काजलीन कौर¹, हरप्रीत कौर²
¹ सहायक प्रोफेसर, अर्थशास्त्र विभाग,
श्री गुरु
गोबिंद सिंह
कॉलेज ऑफ कॉमर्स, दिल्ली
विश्वविद्यालय
² एसोसिएट प्रोफेसर, अर्थशास्त्र विभाग,
श्री गुरु
गोबिंद सिंह
कॉलेज ऑफ कॉमर्स, दिल्ली
विश्वविद्यालय
सार
ओवर-द-टॉप (OTT) प्लेटफॉर्म आज मनोरंजन के सबसे लोकप्रिय माध्यमों में
से एक बन चुके
हैं। इन प्लेटफॉर्मों पर निम्नस्तरीय और अपमानजनक भाषा
का अत्यधिक
उपयोग देखने
को मिलता
है। इसका
समाज पर, विशेष रूप
से युवा
पीढ़ी पर, गंभीर सामाजिक
प्रभाव पड़
सकता है।
तीखी और स्त्री-विरोधी
गालियों तथा
अश्लील अभिव्यक्तियों के व्यापक संपर्क
से समाज
में इनके
प्रति स्वीकृति और सहनशीलता बढ़ने
का खतरा
उत्पन्न होता
है।
समाज को इसके परिणामस्वरूप डिमेरिट गुड (Demerit
Good) तथा नकारात्मक बाह्यताओं (Negative
Externalities) के रूप
में सामाजिक
लागत वहन
करनी पड़
सकती है।
यह शोध-पत्र इन मुद्दों पर विस्तृत चर्चा
करता है तथा इस बात की संभावना और आवश्यकता का विश्लेषण करता
है कि अश्लील भाषा
के बढ़ते
उपयोग को नियंत्रित करने
के लिए
नियम और दिशानिर्देश बनाए
जाएँ। इस अध्ययन में
विभिन्न आयु
वर्गों के 300 से अधिक
दर्शकों का सर्वेक्षण भी किया गया
है ताकि
यह समझा
जा सके
कि OTT पर प्रयुक्त अपमानजनक भाषा
के प्रति
लोगों की प्रतिक्रिया क्या
है, उसका
सामाजिक प्रभाव
क्या है तथा इसके
नियमन की आवश्यकता कितनी
है।
मुख्य शब्द: OTT,
अपमानजनक भाषा,
सामाजिक प्रभाव,
डिमेरिट गुड,
बाह्यताएँ
1.
परिचय
ओवर-द-टॉप (OTT) प्लेटफॉर्म ने भारत के मनोरंजन परिदृश्य को पूरी तरह
बदल दिया
है और दर्शकों के बीच एक विशेष स्थान
बना लिया
है। उपभोक्ताओं की देखने की आदतों में
बदलाव तथा
तकनीकी प्रगति
के कारण
हाल के वर्षों में
OTT की लोकप्रियता तेजी
से बढ़ी
है। इसे
प्रगतिशील, यथार्थवादी तथा
विविध सामग्री
प्रदान करने
वाला माध्यम
माना जाता
है, जो विभिन्न आयु
वर्गों और रुचियों के दर्शकों की आवश्यकताओं को पूरा करता
है।
OTT प्लेटफॉर्म इंटरनेट
के माध्यम
से स्मार्टफोन, टैबलेट,
लैपटॉप और स्मार्ट टीवी
जैसे कई उपकरणों पर उपलब्ध होते
हैं, जिससे
दर्शक किसी
भी समय
और कहीं
भी सामग्री
देख सकते
हैं। यह सुविधा पारंपरिक केबल
नेटवर्क से अलग और अधिक सुविधाजनक है।
नेटफ्लिक्स ने 2007
में अपनी
स्ट्रीमिंग सेवा
शुरू की थी, जिसके
बाद 2011 में अमेज़न
प्राइम वीडियो
आया और उसके बाद
हर वर्ष
कई नए प्लेटफॉर्म जुड़ते
गए।
भारत विश्व
में इंटरनेट
उपयोगकर्ताओं के मामले में
दूसरा सबसे
बड़ा देश
है और कोविड-19 महामारी के दौरान OTT प्लेटफॉर्मों की लोकप्रियता में
भारी वृद्धि
हुई। भारतीय
बाजार में
प्रतिस्पर्धा बढ़
रही है और नेटफ्लिक्स, अमेज़न
प्राइम, डिज़्नी
हॉटस्टार, सोनी
लिव, ज़ी
आदि कई प्लेटफॉर्म अंतरराष्ट्रीय, क्षेत्रीय और स्थानीय सामग्री
उपलब्ध करा
रहे हैं।
भारत की लगभग 146 करोड़ जनसंख्या में लगभग 8 करोड़ लोग शेयर बाजार के उपयोगकर्ता हैं, जबकि लगभग 50 करोड़ लोग OTT प्लेटफॉर्मों का उपयोग करते हैं।
OTT की बढ़ती
लोकप्रियता के साथ-साथ
इन प्लेटफॉर्मों पर अपमानजनक और अनुचित भाषा
के प्रसार
को लेकर
चिंता भी बढ़ रही
है, जो सामान्य समाज
तथा विशेष
रूप से कुछ आयु
वर्गों के लिए उपयुक्त
नहीं है।
OTT पर प्रयुक्त कठोर
भाषा को लेकर कई कानूनी और सामाजिक आपत्तियाँ उठी
हैं। हालांकि,
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 20 मार्च 2024 के अपने
