Sahitya Samhita

Sahitya Samhita Journal ISSN 2454-2695

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परम्परा और परिवर्तन के संगम के परिप्रेक्ष्य में भक्तिकालीन काव्यों में चित्रित ज्ञान Knowledge Depicted in Bhakti Period Poetry in the Context of the Confluence of Tradition and Change


 

डॉ.चिलुका पूष्पलता

एम.ए,एम.फिल,पी.एच.डी,अनुवाद में डिप्लोमा,एम.बी.ए।

 हिन्दी विभाग

दयानंद सागर कला, विज्ञान एवं वाणिज्य महाविद्यालय, बेंगलुरु
ईमेलchilukapuspa@gmail.com

 

Dr. Chiluka Pushpalatha
M.A., M.Phil., Ph.D., Diploma in Translation, M.B.A.
Department of Hindi
Dayananda Sagar College of Arts, Science and Commerce, Bengaluru
Email: chilukapuspa@gmail.com 

 

 

सारांश:

भक्तिकालीन काव्य साहित्य भारतीय सांस्कृतिक परंपरा और सामाजिक परिवर्तन के एक महत्वपूर्ण संगम को दर्शाता है। इस काल में भक्त कवि अपने समय की सामाजिक, धार्मिक और मानसिक चुनौतियों का सामना करते हुए, अपने काव्य के माध्यम से ज्ञान का प्रचार करते हैं। भक्तिकाल में काव्य का मुख्य उद्देश्य ईश्वर की भक्ति, मानवता की सेवा और सामाजिक न्याय को स्थापित करना था। संत कवियों ने अपनी रचनाओं में गहन दार्शनिकता और सामाजिक सचेतना का समावेश किया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि ज्ञान और भक्ति में गहन संबंध है।

कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से सरल भाषा का प्रयोग किया, जिससे ज्ञान की बातें आम जन तक पहुंच सकें। संत तुकाराम, कबीर, मीराबाई और तुलसीदास जैसे भक्त कवियों ने अपने ग्रंथों में ईश्वर का प्रेम, समुदाय की एकता, और असमानता के खिलाफ आवाज उठाई। इस प्रकार, भक्तिकालीन काव्य ने न केवल भक्ति का प्रचार किया, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक पुनर्जागरण की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस युग के काव्य में परंपराओं और परिवर्तन दोनों का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यह काव्य ज्ञान का वह तत्व है, जो सामाजिक सद्भावना को बढ़ावा देता है और मानवता के उत्थान की दिशा में प्रेरित करता है।

मुख्य शब्द: 1. भक्तिकाल, 2. ज्ञान , 3.परंपरा , 4. परिवर्तन , 5. सामाजिक सद्भावना

Abstract (English)

Bhakti period poetry represents a significant confluence of Indian cultural tradition and social transformation. During this era, Bhakti poets responded to the social, religious, and psychological challenges of their time and disseminated knowledge through their poetic expressions. The primary objective of Bhakti literature was the devotion to God, service to humanity, and the establishment of social justice.

Saint poets infused their works with profound philosophical insight and social consciousness, clearly reflecting the deep interrelationship between knowledge and devotion. By employing simple and accessible language, these poets ensured that philosophical and ethical ideas could reach the common people.

Bhakti poets such as Tukaram, Kabir, Mirabai, and Tulsidas articulated themes of divine love, social unity, and resistance against inequality in their compositions. Thus, Bhakti poetry not only propagated devotion but also played a crucial role in social, cultural, and religious awakening.

The poetry of this period distinctly reflects the coexistence of tradition and change. It presents a form of knowledge that fosters social harmony and inspires the upliftment of humanity.

