भारतीय ज्ञान परंपरा और रामचरितमानस
डॉ. प्रीति व्यास
(सहायक प्राध्यापक, आय. पी. एस. अकादमी, इंदौर)
भारतीय
ज्ञान परंपरा अर्थात जो ज्ञान वेदों ,उपनिषदों
,शास़्त्रीय ग्रंथ
,पांडुलिपियों या मौखिक संचार के रूप में
हजारों वर्षां से चला आ रहा है । भारतीय ज्ञान परंपरा का इतिहास प्राचीनतम संस्कृत
ग्रंथों से जुड़ा हुआ है जैसे वेद,उपनिषद,भगवदगीता
आदि ।यह परंपरा ध्यान ,साधना,तत्व
ज्ञान और आत्म साक्षात्कार के माघ्यम से जीवन के गहरे अर्थ को जानने पर बल देती है
।
भारतीय
ज्ञान परंपरा के प्रमुख स्तंभों में वैदिक साहित्य है
,जो भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता का आधार है । वैदिक साहित्य
दार्शनिक शिक्षा,नैतिक
सिद्धांत और व्यावहारिक ज्ञान के साथ-साथ
प्राचीन भारत की गहन समझ और
ज्ञान में अंतर्दृष्टि प्रदान कर हजारों वर्षां से भारतीय जीवन शैली
को आकार देकर साहित्य ,कला सहित विभिन्न क्षेत्रों को प्रभवित करता रहा है।
भारतीय ज्ञान
परंपरा में भक्ति का स्थान अत्यधिक उच्च रहा है । ज्ञान की परंपरा और भक्ति का समन्वय भारतीय समाज को धार्मिक ,मानसिक और
सामाजिक दृष्टि से
समृद्ध करता है ।
भारतीय
ज्ञान परंपरा के अंतर्गत भक्ति काव्यधारा की भूमिका महत्वपूर्ण है ।भारत में वाणिज्य
,प्रोद्योगिकी आदि क्षेत्रों में तीव्र प्रगति हुई है,परंतु
भारतीय संस्कृति तथा परंपरा से अलगाव और मूल्यों में गिरावट भी देखी गई है।
आज
मानव समाज के सामने के सामने कई चुनौतियॉ है जिसमें मानसिक अवसाद तथा मूल्यों का पतन
मुख्य है ।
रामचरितमानस
में
भारतीय
ज्ञान
परंपरा
में
दी
गई
शिक्षाओंको
सरल
रूप
में
अभिव्यक्त
किया
गया
है
कुछ
बिन्दुओ
के
आधार
पर
रामचरितमानस
कि
वर्तमान
समय
में
प्रासिंगाकता
पर
विचार
करते
है
–
वर्तमान
समय
में
हर
क्षेत्र
में
समन्वय
की अत्यंत
आवश्यकता
है
| अन्याय,अत्याचार तथा
सामाजिक
विसंगति
के
कारण
ही
समन्वयता
कि
कमी
है
|
रामचरितमानस
आरंभ
से
अंत
तक
समन्वय
का
काव्य
है।इस
संबंध
में
हजारी
प्रसाद
द्विवेदी
ने
भी
लिखा
है
–“तुलसीदासजी
का
समस्तकाव्य समन्वय
कि
विराट
बेला
है
“ लोक और शास्त्र
का
समन्वय
,गृहस्थऔर
वैराग्य
का
समन्वय,
भक्ति
और
ज्ञान
का
समन्वय,
भाषा
औरसंस्कृत
कासमन्वय,ब्राहमण
और
चांडाल
का
समन्वय,पांडित्य
और
आपांडित्य
का
समन्वय
रामचरितमानस
शुरू
से
अंत
तक
समन्वय
का
काव्य
है
| इस महान समन्वय
के
प्रयत्न
का
आधार
उन्होंने
रामचरित
कोचुना”1
पारिवारिक विघटनआज
के
समय
कि
बहुत
बड़ी
समस्या
है
परिवार
तथा
सामाजिक
व्यवस्था
को
सुधारने
में
रामचरितमानस
में
दिए
गए
सन्देश