निर्णय में
कहा कि OTT पर अपमानजनक भाषा
का उपयोग
अपने-आप में अपराध
नहीं माना
जा सकता
क्योंकि इससे
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कलात्मक सृजनात्मकता प्रभावित होगी।
इसके बावजूद
यह प्रश्न
बना रहता
है कि क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर ऐसी भाषा
का उपयोग
उचित है जो समाज
की सांस्कृतिक संवेदनाओं को प्रभावित कर सकती है।
2. OTT पर अपमानजनक भाषा के अत्यधिक उपयोग के कारण और उनका प्रभाव
OTT प्लेटफॉर्मों पर सामग्री निर्माताओं द्वारा
अपमानजनक भाषा
के उपयोग
को अक्सर
दर्शकों की अपेक्षाओं के अनुरूप बताया
जाता है।
उनके अनुसार,
सामग्री को पात्रों, विषयवस्तु और समग्र प्रस्तुति के प्रति दर्शकों
की धारणा
के अनुसार
शैलीबद्ध किया
जाता है
(Kaur, 2024)। निर्माताओं का मानना है कि इससे
कुछ कथानकों
या पात्रों
की प्रस्तुति में
प्रामाणिकता (authenticity) जुड़ जाती
है।
2.1
OTT पर अपमानजनक या निम्नस्तरीय भाषा के उपयोग के मुख्य कारण
• समाज का यथार्थ चित्रण - चूँकि OTT सामग्री मूलतः
समाज की ही एक सिनेमाई प्रस्तुति होती
है, इसलिए
यह प्रायः
वास्तविकता के अधिक निकट
रहने का प्रयास करती
है। अपमानजनक भाषा
का प्रयोग
विशेष रूप
से समाज
के निम्न
तथा कम शिक्षित वर्गों
में, अपराध
से जुड़े
प्रसंगों में,
तीव्र भावनात्मक परिस्थितियों में
या परिपक्व
आयु वर्गों
के सामान्य
संवादों में
देखने को मिलता है।
किशोरों और युवा पीढ़ी
के बीच
भी यह कई बार
एक प्रकार
का फैशन
बन गया
है (Kaur, 2024)। इसलिए
निर्माता समाज
में प्रचलित
भाषा को ही प्रस्तुत करना
अधिक प्रभावी
मानते हैं।
• रचनात्मक स्वतंत्रता - OTT प्लेटफॉर्म रचनाकारों को सामग्री प्रस्तुति के मामले में
टेलीविजन धारावाहिकों की तुलना में
अधिक स्वतंत्रता प्रदान
करते हैं।
इससे उन्हें
विभिन्न प्रकार
के विषयों
का चयन
और प्रस्तुति करने
की सुविधा
मिलती है, जिनमें तीव्र
या कठोर
भाषा वाले
विषय भी शामिल हो सकते हैं।
कठोर सेंसरशिप नियमों
की अनुपस्थिति के कारण निर्माता चरित्र
निर्माण और कथा-विकास
के लिए
अपमानजनक भाषा
का प्रयोग
करने में
अधिक स्वतंत्र होते
हैं।
• लक्षित दर्शक वर्ग - OTT सामग्री प्रायः
विभिन्न प्रकार
के दर्शकों
को ध्यान
में रखकर
वर्गीकृत की जाती है।
विशेष रूप
से वयस्क
दर्शकों को परिपक्व विषयों
के प्रति
अधिक ग्रहणशील माना
जाता है।
कुछ निर्माता ऐसे
दर्शकों को आकर्षित करने
के लिए
कठोर, अशिष्ट
और बिना
किसी फिल्टर
वाली भाषा
का उपयोग
करते हैं,
जिससे सामग्री
अधिक प्रामाणिक प्रतीत
होती है।
• सांस्कृतिक और क्षेत्रीय विशेषताएँ - कुछ क्षेत्रों या सांस्कृतिक समूहों
में कठोर
या तीखी
भाषा का प्रयोग अपेक्षाकृत अधिक
सामान्य होता
है। ऐसे
में निर्माता जब किसी विशेष
सामाजिक या क्षेत्रीय परिवेश
को प्रस्तुत करते
हैं, तो वे उसी
प्रकार की भाषा का उपयोग करते
हैं ताकि
चित्रण अधिक
यथार्थवादी और विश्वसनीय लगे।
• चरित्र निर्माण - कई बार
कहानी में
कुछ विशेष
पात्रों के सशक्त चित्रण
के लिए
कठोर या अपमानजनक भाषा
का प्रयोग
आवश्यक माना
जाता है।
कभी-कभी
ऐसी भाषा
के प्रयोग
से कहानी
की प्रभावशीलता भी बढ़ जाती
है। कई बार किसी
पात्र के संवाद इतने
लोकप्रिय हो जाते हैं
कि वह पात्र पूरी
श्रृंखला या फिल्म से भी अधिक
प्रसिद्ध हो जाता है।
नकारात्मक पात्रों
को लोकप्रिय बनाने
का एक आसान तरीका
उनके संवादों
