बहुत सारे लोग डरते हैं—कुछ कहने से, कुछ करने से।
बेहिसाब मतलब से, आगे बढ़ने से, पीछे हटने से।
परिणाम के डर से, इस दुनिया से लड़ने से।
जीत की देरी से, हार के डर से, संभलने से, गिरने से।
अपनी समझ से, औरों के समझाने से,
कुछ वक्त के यूँ ही हाथ से छूट जाने से।
कुछ बीते हुए कल से, कुछ आने वाले पल से,
हम डरते हैं अनजानी राहों पर बेधड़क चलने से।
अनजाने लोगों से मिलने से, अनजानी बातों से,
डरते हैं उस डर से, जो हमें हर वक्त डराता है।
डरते हैं हम खुद के ही अक्स से, अपनी परछाईं से,
दो पल की जिंदगी से और उस डर से—जो वास्तव में है ही नहीं।
By Anupama Arya
This is Anupama Arya from Agra Uttar Pradesh. From the age of 25 , she loves inking up her thoughts in the form of Shayari , poetry , article and short stories.

