“आपका बंटी” का मनोवैज्ञानिक अध्ययन एवं मूल्यांकन
गरिमा सिंह (शोधछात्रा, सिद्धार्थ विश्वविद्यालय, कपिलवस्तु सिद्धार्थनगर)- garima.mantu786@gmail.com
डॉ० परीक्षित सिंह (सहायक आचार्य, हिन्दी विभाग, ए०पी०एन०पी०जी०, बस्ती उ०प्र०)
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परिचय -
स्वातन्त्रोतर लेखिकाओं में मन्नू भंडारी
ने हिंदी कथा साहित्य जगत में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। उन्होंने अनेक कहानियों और
उपन्यासों की रचना की है और इनमें अपनी कथाओं के माध्यम से उन्होंने जीवन के
सारगर्भ को अभिव्यक्त किया है। जहां एक और पति-पत्नी के बीच के द्वंद और तनाव बच्चों
के लिए संत्रास, पीड़ा और अभाव का कारण बन जाता है।
बच्चों की चेतना में बड़ों के इस संसार को मन्नू भंडारी ने पहली बार पहचाना था। हम
कभी-कभी भूलवश यह सोच बैठते है कि बड़ों के बीच जो घटित होता है, उसका बच्चों पर असर नहीं होता है, लेकिन बच्चों पर इसका
गहरा असर पड़ता है, जो जीवन भर उनके दिलों-दिमाग पर रहता है।
बाल-मनोविज्ञान पर आधारित यह उपन्यास भविष्य में आने वाली अत्यन्त गम्भीर समस्याओं
की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करता है, जिसके लिए हमें आज से ही
सजग होना होगा।
मुख्य शब्द
दुःस्वप्न – कष्टदायक, त्रासदी – दुखद
स्थिति, अंडरस्टैंडिंग – समझदारी,
बाध्यता – विवश होना, अवसाद – उदासी या निराशा
सारांश – ‘आपका बंटी’ उपन्यास बाल-मनोविज्ञान पर आधारित बहुचर्चित
और कालजयी उपन्यास है। अब प्रश्न उठता है कि बाल-मनोविज्ञान है क्या?
महेश्वरी प्रसाद सिन्हा
के अनुसार
‘’बाल-मनोविज्ञान
मनोविज्ञान की वह शाखा है जो बच्चों की शारीरिक एवं मानसिक क्रियाओं का वैज्ञानिक
अध्ययन गर्भाधान से लेकर परिपक्वता तक विकासात्मक दृष्टिकोण से करता है।
बाल-मनोविज्ञान केवल सामान्य बच्चों का ही अध्ययन नहीं करता अपितु असामान्य बच्चों
के असंतुलित व्यवहार का भी अध्ययन करता है। बाल-मनोविज्ञान के द्वारा ही हम यह जान
सकते हैं कि बच्चों के व्यक्तित्व का विकास, सामाजिक विकास संवेगात्मक विकास इत्यादि समुचित ढंग से कैसे हो सकता है।“
यह उपन्यास हिंदी साहित्य की एक
मूल्यवान उपलब्धि के रूप में देखा जाता है। इस उपन्यास की खासियत है कि इसमें एक
बच्चे की निगाहों से घायल होती संवेदना का मनोवैज्ञानिक चित्रण किया गया है।
जिसमें मध्यवर्गीय परिवार में पति-पत्नी के संबंध विच्छेद की स्थिति एक बच्चे की
दुनिया का वह दु:स्वप्न बन जाती है। कहना मुश्किल है कि यह कहानी बालक बंटी की है
या माँ शकुन की। सभी एक-दूसरे से ऐसे उलझे हैं कि त्रासदी सभी की यातना बन जाती
है। बाल-मनोवैज्ञानिक की विभिन्न धारणाओं से ग्रसित बंटी की मनोदशा का पता इस उपन्यास
से चलता है। बंटी अपनी सारी प्रतिक्रियाएं इन्हीं धारणाओं से व्यक्त करता है
जैसे-तनाव, मनोग्रस्तता, बाध्यता क्रोध एवं आक्रामक्ता, कुंण, दुविधा, अकेलापन, अवसार्द।
बंटी उपन्यास का केंद्रीय पात्र है। उपन्यास की कथावस्तु बंटी के इर्द-गिर्द ही
घूमती रहती है। इसमें यह दर्शाया गया है कि बड़ों की दुनिया को एक बच्चे की दृष्टि
से देखना कैसा होता है।
शोध प्रविधि
यह
शोध कार्य वर्णात्मक और विश्लेषणात्मक शोध प्रविधि के माध्यम से किया गया है |
शोध
अंतराल
इस
शोध कार्य के माध्यम से आने वाले समय में कोई नया बँटी ना पैदा हो इसको ध्यान में
रखकर इस शोध कार्य नवीन व मौलिक बनाया गया है |
अध्ययन का महत्व व समाज के लिए उपयोगी
आपका बंटी' उपन्यास वर्तमान समय में भी प्रासंगिक
मन्नू भंडारी ने यह उपन्यास वर्षों
पूर्व लिखा था लेकिन आज के वर्तमान समय में भी प्रासंगिक है। चाहे वह स्त्री
विमर्श हो या बाल मनोविज्ञान। इस उपन्यास में वर्णित अकेलापन एक मात्र बंटी का नही
है, ऐसे हजारों बंटी हमारे आस-पास ही हैं। ऐसे बंटी जो