में अपमानजनक या गाली-गलौज
वाली भाषा
का प्रयोग
करना भी माना जाता
है, जिसे
दर्शक अक्सर
मनोरंजक मानते
हैं। इस प्रकार की भाषा का उपयोग किसी
पात्र को विरोधी, शत्रुतापूर्ण, विद्रोही या अपराधी के रूप में
प्रस्तुत करने
के लिए
किया जा सकता है, जिससे उसके
व्यक्तित्व, पृष्ठभूमि या भावनाओं को स्पष्ट किया
जा सके
(Sahai, 2024)।
• नियमन का अभाव - पारंपरिक मीडिया जैसे टेलीविजन धारावाहिकों और फिल्मों के विपरीत OTT प्लेटफॉर्मों का प्रसारण अभी भी अपेक्षाकृत कम नियंत्रित है। इसी कारण सामग्री निर्माता कई बार इस स्वतंत्रता का लाभ उठाकर दृश्य और भाषाई दोनों रूपों में अश्लील अथवा अत्यधिक आपत्तिजनक सामग्री प्रस्तुत कर देते हैं।
2.2 अपमानजनक भाषा का प्रभाव
OTT प्लेटफॉर्म ने निस्संदेह लेखकों
और निर्देशकों की रचनात्मक एवं
कलात्मक अभिव्यक्ति को बढ़ावा दिया
है, जिससे
वे वास्तविक जीवन
को अधिक
निकटता से प्रस्तुत कर सकते हैं।
रचनाकारों को विभिन्न प्रकार
की भावनाओं
और कथानकों
को प्रस्तुत करने
की स्वतंत्रता प्राप्त
होती है।
अपमानजनक या कठोर भाषा
कई बार
पात्रों की गहराई को दर्शाने, तीव्र
भावनाओं को व्यक्त करने
तथा संवादों
को अधिक
प्रभावशाली बनाने
का एक साधन बन जाती है।
यह विशेष
रूप से अपराध, थ्रिलर
और नाटक
जैसी विधाओं
में उपयोगी
मानी जाती
है, जहाँ
कठोर भाषा
परिस्थितियों या वातावरण की तीव्रता को प्रतिबिंबित करती
है।
Dhiman
और Malik (2021) के अनुसार,
तीखी भाषा
दर्शकों की संलग्नता (engagement) को बढ़ाती
है तथा
ऐसे दर्शकों
में निष्ठा
(loyalty) का निर्माण करती
है जो इस प्रकार
की सामग्री
को पसंद
करते हैं।
हालांकि, इसके
परिणामस्वरूप दर्शकों
के बीच
सामाजिक रूप
से विभाजित
समूह भी बन सकते
हैं, क्योंकि
कुछ दर्शक
इसे अपमानजनक, असम्मानजनक और नैतिक रूप
से चुनौतीपूर्ण मानते
हुए ऐसे
निर्माताओं या प्लेटफॉर्मों की सामग्री से दूरी बना
लेते हैं।
यद्यपि इस प्रकार की भाषा के सामान्य प्रयोग
का पूरा
दायित्व OTT प्लेटफॉर्मों पर नहीं डाला
जा सकता,
क्योंकि यह पहले से ही समाज
में मौजूद
प्रवृत्तियों को दर्शाता है, फिर भी बिना पर्याप्त सेंसरशिप या नियमन के इस प्रकार
की सामग्री
के प्रसारण
ने निश्चित
रूप से इसकी व्यापकता को बढ़ाया है
(Kaur, 2024)।
सामान्यतः, OTT प्लेटफॉर्मों पर अपमानजनक भाषा
का अनियंत्रित उपयोग
समाज पर गंभीर प्रभाव
डालता है।
इसे डिमेरिट गुड के रूप में
वर्गीकृत किया
जा सकता
है, जिसमें
उच्च स्तर
की नकारात्मक बाह्यताएँ (Negative Externalities) मौजूद
होती हैं,
और दोनों
मिलकर सामाजिक लागत (Social Cost)
उत्पन्न करते
हैं (Kaur, 2024; Kaur and Kaur, 2026)।
2.2.1
OTT पर अपमानजनक भाषा एक डिमेरिट गुड के रूप में
डिमेरिट गुड
के रूप
में, OTT प्लेटफॉर्मों पर अपमानजनक भाषा
से आशय
ऐसी सामग्री
से है जिसमें आक्रामक,
हानिकारक या अनुचित भाषा
का प्रयोग
किया जाता
है, जो उपभोक्ताओं पर नकारात्मक प्रभाव
डाल सकती
है, विशेषकर
तब जब उस पर पर्याप्त नियमन
या प्रतिबंध न हो। समाज
इस प्रकार
की सामग्री
को हानिकारक मान
सकता है क्योंकि यह व्यक्तियों के व्यवहार, मानसिक
स्वास्थ्य या सामाजिक मानदंडों पर प्रतिकूल प्रभाव
डाल सकती
है। इसके
परिणामस्वरूप इसका
अत्यधिक उपभोग
हो सकता
है तथा
इसके नकारात्मक प्रभावों को कम आँका
जा सकता
है (Kaur and Kaur, 2026; Kaur, 2024; Bhatia, 2021;
Kumar, 2022)।
यह प्रवृत्ति समाज
की संरचना