लाभदायी
है
| “रामचरितमानस के
माध्यम
से
तुलसीदासजी
ने
भक्ति
का
प्रतिपादन
करके,कर्मयोग
को
शिक्षा
देकर
मनुष्यमात्रको
बताया
है
कि
मनुष्य का
धर्म
क्या
है।एक
दुसरे
के
साथ
किस
प्रकार
का
संबंध
होना
चाहिए,
छोटो
का
बड़ो
के
प्रतिऔर
बड़ो
का
छोटो
के
प्रति
कैसा
व्यवहार
होना
चाहिए,सामाजिक
व्यवस्था
कैसी
होने
चाहिए
|”2
वेदों में
बताई
हुई
नीति
मानव
समाज
के
लिए
कल्याणकारी
है
| यदि प्रत्येक व्यक्ति
अपने
अपने
धर्म
(कर्तव्य) का पालन
करे
तो
राम
राज्य
स्थापित
हो
सकता
है
|
“दैहिक दैविक
भौतिक
तापा| राम
राज
नहीं
काहुहि
ब्यापा
सब नर
करहि
परस्पर
प्रीती | चलहि स्वधर्मं
निरत श्रुति
नीति
“3
इस
संदर्भ
का
अर्थ
हम
इस
रूप
में
भी
ले
सकते
है
कि
यदि
हम
परस्पर
प्रेम
से
रहे
और
अपने
अपने
कर्तव्य
का
पालन
करते
रहे
तो
किसी
भी
प्रकार
कष्ट
नहीं
रहेगा
|
आज विश्व
में
युद्ध
संकट बढ़
रहा
है
वैश्विक
स्तर
पर मानवीय
भावनाओं
का
विकास
करना
आज
के
समय
की सबसे
बड़ी
चुनौती
है
| रामचरितमानस की रचना
का
उद्देश
ही
विश्व के हर
व्यक्ति
के
हित
के
लिए है
–“रामचरितमानस की रचना
का
उद्देश
“स्वांतःसुखाय’ और
मोरे
मन
प्रबोधजेही होई
के
उद्देश्य से
की है | यहाँ
परस्वकाअर्थव्यापकहै।-'स्वांतःसुखाय’काअर्थहुआसबकेसुखकेलिएअर्थात विश्व
के
प्राणिमात्र
के
सुख
के
लिए
।रामचरितमानस
के
माध्यम
से
तुलसीदासजी
ने
भक्ति
का
प्रतिपादन
करके,कर्मयोग
कि
शिक्षा
देकर
मनुष्य
मात्र
को
बताया
है
कि
मनुष्य
का
धर्म
क्या
है
।मन
वचन
और
कर्म से
जो
सभी
के
हित
में
लगारहेवही
धर्म
है
| इसी धर्म
की विस्तृत
व्याख्या
अनेक
चरित्रों
तथा
अनेक
उपदेशोके
द्वारा
रामचरितमानस
में
की गई
है,जिसे
अपने
जीवन
में
ढालकर
मनुष्य
सरलता
से
इहलौकिक
तथा
पारलौकिक
रस
प्राप्त
कर
सकता
है
“ 4
मानव जीवन
के
लिए
रामचरितमानस
मेंदिया गया
यह
संदर्भ
अत्यंत
लाभदायी
है
–
“परहित सरिस
धर्म
नहिं भाई
| पर पीड़ा सम नहीं
अधमाई
|
निर्नय सकल
पुरान
वेद
कर
| कहेहुतात जानहिं कोबिद
नर
||”5
वर्तमान में
सामाजिक
मर्यादाए नष्ट
हो
रही
है,लोग
आचारहीन हो गए
है
| जबकि भारतीय संस्कृति
आचार
सम्मतहै।इसमें सामाजिक
मर्यादाओ
और
जीवन
आदर्शो
को
महत्व
दिया
गया
है
| आदर्शमयी जीवन कैसा
होना
चाहिए
इसका
ही
पूरा
चित्रण
रामचरितमानस
में
कियागया
है
|” गोस्वामीजी ने
राम,भारत
और
लक्ष्मण
के
उदात्तचरित्रों
के
माध्यम
से
दिखाया
है
कि
भाईयो
का
आदर्श
व्यवहार
किस
प्रकार
का
होना
चाहिए
| दशरथ के चरित्र
में
सत्यप्रिय
राजा
तथा
आदर्श
पिता
का,कौशल्या
और
सुमित्रा
के
रूप
में
आदर्श
माता
का
सीता
के
रूप
में
आदर्श
पत्नी
का,हनुमान
