं ग्रामीण जीवनशैली में भी बदलाव लाया है। किन्तु इस परिवर्तन के दौर में भी ग्रामीण समाज के सामने कई सारी चुनौतियाँ ग्रामीण विकास के मार्ग में मुँह खोले खड़ी हैं। उनमें ‘अशिक्षा’ सबसे बड़ी चुनौती के रूप में देखी जाती है। शिक्षा समाज की प्रगति और विकास का मुख्य आधार है। एक शिक्षित व्यक्ति अपने व्यक्तित्व को निखारने के साथ-साथ परिवार, समाज और देश की स्थिति को सुधारने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देता है। वह अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक होता है तथा आत्मनिर्भर बनने की राह में अग्रसर होता है। भारत की कुल आबादी का अधिकांश हिस्सा ग्रामीण इलाकों में बसता है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का महत्व कई गुना बढ़ जाता है, क्योंकि आजादी के बाद भी भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की स्थिति अत्यन्त सोचनीय बनी हुई है। इसका एक कारण है ‘गरीबी’। ग्रामीण समाज का अभावों से ग्रस्त जीवन उन्हें शिक्षा की ओर ध्यान केन्द्रित करने नहीं देता है। दूसरा, गाँवों में जनसंख्या के हिसाब से प्रर्याप्त विद्यालयों का अभाव है तथा जितने भी विद्यालय है उनमें शिक्षकों की कमी देखने को मिलता है। विद्यालय भवनों की स्थिति जर्जर अवस्था में है। ऐसी स्थिति में ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था का भविष्य अंधकारमयी दिखाई देता है। सरकारी स्कूलों की स्थिति ऐसी है कि पढ़ाई-लिखाई के नाम पर केवल मिड-डे मिल में खिचड़ी बाँटी जाती है। “गाँव के स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती, खिचड़ी बंटती है। मुफ्त में किताब-कापी और पैसा बांटा जाता है। पढ़ाने को अध्यापक नहीं। एकाध अध्यापक या शिक्षा मित्र हैं भी तो वे पूरे दिन खिचड़ी पकवाने-खिलाने में लगे रहते हैं। स्कूल भवन निर्माण की ठेकेदारी भी इन्हीं के ज़िम्मे है। पढ़ाई किसी के ज़िम्मे नहीं। जूनियर हाई स्कूल और इंटर कालेजों में भी अध्यापकों का अभाव है। नक़ल करा कर परीक्षा पास कराने के ठेके लिए जाते हैं।”1 ग्रामीण विद्यार्थियों को सरकार की ओर से मिलने वाली सुविधाओं के लालच में गाँववाले अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं, उन्हें पढ़ाई-लिखाई से कोई मतलब नहीं रहता। सरकार द्वारा स्कूलों को मिलने वाली सुविधाओं का लाभ उठाने में स्कूल के हेडमास्टर सक्रिय दिखाई देते हैं। छात्रों की फर्जी हाजरी बनायी जाती है। इसके अलावा ग्रामीण समाज में एक तंत्र ऐसा भी है जो कतई नहीं चाहता है कि निम्न और गरीब परिवार के बच्चे पढ़े। ‘फांस’ कहानी में ऐसी ही मानसिकता देखने को मिलती है “विनोद राय ग़रीबों के बच्चों को गाँव के सरकारी स्कूल में पढ़ने की हिदायत देते। सोचते, ग़रीबों के बच्चे कस्बे के निजी स्कूलों में पढेंगे तो उनका दिमाग खराब हो जाएगा। गाँव के स्कूल में मिड-डे मिल खाएंगे तो जिनगी भर मजदूर रहेंगे। जी हजूरी करेंगे। वह गाँव वालों को समझाते-‘बच्चा पढ़े या न पढ़े, वजीफ़ा मिलेगा, खाना मिलेगा। और क्या चाहिए।”2  स्त्री शिक्षा की स्थिति काफी चिंताजनक बनी हुई है। क्योंकि ग्रामीण समाज की स्त्रियों का जीवन मुख्य रूप से घर-गृहस्थी, खेती-बाड़ी तक ही सीमित रही है। परिवार की देखभाल करना ग्रामीण स्त्रियों का मुख्य दायित्व निर्धारित किया गया है। फलस्वरूप उन्हें अवसर भी कम मिलते हैं। वे सामाजिक रूढ़ियों और कुरीतियों की जाल में उलझकर रह जाते हैं, जिससे उनके व्यक्तित्व का विकास रूक जाता है। फलत: उन्हें विभिन्न तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