को प्रभावित करती
है, और भारत जैसे
देश में,
जो अपने
गहरे सांस्कृतिक मूल्यों
के लिए
जाना जाता
है, यह उसकी पहचान
के लिए
भी चुनौती
बन सकती
है। भारत
को कई बार स्वाभाविक रूप
से एक सॉफ्ट पावर के रूप में
भी देखा
जाता है
(Wagner, 2010)। उपनिषदों और वेदों की समृद्ध परंपरा,
बौद्ध धर्म
का वैश्विक
प्रसार, योग
और आयुर्वेद की लोकप्रियता, तथा
प्राचीन विश्वविद्यालयों की विरासत विश्वभर
के विद्वानों और शिक्षार्थियों को भारत की ओर आकर्षित
करती है।
OTT के माध्यम
से निम्नस्तरीय भाषा
का बिना
झिझक और व्यापक प्रसार
हमारे लंबे
समय से विरासत में
मिले मूल्यों,
संस्कृति और सामाजिक दृष्टिकोण के लिए खतरा
उत्पन्न कर रहा है।
यह राष्ट्र
के लिए
दोहरे रूप
में नुकसानदायक है—एक ओर यह स्वदेशी
सांस्कृतिक मूल्यों
को कमजोर
करता है, और दूसरी
ओर वैश्विक
स्तर पर भारत की सांस्कृतिक पहचान
को भी प्रभावित कर सकता है।
2.2.2
नकारात्मक बाह्यताएँ (Negative Externalities)
नकारात्मक बाह्यता
तब उत्पन्न
होती है जब किसी
वस्तु के उपभोग से उन तृतीय
पक्षों पर भी लागत
या दुष्प्रभाव पड़ता
है जो सीधे उस उपभोग में
शामिल नहीं
होते। OTT सामग्री में
अपमानजनक भाषा
के उपयोग
से ऐसे
प्रभाव व्यक्तियों, समुदायों और संपूर्ण समाज
पर पड़
सकते हैं।
• संचार कौशल में गिरावट
कम आयु
के दर्शक
या अत्यधिक
प्रभावित दर्शक
OTT सामग्री में
प्रयुक्त अपमानजनक भाषा
से आसानी
से प्रभावित हो जाते हैं
और उसे
अपने दैनिक
संवाद का हिस्सा बना
लेते हैं।
जब स्क्रीन
पर दिखाई
देने वाले
प्रसिद्ध व्यक्तित्व या पात्र इस प्रकार की भाषा का प्रयोग करते
हैं, तो दर्शक सचेत
या अवचेतन
रूप से उनके व्यवहार
की नकल
करने लगते
हैं। इसे
प्रदर्शन प्रभाव (Demonstration Effect) कहा
जा सकता
है।
सामान्य बातचीत
में गाली-गलौज का प्रयोग व्यक्तिगत और व्यावसायिक दोनों
क्षेत्रों में
हानिकारक हो सकता है।
यह परिवार,
मित्रता और कार्यस्थलों में
मौखिक संघर्षों को बढ़ा सकता
है, जिससे
भावनात्मक संतुलन
प्रभावित होता
है। इससे
सामाजिक सीमाएँ
और मानदंड
कमजोर पड़ते
हैं तथा
आक्रामक और शत्रुतापूर्ण संचार
को बढ़ावा
मिलता है।
अंततः समाज
में नैतिक
पतन की स्थिति उत्पन्न
हो सकती
है, जो शैक्षिक और व्यावसायिक मूल्यों
को भी कमजोर करती
है।
मीडिया से आसानी से प्रभावित होने
वाली युवा
पीढ़ी कई बार दैनिक
संवाद में
गाली-गलौज
को एक फैशन के रूप में
अपनाने लगती
है और कभी-कभी
इसे सामाजिक
संबंधों के लिए आवश्यक
भी मानने
लगती है।
धीरे-धीरे
यह प्रवृत्ति अशिष्ट
भाषा के प्रयोग को सामान्य बना
देती है और दर्शकों
को इसके
प्रति असंवेदनशील कर देती है।
परिणामस्वरूप समाज
में मौखिक
दुर्व्यवहार को अधिक स्वीकार्य समझा
जाने लगता
है।
समय के साथ यह सभ्य और प्रभावी अभिव्यक्ति की क्षमता को कमजोर करता
है, जो सामाजिक संवाद
के लिए
हानिकारक है।
कार्यस्थलों पर, जहाँ सॉफ्ट स्किल्स को अत्यंत महत्वपूर्ण माना
जाता है, इस प्रकार
की कठोर
भाषा स्वस्थ
और सहयोगात्मक कार्य-संस्कृति को बाधित करती
है और एक अप्रिय,
आक्रामक तथा
असहज वातावरण
उत्पन्न कर सकती है।
इससे कर्मचारियों का मनोबल और उत्पादकता घट सकती है, विशेष रूप
से महिला
कार्यबल के लिए यह स्थिति अधिक
चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
यदि मौखिक
उत्पीड़न या घृणास्पद भाषण
की स्थिति
अत्यधिक गंभीर
हो जाए,
तो संस्थाओं को कठोर आचार
संहिता लागू
करनी पड़