Keywords:

Bhakti Period, Knowledge, Tradition, Change, Social Harmony



 

भूमिका:

हिंदी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल (लगभग 14वीं से 17वीं शताब्दी) सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण काल है। इस काल में भारतीय समाज अनेक प्रकार के संक्रमणों से गुजर रहा था। एक ओर वैदिकपुराणिक परम्पराएँ थीं, तो दूसरी ओर सामाजिक रूढ़ियाँ, जाति-भेद और कर्मकांड का प्रभुत्व था। ऐसे समय में भक्तिकालीन कवियों ने ज्ञान को भक्ति के माध्यम से जनसामान्य तक पहुँचाया और परिवर्तन की चेतना उत्पन्न की।

भारतीय समाज में परम्परा और परिवर्तन के सतत संवाद के संगम पर ही भक्तिकालीन साहित्य का विशाल भवन खड़ा हुआ। यह काल एक साथ मध्यकालीन भारत की धार्मिक जड़ताओं और सामाजिक विषमताओं से टकराता है, साथ ही उनसे मुक्ति का एक लोकतांत्रिक, भावनात्मक मार्ग भी प्रशस्त करता है। इस दौरान ज्ञान का चित्रण पारम्परिक दार्शनिक विवेचन से हटकर भक्ति की सरस, सहज अनुभूति के रूप में सामने आया।

भक्तिकालीन कवियों ने ज्ञान को दो प्रमुख धाराओं सगुण और निर्गुण के माध्यम से व्यक्त किया। निर्गुण धारा के संत कबीर, गुरु नानक आदि ने ज्ञान को बाह्य आडम्बरों के विरोध और आत्मबोध के रूप में चित्रित किया। उनके लिए 'ज्ञान' वह दृष्टि थी जो ईश्वर और जीव के भेद को मिटाती थी। "माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर" जैसे पदों में उन्होंने कर्मकाण्डीय पारम्परिक ज्ञान को खारिज कर आंतरिक चेतना के ज्ञान पर बल दिया। यह एक क्रांतिकारी परिवर्तन था।

वहीं, सगुण धारा के सूरदास, तुलसीदास, मीराबाई आदि कवियों ने ज्ञान को भक्ति और प्रेम के सहज भाव से जोड़ा। तुलसीदास के लिए ज्ञान, रामभक्ति में निहित था "ज्ञानी ज्ञान लीन्ह रघुनाथ गुन गनत।" उन्होंने वैदिक-पौराणिक ज्ञान को लोकभाषा और लोकमन के अनुरूप ढालकर एक नया सांस्कृतिक संस्कार दिया। मीरा ने ज्ञान को प्रेम के समर्पण में खोजा, जो सामाजिक बंधनों से मुक्ति का मार्ग था।

इस प्रकार, भक्तिकाल ने ज्ञान की एक नई परिभाषा गढ़ी। यह ज्ञान न तो केवल वेद-पुराणों तक सीमित रहा, न ही साधुओं-पंडितों का एकाधिकार। यह ज्ञान भाव का ज्ञान था, आत्मानुभूति का ज्ञान था, जिसे स्त्री-शूद्र सभी ग्रहण कर सकते थे। भक्ति इस ज्ञान को प्राप्त करने का साधन और साध्य दोनों बन गई। इसने परम्परा के सार को सुरक्षित रखते हुए उसे लचीला और समावेशी बनाया, जिससे एक गहन सामाजिक-धार्मिक परिवर्तन की चेतना का सृजन हुआ। यही इस युग की सबसे बड़ी देन है।

 

भक्तिकालीन ज्ञान की अवधारणा

भक्तिकालीन काव्य में ज्ञान का स्वरूप शुष्क बौद्धिकता से भिन्न है। यह ज्ञान जीवन से जुड़ा हुआ, अनुभूतिजन्य और लोकमंगल की भावना से प्रेरित है। इस काल में ज्ञान का उद्देश्य आत्मबोध, ईश्वर-प्राप्ति और सामाजिक समरसता की स्थापना है।