गाँवों की चिकित्सा सेवा की स्थिति भी चिंताजनक बनी हुई है। विडंबना यह है कि सरकार द्वारा गाँवों में स्वास्थ्य संबंधी सारी सुविधाएँ उपलब्ध करायी जा रही है, बावजूद इसके ग्रामीणों को सही तथा उचित लाभ नहीं मिल पा रहा हैं। गाँवों के स्वास्थ्य केन्द्रों में दक्ष डाक्टरों और नर्सों की कमी एक बड़ी चुनौती है। इसके अलावा स्वास्थ्य केन्द्रों में जरूरी उपकरणों, आवश्यक दवाओं और बिजली तथा पानी की सुचारू व्यवस्था नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों के स्वास्थ्य केन्द्रों में बुनियादी सुविधाओं के अभाव से पीड़ित ग्रामीणजन शहरों के निजी अस्पतालों में इलाज करवाने को विवश हो रहे हैं। आधुनिक चिकित्सा प्रणाली तथा अच्छे प्रशिक्षित डॉक्टरों के अभाव के कारण और महँगी चिकित्सा प्रणाली के कारण ग्रामीणजन झोलाछाप डॉक्टरों पर निर्भर रहते हैं। जागरूकता की कमी के कारण ग्रामीणजन अक्सर गंभीर स्थिति होने पर ही इलाज के लिए जाते हैं। अत: स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं की आवश्यकता ग्रामीण समाज के सामने बड़ी चुनौती के रूप में विद्यमान है।