सकती है और आक्रामक
व्यवहार को कम करने
के लिए
परामर्श सत्र
आयोजित करने
पड़ सकते
हैं (Rajput, 2024)।
• अनुचित भाषा भारतीय ज्ञान प्रणाली के लिए एक खतरा
भारत में
शिक्षा प्रणाली
वर्तमान में
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) और भारतीय ज्ञान प्रणाली (Indian Knowledge System) के माध्यम से परिवर्तन के दौर से गुजर रही
है। इसका
उद्देश्य भारतीय
मूल्यों और परंपराओं पर आधारित उच्च
गुणवत्ता वाली
शिक्षा प्रदान
करना है, ताकि भारत
को मूल्य-आधारित वैश्विक
शक्ति के रूप में
विकसित किया
जा सके।
OTT प्लेटफॉर्म विभिन्न
प्रकार की वैश्विक सामग्री
तक पहुँच
प्रदान करते
हैं, किंतु
यदि इसमें
पर्याप्त नियमन
या सांस्कृतिक संवेदनशीलता न हो, तो इसका प्रभाव
पारंपरिक मूल्यों,
शैक्षिक उद्देश्यों और सामाजिक मानदंडों को कमजोर कर सकता है (Kaur
and Kaur, 2026; Kaur, 2024)।
OTT सामग्री में
अपमानजनक या अशिष्ट भाषा
का अत्यधिक
प्रयोग भाषा
कौशल पर प्रतिकूल प्रभाव
डाल सकता
है। कम उम्र और संवेदनशील अवस्था
में विद्यार्थी कई बार अशिष्ट
या अनौपचारिक भाषा
के प्रयोग
को अपनाने
लगते हैं,
जबकि उन्हें
यह स्पष्ट
रूप से समझ नहीं
होता कि कौन-सी भाषा उचित
है और कौन-सी अनुचित।
इससे युवा
विद्यार्थियों की रचनात्मक सोच,
विवेकपूर्ण संवाद
और आत्मविश्वास के साथ अभिव्यक्ति करने
की क्षमता
प्रभावित हो सकती है।
यह स्थिति
शैक्षणिक और व्यावसायिक संवाद
के मानकों
के अनुरूप
नहीं है।
भारतीय शिक्षा
प्रणाली के मूल सिद्धांत समग्र
और मूल्य-आधारित शिक्षा
पर आधारित
हैं, जिसमें
अनुशासन और सम्मान को विशेष महत्व
दिया जाता
है। इसका
उद्देश्य केवल
शैक्षणिक विकास
ही नहीं
बल्कि व्यक्तित्व का समग्र विकास
करना है, ताकि ऐसे
नागरिक तैयार
किए जा सकें जो नैतिक और सांस्कृतिक रूप
से सुदृढ़
होने के साथ-साथ
समाज और अर्थव्यवस्था में
सकारात्मक परिवर्तन ला सकें।
OTT प्लेटफॉर्मों पर प्रयुक्त कठोर
और असभ्य
भाषा ध्यान
को रचनात्मक सामग्री
से हटाकर
शैक्षिक और बौद्धिक स्तर
में गिरावट
ला सकती
है। इससे
भारतीय परंपराओं से जुड़े सांस्कृतिक मूल्यों
को भी क्षति पहुँच
सकती है और विद्यार्थियों का अपने सांस्कृतिक विरासत
से संबंध
कमजोर हो सकता है।
इस प्रकार,
एक ओर जहाँ हम अपनी समृद्ध
सांस्कृतिक विरासत
को पुनर्जीवित करने
का प्रयास
कर रहे
हैं, वहीं
दूसरी ओर हम अनजाने
में अशिष्ट
भाषा के प्रयोग को स्वीकार या प्रोत्साहित भी कर रहे
हैं। शैक्षणिक संस्थानों में
अपमानजनक भाषा
के प्रति
शून्य-सहिष्णुता की नीति अपनाई
जाती है, लेकिन बच्चे
अपने व्यापक
सामाजिक वातावरण
से भी सीखते हैं,
जिसमें वर्तमान
समय में
OTT एक महत्वपूर्ण हिस्सा
बन चुका
है।
• OTT
द्वारा लैंगिक रूढ़ियों को बढ़ावा
OTT सामग्री में
अपमानजनक भाषा
से संबंधित
एक अन्य
नकारात्मक बाह्यता
यह है कि इसमें
कई बार
लैंगिक-विशेष
अपमानजनक शब्दों
का प्रयोग
किया जाता
है, जो मुख्यतः महिलाओं
को वस्तु
की तरह
प्रस्तुत करते
हैं (Kaur and Kaur, 2026; Kaur, 2024)। इससे
महिलाओं के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचती
है और यह सामाजिक
रूप से भी अपमानजनक है।
भारत जैसे
समाज में,
जहाँ पहले
से ही लैंगिक असमानता
की चुनौतियाँ मौजूद
हैं, महिलाओं
के प्रति
इस प्रकार
की अपमानजनक भाषा
दर्शकों को इसके दुष्प्रभावों के प्रति असंवेदनशील बना
सकती है।
इससे महिलाओं
की गरिमा
