चलो ऐसी जगह ढूँढते हैं,
खुद से तो हम बहुत मिल लिए।
अब अपनों से जुदा लोग खोजते हैं,
सफ़र में कुछ अनजानी राहें चुनते हैं।
रात के सन्नाटो में, दिन के उजाले में,
कुछ अलग तलाशते हैं।
उनकी चाहतों को करीब से जानें,
अपनी आँखों में उनका दृष्टिकोण बसाएँ।
क्या कसक होगी, क्या पीड़ा होगी?
क्या उन्हें भी, हम जैसों की प्रतीक्षा होगी?
शायद उनके पास भी जीने के नए सबक हों,
अनकहे किस्से और अनसुनी कहानियाँ हों।
एक कोरा कागज हो,
और बार-बार कोशिश करने की इच्छा हो।
चलो ऐसी जगह ढूँढते हैं,
जहाँ अपनी चर्चा और नुमाइश न हो।
अंदाज़ जिनके हमसे जुदा हों,
जिनके ख़वाब हमारी परिधि से ऊँचे हों।
इसी ज़मीन पर उनकी भी बस्तियाँ हों,
जो सादगी में भी मुकम्मल और खुश हों।
जो हमारे वजूद के दूसरे पहलू हों,
जो एक ही दर्पण के अलग-अलग अक्स हों।
एक ऐसी कहानी जो हमारी चेतना को जगाए,
और उम्मीदों का फिर एक नया सवेरा लाए।


0 Comments