बेरोजगारी की समस्या से आज देश का युवावर्ग पीड़ित है। ग्रामीण समाज में भी पर्याप्त रोजगार के अभाव में ग्रामीण युवा दर-दर की ठोकरे खाने और भटकने को विवश है। ऐसा नहीं है कि बेरोजगारी का कारण अशिक्षा है, बल्कि पढ़े-लिखे शिक्षित और हुनरमंद युवा भी रोजगार से वंचित है। गाँव में खेतों में काम करने वाले छोटे-मोटे कृषक-मजदूरों की संख्या अधिक थी, किन्तु आधुनिक कृषि यंत्रों- ट्रेक्टर, हार्वेस्टर, कम्बाइन आदि के माध्यम से फसल की बुवाई-कटाई होने के कारण कृषक-मजदूरों का रोजगार भी छीन चुका है। दूसरी ओर बाजारवाद की लहर ने ग्रामीण कुटीर उद्योगों और व्यवसाय को भारी क्षति पहुँचाया है। रोजगार के अभाव में गाँव का युवा उदासीनता और विकल्पहीनता के कारण कुछ न कर पाने की स्थिति में भाग्यवादी बन चुके हैं। अपना गुजारा करने के लिए छीना-झपटी, लूट-मार व दादागिरी करते है, कच्ची, पाउच और गुटका का जुगाड़ लगाते हैं। “लड़के लोफर हो गए थे। रात-दिन दारू-ताड़ी और सुर्ती में डूबे रहते। न दूसरा कोई काम, न नौकरी की उम्मीद।”3 गाँव का युवा जब शहर से पढ़-लिख कर गाँव वापस आता है तो उसके लिए गाँव में खेती करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं रहता। घर की दरिद्रता और गरीबी उन्हें आहत करती है। इसलिए रोजगार की तलाश उन्हें गाँव से पलायन करने को विवश करती है। दूसरी ओर आधुनिक शहरी जीवन की रंगीनियाँ ग्रामीण युवाओं को आकर्षित करती है। इसीलिए वे गाँव छोड़कर शहरों में रहना अधिक पसंद करते हैं। गाँव से उनका रिश्ता धीरे-धीरे टूटने लगता है। कभी-कभार मेहमानों की तरह माता-पिता से मिलने गाँव आते-जाते रहते हैं। “बेटा! अपने कैरियर, अपनी सुख-सुविधाओं के लिए लोग गाँव, घर और मित्रों को छोड़ रहे हैं, अब बस कभी-कभार फ़ोन कर संबंधों का तार जुड़े होने का आभास दे देते हैं।”4 इस प्रकार गाँव में केवल बूढ़े माता-पिता रह जाते हैं। अगर सही मायने में देखा जाए तो वे (माता-पिता) केवल गाँव की संपत्ति का देखभाल कर रहे होते हैं। ग्रामीण समाज में संयुक्त परिवार की प्रधानता थी। संयुक्त परिवार की अवधारणा बताते हुए प्रकाश चन्द्र जैन लिखते हैं “ग्रामीण जीवन की परिस्थितियाँ तथा आवश्यकताएँ नगरीय समाज से भिन्न होने के कारण गाँवों में संयुक्त परिवार का महत्व अभी भी दिखाई देता है। इसमें दो-तीन पीढ़ियों के सदस्य एक साथ रहते हैं, सामूहिक संपत्ति होती है, सामान्य निवास होता है और भोजन हेतु एक रसोई घर होता है।”5 इस प्रकार ग्रामीण समाज की अपनी परंपरागत संयुक्त परिवार रूपी सामाजिक संरचना होती है। किन्तु आधुनिक जीवन शैली तथा पाश्चात्य संस्कृति के अनुकरण ने ग्रामीण समाज की सामजिक और पारिवारिक संरचना को जड़ से प्रभावित किया है। फलस्वरूप संयुक्त परिवार का विघटन होने लगा है। व्यक्तिगत स्वार्थ, ईर्ष्या और महत्वकांक्षा की अभिलाषाओं ने ‘पारिवारिक विघटन’ को जन्म दिया है। “चाचा कब उनका भला सोचने वाले। बाबूजी के जीते-जी, कभी हंस कर बोले-बतिआए न थे। बंटवारे में जितने बेईमानी करनी थी सो किए। ऊसर ज़मीन बाबूजी के हिस्से में आई तो उपजाऊ ज़मीनों को अपने हिस्से में रखवा लिया। अब वही चाचा भतीजे को नसीहत दे रहे हैं।”6 ‘यही सब चलेगा?’ कहानी की उक्त पंक्तियाँ ग्रामीण समाज में ज़मीन-जायदाद को लेकर होने वाली पारिवारिक विवाद की समस्या को दर्शाती है। विवाद की स्थिति इतनी भयावह हो जाती है कि एक भाई दूसरे भाई की हत्या करने और करवाने को तैयार हो जाता है। ग्रामीण समाज में पारिवारिक विघटन आर्थिक असमानता और वित्तीय दबाव के कारण भी होता है। संयुक्त परिवार में घर की जरूरतों को पूरा करने की जिम्मेदारी घर के मुखिया पर होता है। यही कारण है कि एक व्यक्ति के ऊपर वित्तीय दबाव अधिक पड़ता है। आर्थिक असमानता जैसी स्थिति उत्पन्न होती है और परिवार टूटने की स्थिति में पहुँच जाता है।

ग्रामीण समाज में मादक द्रव्यों और पदार्थों का सेवन अधिक मात्रा में होता है। जब व्यक्ति मादक पदार्थों का सेवन करने लगता है तब यह आदत केवल उस व्यक्ति के व्यक्तिगत जीवन और परिवार को ही क्षति नहीं पहुँचाता, बल्कि समाज को भी इसके भयंकर दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं। “इसके नशे में खून किए जाते हैं, घर बिकते हैं, लोग दिवालिया होते हैं, बदमाश बनते हैं, सुहागिनों का सुहाग उजड़ते हैं, मानवता नष्ट होती है, स्त्री जाति अपमानित होती है, नशाखोरी दुःख एवं दरिद्रता को बढ़ावा देती है।”7 ग्रामीण युवा कच्ची शराब, पाउच, गुटखा, बीड़ी-सिगरेट के दीवाने हो चुके हैं। शिक्षा से वे कोसों दूर जा रहे हैं। रोजगार न मिल पाने की स्थिति में आवारा और लंपटों की तरह भटक रहे हैं। “गाँव के नौजवानों की नई पीढ़ी दारू, पान, बीड़ी और पाउच की दिवानी है। दिन भर इधर-उधर ताश फेंटते हैं। तेज आवाज़ में टेपरिकार्डर बजाते है। अश्लील भोजपुरी गाने सुनते हैं। शाम होते ही भट्ठे पर दारू पीने के लिए जमा हो जाते हैं। बड़े-बुजुर्गों की नहीं सुनते, न इज्ज़त-लिहाज करते हैं।”8 ग्रामीण समाज की निम्न जीवन स्थिति के पीछे ‘शराब की लत’ भी एक कारण है। शराब के नशे में धुत पुरुष परिवार तथा समाज में महिलाओं पर अत्याचार करता है, उन्हें प्रताड़ित करता है। घर से लेकर बाहर तक अर्थात् मिलों, कारखानों तथा ईंट भट्ठों में काम करने वाली महिलाएँ शारीरिक तथा मानसिक शोषण और प्रताड़ना झेलती है।