और अधिकारों पर पड़ने वाले
नकारात्मक प्रभावों को कम महत्व
दिया जाने
लगता है तथा हानिकारक लैंगिक
रूढ़ियों को बल मिलता
है।
अपमानजनक भाषा
के सहज
प्रयोग से स्त्री-विरोधी
दृष्टिकोण को सामान्य बना
दिया जाता
है, जिससे
समाज में
सम्मानजनक और समान वातावरण
के निर्माण
की प्रक्रिया बाधित
हो सकती
है। इसके
परिणामस्वरूप महिलाओं
में मानसिक
तनाव, आत्मसम्मान में
कमी तथा
सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण
की कमी
जैसी समस्याएँ उत्पन्न
हो सकती
हैं।
भारतीय संस्कृति में
देवी-पूजा
की परंपरा
है और महिलाओं को विभिन्न भूमिकाओं में
सम्मानजनक स्थान
दिया जाता
है। यह भी निर्विवाद है कि समाज
में मूल्यों
और नैतिकता
की मजबूत
नींव स्थापित
करने में
महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका
रही है।
इसलिए समाज
का यह दायित्व है कि उनकी
गरिमा और सम्मान को बनाए रखा
जाए।
अतः OTT सामग्री में
अपमानजनक भाषा,
भले ही लोकप्रियता प्राप्त
कर ले, लेकिन इसके
गंभीर सामाजिक
दुष्परिणाम हो सकते हैं।
इस प्रकार
यह एक डिमेरिट गुड के रूप में
कार्य करती
है, जिसके
साथ महत्वपूर्ण नकारात्मक बाह्यताएँ भी जुड़ी होती
हैं।
3. नियमन / सेंसरशिप की आवश्यकता
OTT प्लेटफॉर्म विभिन्न
विधाओं की सामग्री तक लगभग बिना
किसी सेंसरशिप के पहुँच प्रदान
करते हैं,
जो टेलीविजन या सिनेमा के विपरीत है जहाँ सामग्री
पर अपेक्षाकृत अधिक
नियंत्रण होता
है। समाज
का एक बड़ा वर्ग
ऐसी अप्रिय
सामग्री से असहज महसूस
करता है, जो बिना
किसी प्रभावी
नियमन के आसानी से उपलब्ध है।
यह सामग्री
कई बार
आपत्तिजनक और अनुचित होती
है तथा
विभिन्न प्रकार
के सामाजिक
दुष्प्रभाव उत्पन्न
कर सकती
है—जैसे
मौखिक दुर्व्यवहार के प्रति असंवेदनशीलता, उसके
सामान्यीकरण की प्रवृत्ति, तथा
विभिन्न आयु
वर्गों, संस्कृतियों और समाजों के दर्शकों पर नकारात्मक प्रभाव
(Sahai, 2024; Tripathi, 2020)।
केवल “यह सामग्री एक निश्चित आयु
वर्ग के लिए उपयुक्त
नहीं है” जैसे वैधानिक
चेतावनी (statutory warning) देना ही निर्माताओं की जिम्मेदारी को पूरा नहीं
करता (Kaur, 2024)। इंटरनेट
की व्यापक
उपलब्धता और घर-घर में विभिन्न
डिजिटल उपकरणों
के माध्यम
से उसकी
आसान पहुँच
के कारण
बच्चों को इस प्रकार
की सामग्री
देखने से हर समय
रोक पाना
व्यावहारिक रूप
से संभव
नहीं है।
साथ ही, एकल परिवार
(nuclear family) की बढ़ती प्रवृत्ति और कामकाजी माता-पिता की जीवन-शैली
के कारण
यह चुनौती
और भी बढ़ जाती
है।
कई देशों
में सामग्री
से संबंधित
दिशानिर्देश और कानून अभी
भी अस्पष्ट
रूप से परिभाषित हैं
(Baccarne, 2014)। भारत सरकार
ने वर्ष
2021 में नए नियम लागू
किए, जिनके
अंतर्गत OTT प्लेटफॉर्मों को अपनी सामग्री
के लिए
स्व-नियमन
(self-regulation) की व्यवस्था अपनानी
होगी तथा
दर्शकों को शिकायत दर्ज
कराने का एक माध्यम
उपलब्ध कराना
होगा। इसके
अतिरिक्त, इन नियमों के तहत प्लेटफॉर्मों को सामग्री के लिए चेतावनी
(content warning) प्रदर्शित
करना और आयु-अनुकूलता के आधार पर सामग्री का वर्गीकरण करना
भी अनिवार्य किया
गया है।
संयुक्त राज्य
अमेरिका में
OTT प्लेटफॉर्मों पर वही कानून
लागू होते
हैं जो पारंपरिक प्रसारण
माध्यमों पर लागू होते
हैं। इसी
प्रकार सिंगापुर में
Broadcasting Notification के अंतर्गत OTT प्लेटफॉर्मों को सामग्री मानकों
और वर्गीकरण संबंधी
नियमों का पालन करना
अनिवार्य है।
यह स्पष्ट
