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Sahitya Samhita Journal ISSN 2454-2695

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मुकेश कुमार के कहानी संग्रह ‘कर्ज से मुक्ति’ में नारी शक्ति और आत्मनिर्भरता

 मुकेश कुमार के कहानी संग्रह कर्ज से मुक्ति में नारी शक्ति और आत्मनिर्भरता

1सिमरन कुमारी, शोधार्थी, राजीव गांधी विश्वविद्यालय, ईमेल: simran.rgu@gmail.com

2अजय सुब्बा, शोधार्थी, नागालैंड विश्वविद्यालय, ईमेल: ajsubba22@gmail.com

 

 

सारांश

समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में ग्रामीण जीवन, आर्थिक विषमता, किसान-समस्याएँ तथा स्त्री-संघर्ष प्रमुख विषयों के रूप में उभरकर सामने आए हैं। मुकेश कुमार का कहानी-संग्रह कर्ज से मुक्ति’ इसी सामाजिक यथार्थ को अभिव्यक्त करने वाला महत्वपूर्ण संग्रह है। इस संग्रह की कहानियाँ समाज के हाशिए पर स्थित वर्गों की पीड़ा, संघर्ष और जीवन-संघर्ष को यथार्थपरक ढंग से प्रस्तुत करती हैं। प्रस्तुत शोध आलेख में कहानी-संग्रह की प्रमुख कहानी ‘परिश्रम’ के आधार पर नारी शक्ति और आत्मनिर्भरता के स्वरूप का अध्ययन किया गया है। कहानी में एक किसान परिवार की आर्थिक विषमताओं और संकटपूर्ण परिस्थितियों के मध्य स्त्री की संघर्षशीलता, साहस, त्याग, श्रम तथा आत्मनिर्भर व्यक्तित्व को चित्रित किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि कहानी की नारी पात्र विपरीत परिस्थितियों में केवल परिवार की संरक्षिका के रूप में ही नहीं, अपितु आर्थिक, सामाजिक और नैतिक शक्ति के रूप में भी उभरती है। इस दृष्टि से यह कहानी ग्रामीण स्त्री चेतना तथा स्त्री-सशक्तिकरण की सशक्त अभिव्यक्ति है।

 

बीज शब्द

कर्ज, मुक्ति, नारी, शक्ति, आत्मनिर्भरता, स्त्री चेतना, ग्रामीण जीवन, किसान संघर्ष, त्रासदी, परिवार व गरीबी ।

 

प्रस्तावना

समकालीन हिंदी साहित्य में स्त्री-विमर्श एक महत्वपूर्ण विमर्श के रूप में स्थापित हो चुका है। आधुनिक कथा-साहित्य में स्त्री को केवल पारिवारिक दायित्वों तक सीमित न रखकर उसके संघर्ष, आत्मसम्मान, श्रम, आत्मनिर्भरता तथा सामाजिक भूमिका को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है। विशेषतः ग्रामीण जीवन पर आधारित कहानियों में स्त्री की भूमिका अधिक महत्त्वपूर्ण होकर उभरती है, क्योंकि वह परिवार, समाज और आर्थिक जीवन के अनेक स्तरों पर सक्रिय दिखाई देती है। हिंदी कहानी ने समय-समय पर ऐसी स्त्रियों को चित्रित किया है जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने साहस और श्रम के बल पर जीवन को नई दिशा प्रदान करती हैं।

            मुकेश कुमार समकालीन हिंदी साहित्य के ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने अपनी कहानियों में समाज के सामान्य जन, किसान, मजदूर, स्त्री तथा उपेक्षित वर्गों के जीवन को केंद्र में रखा है। उनका कहानी-संग्रह कर्ज से मुक्ति’ सामाजिक यथार्थ का सशक्त दस्तावेज है। संग्रह की कहानियाँ वर्तमान समाज की अनेक समस्याओं को उद्घाटित करती हैं। इनमें किसान जीवन की त्रासदी, आर्थिक विषमता, सामाजिक संघर्ष, बेरोजगारी, पलायन तथा स्त्री-जीवन की विविध स्थितियों का मार्मिक चित्रण किया गया है। संग्रह की कहानी ‘परिश्रम’ विशेष रूप से नारी शक्ति, आत्मनिर्भरता और संघर्षशीलता की दृष्टि से उल्लेखनीय है। प्रस्तुत आलेख में इसी कहानी के आधार पर नारी शक्ति और आत्मनिर्भरता के विभिन्न आयामों का विश्लेषण किया गया है।