ग्रामीण समाज में प्रारंभ से ही कई सारी धारणाएँ और परम्पराएँ प्रचलित हैं। जो ज्यों की त्यों प्रारंभ से चली आ रही हैं, जिसमें समय के साथ परिवर्तन आनी चाहिए थी। समय के अनुसार बदलाव न आने के कारण वे मान्यताएँ रूढ़ बन चुकी है। अत: इनका पालन ग्रामीण समाज कठोरता से करता आ रहा है। फलस्वरूप ऐसी परम्पराएँ कुरीतियों का रूप धारण कर समाज को अन्दर ही अन्दर खोखला कर रही है। तर्कहीन प्रथाएँ सामाजिक बुराइयों को जन्म दे रही है। जातिवाद, छुआछूत, अंधविश्वास, तंत्र-मंत्र, भूत-प्रेत तथा डाइन जैसे धारणाओं में उलझाकर ग्रामीण समाज का विकास अवरुद्ध होता है। “वर्त्तमान दौर में भी ग्रामीण धर्म, आत्मवाद, जादू-टोना, बहुदेववाद, पुराणविद्या आदि से संचालित है, जो ग्रामीणों को सीधा-साधा बनाकर रखे हुए हैं। इसकी प्रवृत्ति असंस्कृत तथा मूर्त है। ग्रामीण जनता आज भी विश्व संबंधी आत्मवादी धारणा से उद्भूत तमाम देवी-देवताओं के सामने दण्डवत् होती है और अपने किए अपराधों के लिए क्षमायाचना करती है। ग्रामीण धर्म की जड़ें मूलत: अज्ञान तथा पर्यावरण की तमाम शक्तियों के भय में निहित है।”9 ऐसे में शिक्षा का महत्व काफी बढ़ जाता है क्योंकि शिक्षा के कारण ही वैज्ञानिक तथा तर्कपूर्ण दृष्टिकोण का विकास होता है। किसी भी समाज की प्रगति तभी संभव हो सकती है जब उस समाज में रहने वाले लोगों में वैज्ञानिक और तर्कपूर्ण विचार करने की बौद्धिक क्षमता विद्यमान होती है।

