हाँ, मेरा स्वाभिमान लोगों से बड़ा है,
अपने ही संकल्प पर अडिग खड़ा है।
छोटी बातों की आँधी में भी
जो कभी नहीं बिखरा है।
वो अपने अंतर्मन की धड़कन पहचानता है,
अपनी कमियों से ही हर दिन निखरता है।
ठहरता है, सोचता है —
फिर नए पड़ाव की ओर बढ़ता है।
आँसू उसे कमज़ोर नहीं करते,
वो चट्टान सा अटल रहता है।
रात के गहरे अंधेरे में भी
सूरज बनकर ही चमकता है।
उसे पता है —
कब खुद को थामना है,
कहाँ रुकना है, कितना चलना है।
खुशबू बनकर इस दुनिया में
अपनी पहचान बना जाना है।
अपने ही रंग से मैं दमकती हूँ,
अपने ही दर्पण में खुद को देख मुस्कुराती हूँ।
पूर्णता की अंधी दौड़ में भी
मैं खुद को आगे रखती हूँ।
सूनी राहों में बेखौफ़ निकल पड़ती हूँ,
अपने विश्वास की लौ से दिशा गढ़ती हूँ।
मैं अपने नाम की तरह ही — “अनुपमा”,
अपनी कहानी खुद ही रचती हूँ।