मूल आलेख

मुकेश कुमार का कहानी-संग्रह कर्ज से मुक्ति’ वर्ष 2021 में प्रकाशित हुआ, जिसमें कुल सोलह कहानियाँ संकलित हैं। संग्रह की कहानियाँ समकालीन समाज की ज्वलंत समस्याओं पर आधारित हैं। इनमें विशेष रूप से ग्रामीण जीवन, आर्थिक विषमता तथा सामाजिक संघर्ष का यथार्थपरक चित्रण देखने को मिलता है। संग्रह की पहली और महत्वपूर्ण कहानी ‘परिश्रम’ एक किसान परिवार की कथा है, जिसके माध्यम से लेखक ने किसान जीवन की कठिनाइयों और स्त्री के संघर्षपूर्ण जीवन को अत्यंत संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत किया है। कहानी का केंद्र एक छोटे किसान परिवार पर आधारित है, जिसमें किशना, लछमी, रामफल और पार्वती प्रमुख पात्र हैं। किशना एक मेहनती किसान है, किंतु आर्थिक अभाव तथा साहूकार के कर्ज के कारण उसका जीवन निरंतर संघर्षपूर्ण बना रहता है। लेखक किसान जीवन की विडंबना को प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं- “किशना साहूकार का कर्जदार है। वह बहुत मेहनती किसान है। गरीबी के कारण उनका जीवन संघर्षमय है।” यह कथन स्पष्ट करता है कि ग्रामीण जीवन में किसान का श्रम ही उसकी पहचान है, किंतु आर्थिक संसाधनों की कमी और प्राकृतिक विपत्तियाँ उसके जीवन को निरंतर संकटग्रस्त बनाए रखती हैं।

किशना अपने श्रम और कर्म में विश्वास रखने वाला किसान है। वह परिस्थितियों से हार मानने के स्थान पर निरंतर परिश्रम को जीवन का आधार मानता है। इसी भावना को व्यक्त करते हुए वह कहता है- “काम करना…मेहनत करना तो अपने भाग्य में है कुछ काम धाम करेंगे तभी कुछ उपजेगा इस जमीन से पिछली बार तो बीमारी आने की वजह से सारी फसल खराब हो गई थी। साहूकार का कर्ज भी बढ़ता ही जा रहा है।” यह कथन ग्रामीण किसान जीवन के यथार्थ को उद्घाटित करता है। किसान का जीवन श्रम पर आधारित होता है, किंतु प्राकृतिक आपदाएँ और आर्थिक संकट उसके श्रम के प्रतिफल को नष्ट कर देते हैं। परिणामस्वरूप वह कर्ज और अभाव के दुष्चक्र में फँसता चला जाता है। कहानी में किसान जीवन की समस्या के साथ-साथ स्त्री के संघर्षशील व्यक्तित्व को भी समान महत्व दिया गया है। किशना के बीमार पड़ जाने के बाद परिवार की समस्त जिम्मेदारी उसकी पत्नी लक्ष्मी के कंधों पर आ जाती है। उस समय की स्थिति का वर्णन करते हुए लेखक लिखता है- “जब घर का कमानेवाला मुखिया ही चारपाई पर पड़ जाए तो कौन तारनहार हो लिछमी थी तो संघर्षशील पर उसे चिंता खाये जा रही थी अब कैसे गुज़र बसर होगा। घर कैसे चलेगा। बाहर के काम-काज को तो किशना ही देखता था कैसे सँभालेगी लिछमी इतना सब कुछ।” यह प्रसंग ग्रामीण स्त्री की वास्तविक स्थिति को अभिव्यक्त करता है। परिवार की आर्थिक और सामाजिक संरचना का आधार अचानक कमजोर पड़ जाने पर भी वह धैर्य नहीं खोती। यही उसकी आंतरिक शक्ति का परिचायक है।