संभावनाएँ

यह सत्य है कि भारतीय ग्रामीण समाज शहरों के मुकाबले अभी भी अपनी पिछड़ी हुई स्थिति में है। शहरों के साथ-साथ गाँवों में भी विकास की प्रक्रिया चल रही होती है। किन्तु इसकी गति शहरों के मुकाबले अधिक धीमी होती है। यही कारण है कि गाँवों की स्थिति में अधिक परिवर्तन देखने को नहीं मिलता है। सुभाष चन्द्र कुशवाहा की कहानी संग्रह ‘लाला हरपाल के जूते’ में ग्रामीण सामाजिक स्थितियों का यथार्थ चित्रण हुआ है। उनकी कहानियाँ ग्रामीण समाज की सुंदरता के पीछे छिपी वास्तविकता को अभिव्यक्त करती है। भारत के अधिकत्तर गाँवों में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी देखने को मिलती है। हालाँकि वर्त्तमान समय में पहले के मुकाबले स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्र अवश्य खोले गए हैं। ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र अब धीरे-धीरे आधुनिकता की ओर बढ़ रही है। किन्तु इनमें बुनियादी सुविधाएँ अधिक मात्रा में उपलब्ध कराए जाने की आवश्यकता है। सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं- आयुष्मान भारत, जननी सुरक्षा योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन आदि के माध्यम से ग्रामीण समाज में स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाया जा रहा है। आज ग्रामीण समाज में शिक्षा के महत्व को समझा जा रहा है। सुभाष चन्द्र कुशवाहा की कहानियों में गाँव के पढ़े-लिखे शिक्षित युवा वैज्ञानिक सोच रखते हैं। उनमें भावनाओं के साथ-साथ बौद्धिकता भी देखने को मिलती है। वे ग्रामीण समाज में फैली जातिवाद, छुआछूत, अंधविश्वास, रूढ़ियों एवं कुरीतियों का विरोध करते हैं। ग्रामीण समाज को इसके दुष्परिणामों के बारे में बतलाते हैं। “गंवई समाज में व्याप्त जातिवाद, छुआछूत और अंधविशवास के खिलाफ अक्सर मुखर रहते। पाखंडियों के खिलाफ बोलते तो कुछ ज़्यादा आक्रामक दिखते। ग़रीबों को तंत्र-मंत्र, भूत-प्रेत, डाइन जैसे भ्रामक अवधारणाओं के प्रति सचेत करते। गाँव के बगीचे, नहर की पटरियों, खेल-कूद के मैदानों या पंचायतों में हम उम्र के बीच प्रगतिशील विचारों की वकालत करते और गाँव की सामजिक समरसता को मजबूत करने का पाठ पढ़ाते।”10 ‘यही सब चलेगा?’ कहानी के पात्र चंद्रशेखर गाँव का पढ़ा-लिखा और सुलझा हुआ युवक है। वह ग्रामीण युवाओं को अंधविश्वास, पाखंड और कुरीतियों के विरुद्ध सचेत करता है। ग्रामीण युवाओं के इस तरह की प्रगतिशील विचार निश्चित रूप से ग्रामीण समाज की प्रगति की निशानी है। यह युवाओं में तार्किकता और अधिकारों के प्रति सजगता को बढ़ावा देता है। गाँव की लड़कियाँ भी पढ़-लिख कर समाज में अपनी काबिलियत और हुनर का परिचय दे रही है। घर-गृहस्थी करने के साथ-साथ वे रोजगार और राजनीति में भी अपनी सक्रिय भूमिका निभा रही है। ‘रमा चंचल हो गई है’ की हाई स्कूल पास रमा महिला आरक्षित सीट से गाँव की परधान बनती है और गाँव की समस्याओं का समाधान करने में अपना योगदान देती है। सरकारी सुविधाओं का दुरुपयोग किये जाने पर वह कड़े सवाल भी करती है। “रमा को यह सब भाता नहीं। वह रजिस्टर खोल, मरद से सवाल करती है- इ किसका-किसका नाम लिखे हैं? इ मेहरारू तो कभी घर से बाहर नहीं निकलती। फिर मजूरी कैसे करती होगी?”11 ग्रामीण समाज में स्त्री शिक्षा की स्थिति में परिवर्तन की संभावनाओं को एक और उदहारण से समझा जा सकता है। जब मुनेसर यादव रामचरन-बो के पतोहू मंजू को नरेगा के रजिस्टर पर अंगूठा लगाने को कहता है, तब वह विरोध प्रकट करती हुई कहती है कि वह नाम लिख सकती है। ग्रामीण महिलाओं की यह स्थिति महिलाओं में आतंरिक परिवर्तन और चेतना के विकास को दर्शाती है। इस प्रकार ग्रामीण परिवेश में महिलाओं के संघर्ष और उनकी भागीदारी में सकारात्मक परिवर्तन परिलक्षित हो रहे हैं। आधुनिक तकनीकी उपकरणों- मोबाइल, कम्प्यूटर, लैपटॉप आदि के साथ इंटरनेट की सुविधाओं ने ग्रामीण दृष्टिकोण को बदला है। तकनीकी हस्तक्षेपों ने ग्रामीण क्षेत्रों में ऑनलाइन काम करने के अवसरों को जन्म दिया है। सड़कों और बिजली की बेहतर सुविधा उपलब्ध कराने के प्रयास ने गाँव के विकास के मार्ग को खोला है।