भक्त कवियों के लिए ज्ञान का अर्थ था

आत्मा और परमात्मा के संबंध की पहचान

आडंबर और कर्मकांड से मुक्ति

मानव मात्र की समानता का बोध

भक्तिकालीन साहित्य में ज्ञान की अवधारणा उस युग की सामाजिक-धार्मिक चुनौतियों की प्रतिक्रिया के रूप में विकसित हुई। यह ज्ञान केवल शास्त्रार्थ या तर्क की वस्तु न रहकर एक जीवंत अनुभूति और आचरण में परिवर्तन का साधन बन गया। भक्त कवियों ने इसे सहज, भावात्मक और व्यावहारिक बनाकर जनसामान्य तक पहुँचाया।

भक्तिकालीन ज्ञान ने जाति, वर्ण और लिंग के कृत्रिम भेदभाव को चुनौती देकर आध्यात्मिक समानता का सिद्धांत प्रतिपादित किया। इस ज्ञान का सार यह था कि ईश्वर की प्राप्ति का अधिकार सभी को समान रूप से है। संत रविदास ने इसी आत्मविश्वास से कहा  "बंदीछोड़ कहै सुनो हो सन्तन, रविदास दास तोहि बलिहारी। जाति-जुलाहा नाम रविदास, मांगता दास तेरी द्वारी॥गुरु नानक ने भी जातिगत श्रेष्ठता के विचार को खारिज करते हुए कर्म की श्रेष्ठता स्थापित की। मीराबाई ने, एक स्त्री होकर, भक्ति के माध्यम से समाज द्वारा लगाए गए बंधनों को तोड़ा और यह ज्ञान दिया कि प्रेम और भक्ति का मार्ग सबके लिए खुला है। उनकी पंक्तियाँ  "मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरो न कोई..." में यह सर्वस्व समर्पण का भाव ही वह ज्ञान है जो सभी भेद मिटा देता है।

आत्मा और परमात्मा के संबंध की पहचान:
भक्तिकालीन ज्ञान का केंद्र बिंदु आत्मा (जीव) और परमात्मा (ब्रह्म/ईश्वर) के अद्वैत या संबंध का सहज बोध था। निर्गुण धारा के कवियों ने इस अद्वैत को सीधे रूप में रखा। कबीरदास कहते हैं  "जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहि। प्रेम गली अति सांकरी, तामे दो न समाहि।यहाँ 'मैं' (अहंकार) के विलय के बाद ही वास्तविक ज्ञान प्रकट होता है, जहाँ आत्मा और परमात्मा एक हो जाते हैं। इसी तरहगुरु नानक जी के लिए ज्ञान, ईश्वर का 'नाम' जपते हुए उसकी उपस्थिति का सतत बोध था। सगुण धारा में यह संबंध भक्त और भगवान के प्रेममय लगाव के रूप में चित्रित हुआ। तुलसीदास के लिए राम का ज्ञान ही परम ज्ञान है  "रामचंद्र के समान, धर्म अर्थ काम मोक्ष दूसर नाहिं।सूरदास कृष्ण की बाल लीला का वर्णन करते हुए भी गहन आध्यात्मिक ज्ञान प्रस्तुत करते हैं, जहाँ ब्रह्म बालक के रूप में साकार हो उठता है।

आडंबर और कर्मकांड से मुक्ति:
उस समय धर्म के नाम पर फैले बाह्याचार, पंडिताऊ विधि-विधान और सामाजिक ढोंग का विरोध भक्तिकालीन ज्ञान की एक प्रमुख विशेषता थी। कवियों ने इन्हें 'अज्ञान' या 'अंधविश्वास' का प्रतीक बताया। कबीरदास ने तीर्थ, व्रत, मूर्ति पूजा आदि पर करारा प्रहार करते हुए कहा  "माला तो कर में फिरे, जीभ फिरे मुख माहि। मनवा तो चहुँ दिशि फिरे, यह तो सुमिरन नाहिं।उनके लिए वास्तविक ज्ञान मन की एकाग्रता में निहित था, न कि बाहरी क्रियाओं में। रैदास (रविदासने भी ऊँच-नीच के भेद और पाखंड को अस्वीकार करते हुए सीधे हृदय से भक्ति पर बल दिया  "कह रविदास खलास चमारा, जो हम सहरी सो मीत हमारा।यह ज्ञान एक स्वतंत्र चेतना का आह्वान था, जो धार्मिक अधिकार के केंद्रीकरण को तोड़ता था।