माता-पिता होने के बावजूद अनाथ की भांति जीवन-यापन करता है।
मन्नू भंडारी का ¢आपका
बंटी’ उपन्यास मनोवैज्ञानिक धरातल पर लिखा गया एक सामाजिक उपन्यास है। इसमें स्थल
स्थल पर मनोवैज्ञानिकता झलकती है। मन्नू जी ने पात्रों के भीतर की मन: स्थिति का
अत्यंत सुक्ष्मता से विश्लेषण किया है। मुख्य पात्र शकुन बंटी और डॉक्टर जोशी को लेकर
लेखिका ने सजीव मनोविश्लेषण प्रस्तुत किया है
अहं की प्रवृत्ति ही मनुष्य की जन्मजात प्रवृत्ति है। अहं भाव अपने आप
में तब तक बुराई की श्रेणी में नहीं आता जब तक कि वह स्वाभिमान के स्तर तक रहता है, किंतु जैसे ही वह अहंकार की श्रेणी में आता है वैसे ही वह बुराई की श्रेणी
में परिवर्तित हो जाता है। शकुन का अहं भाव उसके जीवन के लिए अभिशाप सिद्ध होता है|
लंबे सात वर्षों तक एक टूटा जीवन जीती रहती है।
जैसे- "शुरू के दिनों
में एक गलत निर्णय लेने का एहसास दोनों के मन में बहुत साफ होकर उभर आया था। जिस
पर हर दिन और हर घटना ने केवल सान ही चढ़ाई थी। समझावे का प्रयत्न भी दोनों में एक
अंडरस्टैंडिंग पैदा करने की इच्छा से नहीं होता था वरन एक दूसरे को पराजित करके
अपने अनुकूल बना लेने की आकांक्षा से। तर्कों और बहसों में दिन बीतते थे और ठंडी
लाशों की तरह लेटे- लेटे दूसरे को दु:खी,
बेचैन और छटपटाते हुए देखने की आकांक्षा में रहते।
भीतर ही भीतर चलने वाली एक अजीब ही
लड़ाई थी वह भी जिसमें दम साधकर दोनों ने हर दिन प्रतीक्षा की थी कि कब सामने वाले
की सांस उखड़ जाती है और वह घुटने टेक देता है, जिससे कि फिर वह बड़ी उदारता और क्षमाशीलता के साथ उसके सारे गुनाह माफ कर
उसे स्वीकार कर ले, उसके संपूर्ण व्यक्तित्व को निरे एक
शून्य में बदलकर, और इस स्थिति को लाने के लिए सभी तरह के
दावं - पेंच खेले गए थे कभी कोमलता के साथ कभी कठोरता के साथ, कभी सब कुछ लुटा देने वाली उदारता के साथ, तो कभी सब
कुछ समेट लेने की कृपाणता के साथ
प्रेम के नाटक भी हुए थे और तन मन को डुबो देने वाले विभारे क्षणों के अभिनय
भी। पता नही उन क्षणों मे कभी भावुक्ता, आवेश या उत्तेजना रही भी हो, पर शायद उन दोनों के ही
दयालु मन में कभी उन्हें उस रूप में ग्रहण ही नही किया। दोनों ही दूसरे की हर बात,
हर व्यवहार को एक नया दांव समझते थे और इस मजबूरी ने दोनों के बीच
की दूरी को इतना बढ़ाया कि बंटी भी उस खाई को पाटने के लिए सेतु नहीं बन
सका।"
निष्कर्ष -
इन सभी विशेषताओं को देखते हुए यह कहा
जा सकता है कि ' आपका बंटी’ आज के वर्तमान समय
में प्रासंगिक उपन्यास है तथा आने वाली भविष्य के लिए यह कामना की जा सकती है कि
इस उपन्यास से शिक्षा लेकर पाठक वर्ग की धारणा में परिवर्तन हो और समाज या राष्ट्र
में कोई नया बंटी जन्म न ले। लेखिका ने 'अपना बंटी, लिखते समय उसकी जन्म पत्री बंटी नाम की भूमिका में यही इच्छा प्रकट की है।
"बहरहाल, बंटी की यह यात्रा चाहे परिवार की संश्लिष्ट इकाई से टूटकर क्रमशः अकेले,
जड़हीन, फालतू और अनचाहे होते जाने की रही हो;
लेकिन मेरे लिए यह यात्रा भावुकता, करुणा से
गुज़रकर मानसिक यंत्रणा और सामाजिक प्रश्नाकुलता की रही है। जीते-जागते बंटी का
तिल-तिल करके समाज की एक बेनाम इकाई-भर बनते चले जाना यदि पाठक को सिर्फ
अश्रुविगलित ही करता है तो मैं समझूंगी कि यह पत्र सही पतों पर नहीं पहुँचा
है।“
-मन्नू भंडारी
संदर्भ ग्रंथ
इंटरनेट
स्त्रोत
डॉ० शर्मा
सुनीता -आपका बंटी और बाल मनोविज्ञान
डॉ० वर्मा
सीमा -आपका बंटी उपन्यास में मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण फ्रायड एडलर युंग के सिद्धांतो के आधार पर
अवचेतन के माध्यम से चेतन की परख
आधार ग्रंथ
डॉ०
तिवारी रामचंद्र - हिंदी का गद्य साहित्य
सहायक ग्रंथ-
भण्डारी
मन्नू - आपका बंटी,नई दिल्ली,राधा कृष्ण प्रकाशन प्र०ली०