है कि नियामक उपायों
को और सुदृढ़ करने
की आवश्यकता है, क्योंकि OTT वैश्विक स्तर
पर मनोरंजन
उद्योग का भविष्य बन चुका है।
संभावित उपायों
में प्रभावी
अस्वीकरण (disclaimers) और भाषा
संबंधी दिशानिर्देश शामिल
हो सकते
हैं, जो सांस्कृतिक, नैतिक
और सामाजिक
मानदंडों को प्रतिबिंबित करें,
ताकि दर्शक
स्वयं यह चुन सकें
कि वे किस प्रकार
की सामग्री
देखना चाहते
हैं और अनुचित सामग्री
से बच सकें (Sahai, 2024)।
दर्शकों को आपत्तिजनक सामग्री
की रिपोर्ट
करने का अधिकार भी होना चाहिए,
और नियामक
संस्थाओं—जैसे
सूचना एवं
प्रसारण मंत्रालय—को गंभीर मामलों
में निर्माताओं के विरुद्ध कार्रवाई करने
या दंडात्मक उपाय
अपनाने की अनुमति होनी
चाहिए। इस प्रकार के उपायों में
कठोर सामग्री
वर्गीकरण, स्व-नियमन और सरकारी हस्तक्षेप का संतुलित संयोजन
आवश्यक है, ताकि मीडिया
उपभोग में
शालीनता, सम्मान
और सांस्कृतिक संवेदनशीलता सुनिश्चित की जा सके।
सबसे महत्वपूर्ण बात
यह है कि मीडिया
में प्रयुक्त आपत्तिजनक भाषा
के प्रभाव
के बारे
में व्यापक
जन-जागरूकता की भी अत्यंत
आवश्यकता है।
दर्शकों, विशेषकर
अभिभावकों को यह समझाने
की आवश्यकता है कि वे अपने परिवार
द्वारा देखी
जाने वाली
सामग्री की निगरानी किस
प्रकार कर सकते हैं।
विद्यालयों को भी नियमित
रूप से विद्यार्थियों को परामर्श देना
चाहिए कि वे आयु-अनुकूल, ज्ञानवर्धक और स्वस्थ मनोरंजन
वाली सामग्री
ही देखें
तथा भाषा
और मीडिया
सामग्री के सामाजिक व्यवहार
पर पड़ने
वाले प्रभाव
के बारे
में अधिक
जागरूकता फैलाएँ।
यद्यपि OTT प्लेटफॉर्मों का प्रभाव लगातार
बढ़ रहा
है और वे मनोरंजन
का एक अनिवार्य माध्यम
बनते जा रहे हैं,
फिर भी रचनात्मक स्वतंत्रता को बाधित किए
बिना सभी
दर्शकों के लिए उपयुक्त
सामग्री सुनिश्चित करना
एक संवेदनशील किंतु
अत्यंत आवश्यक
संतुलन है।
जैसे-जैसे
इन सेवाओं
की लोकप्रियता बढ़ती
जाएगी, सरकारों
और नियामक
संस्थाओं को भी समय-समय पर इनसे संबंधित
कानूनों की समीक्षा और अद्यतन करते
रहना होगा।
4. सर्वेक्षण: अपमानजनक भाषा के प्रभाव का मूल्यांकन
OTT प्लेटफॉर्मों पर प्रयुक्त तीखी
अथवा अपमानजनक भाषा
के लाभ
और हानियों
पर की गई चर्चा
के आधार
पर, इस शोध-पत्र
में लोगों
की राय,
मनोविज्ञान, प्रतिक्रिया तथा
अनुकूलन को समझने और उसके सामाजिक
प्रभाव का आकलन करने
के लिए
एक सर्वेक्षण किया
गया है।
इस सर्वेक्षण में
306 व्यक्तियों के नमूने से आँकड़े एकत्र
किए गए, जिनमें विभिन्न
आयु वर्गों
के लोग
शामिल थे।
इन आयु
वर्गों में
13–15 वर्ष, 16–18 वर्ष तथा
18 वर्ष और उससे अधिक
आयु के लोग सम्मिलित थे।
उत्तरदाताओं में
58 प्रतिशत पुरुष,
42 प्रतिशत महिलाएँ
थीं, जबकि
अन्य लिंग
से कोई
उत्तरदाता शामिल
नहीं था।
अधिकांश उत्तरदाता (लगभग
98 प्रतिशत) OTT प्लेटफॉर्म पर स्ट्रीम की जाने वाली
सामग्री देखते
हैं। सर्वेक्षण से संबंधित जनसांख्यिकीय विवरण
तालिका 1 में स्पष्ट
रूप से प्रस्तुत किए
गए हैं,
जबकि सर्वेक्षण के परिणाम तालिका
2 में दर्शाए
गए हैं।
तालिका 1: सर्वेक्षण का जनसांख्यिकीय विवरण
|
कुल उत्तरदाता |
306 |
|
|
आयु वितरण |
||
|
13-15 वर्ष
|
16-18 वर्ष |
18 वर्ष और उससे अधिक |
|
68 |
86 |
152 |
|
लिंग वितरण |
||
|
पुरुष |
महिलाएँ |
अन्य |
|
177 |
129 |
0 |
|
OTT दर्शक |
300/306 |
|
स्रोत: लेखकों द्वारा
संकलित
तालिका 2: OTT पर अपमानजनक भाषा के प्रति लोगों की धारणा
|
क्र. सं.