लछमी का चरित्र कहानी का सबसे सशक्त पक्ष है। वह केवल एक गृहिणी नहीं है, वरन् परिवार की आधारशिला के रूप में उभरती है। पति की बीमारी, आर्थिक संकट और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद वह अपने दायित्वों से विमुख नहीं होती। वह एक ओर पति की सेवा करती है, दूसरी ओर खेत-खलिहान तथा बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी भी निभाती है। उसके चरित्र में त्याग, धैर्य, परिश्रम और आत्मविश्वास का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। कहानी यह स्पष्ट करती है कि परिवार की वास्तविक शक्ति केवल आर्थिक साधनों में नहीं, बल्कि उस स्त्री में निहित होती है जो कठिन परिस्थितियों में भी परिवार को टूटने नहीं देती। कहानी में स्त्री चेतना का एक महत्वपूर्ण आयाम शिक्षा के प्रति जागरूकता के रूप में भी सामने आता है। लछमी आर्थिक संकटों से घिरी होने के बावजूद अपने बच्चों की शिक्षा को अत्यंत महत्त्व देती है। वह जानती है कि शिक्षा ही बेहतर भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। इसी कारण वह अपने पुत्र को प्रेरित करते हुए कहती है- “बेटा... तू पढ़-लिखकर बड़ा अफसर बन जा। तेरी छोटी बहन भी तो स्कूल जाती है फिर उसका ख्याल कौन रखेगा।” यह कथन एक ग्रामीण स्त्री की दूरदर्शिता और जागरूकता का परिचायक है। वह समझती है कि शिक्षा केवल रोजगार का साधन नहीं है, बल्कि सामाजिक उन्नति और आत्मनिर्भरता का आधार भी है। इसलिए वह स्वयं अभावों में जीवन व्यतीत करते हुए भी अपने बच्चों को शिक्षा से वंचित नहीं होने देना चाहती।

कहानी में मातृत्व की संवेदना भी अत्यंत मार्मिक रूप में अभिव्यक्त हुई है। लछमी अपने बच्चों की छोटी-छोटी इच्छाओं को पूरा करने का प्रयास करती है, यद्यपि उसकी आर्थिक स्थिति अत्यंत कमजोर होती है। बच्चों के प्रति उसके स्नेह और समर्पण का परिचय उस प्रसंग में मिलता है जहाँ वह उन्हें आश्वस्त करते हुए कहती है- “सारी चीजें होंगी मेरे बच्चों के पास बस यूँही मेहनत करते रहना। पार्वती खुश हो जाती है... सच्ची माँ! मेरी माँ कितनी अच्छी हैं...। रामफल को पता है घर में पैसे नहीं हैं फिर भी माँ पार्वती को दिलासा दे रही है। पर माँ घर में तो एक भी पैसा नहीं है। अबके महीने भी आपने मेरी फीस नहीं दी थी। मास्टर जी ने ही मेरी और पार्वती की फीस भरी थी।” इस संवाद के माध्यम से लेखक ने आर्थिक अभावों से जूझते परिवार की संवेदनशीलता तथा माँ-बच्चों के भावनात्मक संबंधों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से चित्रित किया है। कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष स्त्री की आत्मनिर्भरता है। पति के बीमार हो जाने के बाद लक्ष्मी परिस्थितियों के आगे समर्पण नहीं करती। वह स्वयं खेती का कार्य संभालने का निर्णय लेती है। यह निर्णय उसके साहस और आत्मविश्वास का परिचायक है। लेखक लिखता है- “सारी रात लिक्षमी विचारों में मग्न रहती है उसे नींद कब आई पता ही नहीं चला आँखें खुली तो दिन चढ़ चुका था। थकी सी थी लेकिन हिम्मत से उठी।” यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि स्त्री की शक्ति केवल भावनात्मक स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि वह आर्थिक और सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में भी सक्षम है। ग्रामीण समाज में जहाँ स्त्रियों की भूमिका प्रायः घरेलू कार्यों तक सीमित समझी जाती रही है, वहाँ लक्ष्मी का खेतों में उतरकर खेती का कार्य संभालना सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देने वाला कदम है।