के
रूप
आदर्श
सेवक
का,और
सुग्रीव
तथा
विभीषण के रूप
में
आदर्श
मित्र
का
वर्णन
किया
गया
है
| राम तो हमारे
सामने
कई
रूपों
में
आते
है
वे
आदर्श
भाई,आदर्श
पुत्र,आदर्श
पति,आदर्श
राजा,आदर्श
मित्र
और
शरणागत
वत्सल
के
रूप
में
हमारे
सामने
आते
है
| हमारे संस्कृतिक जीवन
के
आधार
ये
ही
आदर्श
तो
है
| जिस भारतीय संस्कृति
को
अमर
कहा
गया है
जिसका
गुणगान
करके
आज
विदेशी
लोग
भी
अघाते
नहीं
जिनकी
ओर
आज
संसार
की आँखे
लगी
हुई
है,और
जिनके
कारण
भारत
आज
भी
जगद्गुरु
बना
हुआ
है
उसके
तत्व
हमारे
इस
आदर्शपूर्ण
एवं
मर्यादित
जीवन
में
ही
तो
है
| इसका जैसा उदात्त्तचित्रण
रामचरितमानस
में
हुआ
है
वैसा
संसार
के किसी
ग्रन्थ
में
एक
साथ
नहीं
मिल
सकता
है
यही
रामचरितमानस
कि
सबसे
बड़ी
विशेषता
है
|”6
वेदों में
भी
कर्मफलकी व्याख्या
की गई
है,
रामचरितमानस
में
भी
यह
व्याख्या
बड़े
ही
सुन्दर
ढंग
से
भरत
तथा
राम
संवाद
में
कि
गई
है
“ संत असंतन्हीकै असि करनी
| जिमी कुठार चंदन
आचरनी
काटइ पासु
मलय
सुनु
भाई
| निज गुण देई
सुगंध
बसाई
||”7संत का
आचरण
चंदन
के
समान
और
असंतो
का
आचरण
कुल्हाड़ी
के
समान
बताया
है
| कुल्हाड़ी चंदन को
काटती
है
किन्तु
चंदन
अपना
गुण
देकरउसेसुगंधसेसुवासितकरदेताहै। इसी
गुण
के
कारण
चंदनदेवताओं
के
सिर
पर
लगाया
जाता
हैऔरकुल्हाड़ी के
मुख
को
आग
में
जलाकर
फिर
घन
से
पिटते
है
| चंदन और कुल्हाड़ी
के
समान
ही
व्यक्तियों
को
अपने
द्वारा
किये
गए
कर्मों को
भुगतना
ही
पड़ता
है
|
निष्कर्ष-भारतीय
ज्ञान
परंपरा
और
भक्ति
काव्य
के
अंतर्गत
रामचरितमानस
ने
भारतीय
समाज
और
संस्कृति
को
एक
नया
रूप
दिया।भक्ति
काव्य
के
माध्यम
से
भारतीय
समाज
ने
धार्मिक,सांस्कृतिक
और
मानसिक
रूप
से
समृद्धिप्राप्त
की
| रामचरितमानस ने
आत्मज्ञान
को
खोज
को
आसान
बनाया
,साथ
ही
समाज
में
एकता
,प्रेम और समानता
की भावना
स्थापित
करने
में
महत्वपूर्ण
योगदान
दिया
है
|
सन्दर्भ
1 हजारी प्रसाद द्विवेदी ,हिंदी साहित्य कि भूमिका , हिंदी ग्रन्थ रत्नाकर कार्यालय बॉम्बे,1940
2 सीताराम चतुर्वेदी एवं अन्य संपादक मंडल ,तुलसी ग्रंथावली (तृतीय खंड VOL-3 1973)
3 तुलसीदास कृत श्री रामचरितमानस , उत्तरकाण्ड ,गीता प्रेस
4 सीताराम चतुर्वेदी एवं अन्य संपादक मंडल ,तुलसी ग्रंथावली (तृतीय खंड VOL-3 1973)
5 तुलसीदास कृत श्री रामचरितमानस , उत्तरकाण्ड ,गीता प्रेस
6 सीताराम चतुर्वेदी एवं अन्य संपादक मण्डल,तुलसी ग्रंथावली (तृतीयखंड) VOl.3 1973
7 तुलसीदास कृत श्री
रामचरितमानस , उत्तरकाण्ड ,गीता प्रेस


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