|
प्रश्न |
सहमत (%) |
असहमत (%) |
तटस्थ (%) |
|
1. |
क्या आपको OTT पर अपमानजनक सामग्री यथार्थवादी लगती है? |
53.3 |
10.1 |
36.6 |
|
2. |
क्या आपने आयु चेतावनी के बावजूद ऐसी सामग्री देखी है? |
43.8 |
6.2 |
50 |
|
3. |
क्या यह भाषा महिलाओं के लिए अपमानजनक है? |
86 |
12 |
2 |
|
4. |
क्या आप स्त्री-विरोधी भाषा की निंदा करते हैं? |
46.4 |
38.6 |
38.6 |
|
5. |
क्या आप परिवार के साथ ऐसी सामग्री देखने में सहज हैं? |
75.8 |
18.2 |
6.1 |
|
6. |
क्या गाली-गलौज को फैशन के रूप में देखा जाने लगा है? |
18 |
67 |
15 |
|
7. |
क्या इससे आत्मविश्वास बढ़ता है? |
78 |
14 |
8 |
|
8. |
क्या निर्माताओं को सामाजिक प्रभाव के प्रति संवेदनशील होना चाहिए? |
56.8 |
30.7 |
12.5 |
|
9. |
क्या OTT पर सेंसरशिप होनी चाहिए? |
84 |
14 |
2 |
|
10. |
क्या आप परिवार के साथ ऐसी सामग्री देखने में सहज हैं? |
59.3 |
38.7 |
2 |
स्रोत: लेखकों द्वारा
संकलित
नमूना सर्वेक्षण के विश्लेषण से यह स्पष्ट
होता है कि सभी
आयु वर्गों
में OTT (नमूने के लगभग 98 प्रतिशत) को मनोरंजन उद्योग
का भविष्य
माना जा रहा है।
चूँकि अधिकांश
उत्तरदाताओं का यह मत है कि सामग्री का “यथार्थवादी” होना
तथा वैधानिक
चेतावनी (statutory warning) देना आयु
के आधार
पर दर्शकों
को नियंत्रित करने
के लिए
न तो बाध्यकारी है और न ही प्रभावी,
इसलिए OTT प्लेटफॉर्म जीवन-शैली, व्यवहार,
सामाजिक आचरण
तथा पारस्परिक संबंधों
को प्रभावित करने
में महत्वपूर्ण भूमिका
निभा रहे
हैं।
सर्वेक्षण में
अधिकांश उत्तरदाताओं (86 प्रतिशत) ने यह स्वीकार
किया कि OTT प्लेटफॉर्मों पर प्रयुक्त भाषा
स्त्री-विरोधी
(misogynistic) है। आश्चर्यजनक रूप
से, केवल
46 प्रतिशत उत्तरदाता ही महिलाओं के प्रति ऐसी
भाषा के प्रयोग की निंदा करते
हैं, जबकि
78 प्रतिशत उत्तरदाता गाली-गलौज को एक प्रकार
का फैशन
मानते हैं।
लगभग आधे
उत्तरदाताओं ने यह भी स्वीकार किया
कि इस प्रकार की भाषा के प्रयोग से उन्हें सशक्तिकरण और आत्मविश्वास का अनुभव होता
है।
इसके साथ
ही, 67 प्रतिशत उत्तरदाता अपने
परिवार के सदस्यों—जैसे
माता-पिता
और भाई-बहनों—के साथ ऐसी
सामग्री देखने
में संकोच
महसूस करते
हैं। वहीं
84 प्रतिशत उत्तरदाता इस बात से सहमत हैं
कि सामग्री
निर्माताओं को निम्नस्तरीय भाषा
के प्रयोग
के सामाजिक
प्रभाव के प्रति संवेदनशील होना
चाहिए। इसके
अतिरिक्त, नमूने
के आधे
से अधिक
उत्तरदाता (लगभग
60 प्रतिशत) OTT प्लेटफॉर्मों के लिए सेंसरशिप या नियामक व्यवस्था के पक्ष में
हैं।
5. निष्कर्ष
OTT प्लेटफॉर्म वैश्विक
स्तर पर मनोरंजन पारिस्थितिकी तंत्र
में एक प्रमुख शक्ति
के रूप
में उभरने
के लिए
तैयार हैं।
इसकी मांग
का रुझान
अत्यंत आशाजनक
है, जिसे
विविध प्रकार
की सामग्री,
आसान उपलब्धता, यथार्थवादी और प्रासंगिक प्रस्तुति, अपेक्षाकृत कम लागत तथा
सभी आयु
वर्गों और विधाओं के अनुरूप सामग्री
जैसे प्रमुख
कारक आगे
बढ़ा रहे
हैं। इसकी
बढ़ती लोकप्रियता और व्यापक उपस्थिति को देखते हुए
यह मनोरंजन
उपभोग का एक अनिवार्य हिस्सा
बन चुका
है।
हालाँकि, इन प्लेटफॉर्मों पर प्रयुक्त अपमानजनक या अश्लील भाषा
कई सामाजिक
चिंताएँ उत्पन्न
करती है।
इसलिए यह आवश्यक है कि सामग्री
निर्माता केवल
लोकप्रियता और आर्थिक लाभ
से परे
जाकर नैतिक
दृष्टि से भी विचार
करें और केवल यथार्थवादी (Realistic)
ही नहीं
बल्कि जिम्मेदार (Responsible)
सामग्री का प्रसारण करें
(Kaur and Kaur, 2026; Kaur, 2024)।
एक स्वस्थ
और प्रगतिशील सामाजिक
वातावरण वही
होता है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति
स्वयं को सम्मानित, सुरक्षित और मूल्यवान महसूस
करता है।
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https://www.dailypioneer.com/2024/columnists/how-justified-is-abusive-language-on-ott-.html - Kaur, K. एवं Kaur, H. (2026). “OTT को जिम्मेदारी के साथ यथार्थवादी होना चाहिए: अपमानजनक भाषा का सामाजिक प्रभाव।” International Journal for
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