मंजिल की राह पर चलकर मैं हर हुनर सीख जाऊंगी,
इन ऊंचे पंखों की उड़ान को, और भी ऊंचा ले जाऊंगी।
मैं गिरने से नहीं डरती, हौसलों की मशाल जलाती हूँ,
डर की दहलीज लांघ कर, मैं अंधेरे से रोशनी में आती हूँ।
मैं अपनी मंजिल, अपना रास्ता, अब खुद ही बनाती हूँ,
सपनों को अपने, इंद्रधनुष के सातों रंगों से सजाती हूँ।
उन कड़वी ठोकरों से संभलकर, मैं बाहर निकल आई हूँ,
देर भले हुई मगर, पहचान की लौ जगा पाई हूँ।
यही मेरी मंजिल का पता, और यही मेरा वास्ता था,
किस्मत के भरोसे नहीं, मेरा मेहनत से ही रास्ता था।
माना राह कठिन थी, और सफर भी थोड़ा मुश्किल था,
पर हार मान ले जो आसानी से, ऐसा न मेरा दिल था।
मैने 'था' से 'है' तक की, वो लंबी दूरी मिटायी है,
अपने ही दम पर चलकर, मैंने आज ये फतह पायी है।

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