निष्कर्षत: ग्रामीण समाज के सामने चुनौतियाँ अधिक है। सुभाष चन्द्र कुशवाहा अपनी कहानियों में ग्रामीण समाज में विद्यमान चुनौतियों से चिंतित दिखाई देते हैं। किन्तु दूसरी ओर वे आशावादी भी हैं। एक ओर जहाँ उनकी कहानियों में ग्रामीण समाज की चुनौतियों का यथार्थ चित्रण हुआ है तो वहीं दूसरी ओर चुनौतियों से उभरने के सकारात्मक प्रयास भी दिखाई देते हैं। उनके कहानियों के पात्र संघर्षशील है तथा वे प्रगतिशील विचार रखते हैं। रूढ़ियों और अंधविश्वासों का विरोध करते हैं, सत्ता और भ्रष्ट तंत्र से तीखे सवाल भी करते हैं। श्रम के महत्त्व को समझते हैं। अत: ग्रामीण समाज के सामने चुनौतियाँ भले ही नए रूपों में प्रकट हो रही है, किन्तु ग्रामीणों के मन में चेतना का विकास होना एक सकारात्मक पहलू है।   

संदर्भ

1.   सुभाष चन्द्र कुशवाहा, सब कुछ ज़हरीला, लाला हरपाल के जूते (कहानी संग्रह), पेंगुइन बुक्स, गुड़गांव, संस्करण- 2015, पृष्ठ-74

2.   सुभाष चन्द्र कुशवाहा, फांस, लाला हरपाल के जूते (कहानी संग्रह), पेंगुइन बुक्स, गुड़गांव, संस्करण- 2015, पृष्ठ-121-122

3.   सुभाष चन्द्र कुशवाहा, भटकुंइयां इनार का खजाना, लाला हरपाल के जूते (कहानी संग्रह), पेंगुइन बुक्स, गुड़गांव, संस्करण- 2015, पृष्ठ-27

4.   सुभाष चन्द्र कुशवाहा, पेड़ लगाकर फल खाने का वक्त नहीं, लाला हरपाल के जूते (कहानी संग्रह), पेंगुइन बुक्स, गुड़गांव, संस्करण- 2015, पृष्ठ-45

5.   प्रकाश चन्द्र जैन, ग्रामीण समाजशास्त्र: भारतीय परिप्रेक्ष्य, रावत पब्लिकेशन्स, जयपुर, संस्करण- 2021, पृष्ठ- 97

6.   सुभाष चन्द्र कुशवाहा, यही सब चलेगा?, लाला हरपाल के जूते (कहानी संग्रह), पेंगुइन बुक्स, गुड़गांव, संस्करण- 2015, पृष्ठ-138

7.   अखिलेश कुमार सरोज, ग्रामीण युवकों में नशाखोरी, Aryavarat Shodh Vikas Patrika, Vol- 12, Issue- XII, Year- 2018, ISSN- 2347:2944, पृष्ठ- 62

8.   सुभाष चन्द्र कुशवाहा, सब कुछ ज़हरीला, लाला हरपाल के जूते (कहानी संग्रह), पेंगुइन बुक्स, गुड़गांव, संस्करण- 2015, पृष्ठ-75

9.   डॉ. मोती लाल, ग्रामीण-परिवर्तन और भैरव प्रसाद गुप्त के उपन्यास, साहित्य भंडार, इलाहबाद, संस्करण- 2017, पृष्ठ-10

10. सुभाष चन्द्र कुशवाहा, यही सब चलेगा?, लाला हरपाल के जूते (कहानी संग्रह) पेंगुइन बुक्स, गुड़गांव, संस्करण- 2015, पृष्ठ- 135

11. सुभाष चन्द्र कुशवाहा, रमा चंचल हो गई है, लाला हरपाल के जूते (कहानी संग्रह), पेंगुइन बुक्स, गुड़गांव, संस्करण- 2015, पृष्ठ- 62

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