लछमी का संघर्ष धीरे-धीरे सफलता में परिवर्तित होता है। उसकी मेहनत रंग लाती है और फसल अच्छी होती है। परिणामस्वरूप परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार होने लगता है। सबसे पहले वह साहूकार का कर्ज चुकाती है। कहानी में वर्णित है- “लछमी किशना को लेकर साहूकार के पास जाकर फसल का हिसाब-किताब करती है। साहूकार उनको फसल का हिसाब देता है। साहूकार भी खुश था उसको बरसों से चला आ रहा कर्जा उसे मिल गया था।” यह प्रसंग स्त्री की आर्थिक दक्षता और आत्मनिर्भरता का प्रमाण प्रस्तुत करता है। वह केवल संकट का सामना ही नहीं करती, बल्कि अपने श्रम और दृढ़ निश्चय के बल पर परिवार को आर्थिक स्थिरता भी प्रदान करती है।

कहानी के अंत में किशना स्वस्थ हो जाता है और परिवार पुनः सामान्य जीवन की ओर अग्रसर होता है। किंतु इस समूची यात्रा में लक्ष्मी का व्यक्तित्व एक ऐसी स्त्री के रूप में स्थापित होता है जिसने विपरीत परिस्थितियों को अपनी शक्ति में परिवर्तित कर दिया। उसका संघर्ष यह सिद्ध करता है कि आत्मविश्वास, परिश्रम और धैर्य के माध्यम से जीवन की बड़ी से बड़ी कठिनाइयों का समाधान संभव है। वह केवल अपने परिवार की आधारशिला नहीं बनती, अपितु समूचे समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बन जाती है। इस प्रकार ‘परिश्रम’ कहानी नारी शक्ति, आत्मनिर्भरता, मातृत्व, त्याग और संघर्षशीलता का सशक्त आख्यान है। कहानी में स्त्री को दया या सहानुभूति की पात्र के रूप में नहीं, बल्कि जीवन की चुनौतियों का सामना करने वाली सशक्त व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यही विशेषता इस कहानी को समकालीन स्त्री-विमर्श की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है।

 

निष्कर्ष

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि मुकेश कुमार की कहानी ‘परिश्रम’ ग्रामीण जीवन की कठिन परिस्थितियों के मध्य स्त्री की शक्ति, साहस और आत्मनिर्भरता का प्रभावशाली चित्रण करती है। कहानी की नायिका लक्ष्मी अपने श्रम, त्याग, धैर्य और आत्मविश्वास के माध्यम से यह सिद्ध करती है कि स्त्री केवल परिवार की संरक्षिका नहीं, अपितु संकट की घड़ी में परिवार की वास्तविक शक्ति भी होती है। शिक्षा, श्रम और आत्मनिर्भरता के माध्यम से वह परिवार को आर्थिक और सामाजिक संकटों से उबारती है। इस दृष्टि से कहानी नारी सशक्तिकरण की अवधारणा को ग्रामीण जीवन के यथार्थ से जोड़ते हुए स्त्री के संघर्षशील और आत्मनिर्भर स्वरूप को प्रतिष्ठित करती है। यह कहानी समकालीन समाज में स्त्री की बदलती भूमिका और उसकी आंतरिक शक्ति को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में देखी जा सकती है।

 

संदर्भ ग्रंथ-सूची

1.      मुकेश कुमार के कहानी-संग्रह कर्ज से मुक्ति का सांस्कृतिक परिदृश्य, साहित्य संचय, 2021, पृष्ठ सं. 25

2.      मुकेश कुमार, कर्ज से मुक्ति, सानिया पब्लिकेशन, दिल्ली, 2021, पृष्ठ सं. 15

3.      वही, पृष्ठ सं. 18

4.      वही, पृष्ठ सं. 16

5.      वही, पृष्ठ सं. 16

6.      वही, पृष्ठ सं. 19

7.      वही, पृष्ठ सं. 21

 

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