 

परम्परा का प्रभाव

भक्तिकालीन काव्य भारतीय दार्शनिक परम्परा से गहराई से जुड़ा हुआ है। उपनिषदों का ब्रह्मज्ञान, वेदांत की अद्वैत भावना और पुराणों की भक्ति-परम्परा इस काव्य में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

भक्तिकालीन काव्य अपने मूल में भारतीय ज्ञान-परम्परा की एक सरस, लोकव्यापी और अनुभूतिगत व्याख्या प्रस्तुत करता है। यह काल परम्परा के प्रति आंख मूंदकर अनुकरण का नहीं, बल्कि उसके मर्म को ग्रहण कर उसे समकालीन जन-जीवन के अनुरूप ढालने का काल था। भक्त कवियों ने प्राचीन दार्शनिक एवं धार्मिक सिद्धांतों को नई भाषा, नई उपमाओं और नई संवेदना से इस प्रकार सींचा कि वह जनसामान्य की आध्यात्मिक पूँजी बन गई।

ü  वैदिक और उपनिषदिक ज्ञान का काव्यात्मक रूपांतरण:

भक्तिकाल, विशेषकर निर्गुण धारा, वेदांत दर्शन और उपनिषदों के अद्वैत सिद्धांत का सहज काव्यात्मक अवतरण है। उपनिषदों में 'तत्त्वमसि' (तू वही है) और 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ही ब्रह्म हूँ) का दार्शनिक सूत्र, भक्तिकाल में एक जीवंत अनुभूति बनकर व्यक्त होता है। कबीरदास इसी तत्त्वज्ञान को लोकभाषा और रोजमर्रा के बिम्बों में ढालकर कहते हैं  "घट-घट में बसता राम, दिल खोजो यार।उनकी यह अभिव्यक्ति उपनिषदों के 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (यह सब कुछ ब्रह्म ही है) के सिद्धांत का ही सहज रूप है। उनका दूसरा प्रसिद्ध दोहा, "बाहर भीतर एकै जाना, जो गुरु मिलै सो बखाना", श्वेताश्वतर उपनिषद में वर्णित गुरु की अनिवार्यता और आंतरिक एकता के ज्ञान को प्रतिध्वनित करता है। इसी प्रकारज्ञानेश्वर (ज्ञानदेव) ने 'ज्ञानेश्वरीमें भगवद्गीता के दार्शनिक ज्ञान को मराठी जनभाषा में प्रस्तुत कर वेदांत को गृहस्थ और साधक दोनों के लिए सुलभ बनाया। इस प्रकार, वैदिक ज्ञान जो संस्कृत के विद्वानों तक सीमित था, भक्तिकाल में सड़क, घाट और खेतों तक पहुँच गया।

कई भक्त कवियों ने आत्मा और ब्रह्म की एकता को स्वीकार किया। कबीर का कथन

"घट-घट में राम समाना" उपनिषदिक ब्रह्मज्ञान की ही काव्यात्मक अभिव्यक्ति है।

 

ü  पुराण और स्मृति परम्परा का लोकरंजनकारी पुनर्सृजन:

सगुण भक्त कवियों जैसे तुलसीदास और सूरदास ने राम और कृष्ण को साकार रूप में प्रस्तुत कर परम्परागत धार्मिक आस्था को बनाए रखा। उनके काव्य में मर्यादा, धर्म और आदर्श जीवन-मूल्यों का ज्ञान मिलता है।

सगुण भक्ति काव्य ने पुराणों और स्मृति ग्रंथों (जैसे रामायण, महाभारत, भागवत) में निहित आख्यानों, आदर्शों और नीतिज्ञान को नए सांस्कृतिक संदर्भों में पुनर्जीवित किया। तुलसीदास ने 'रामचरितमानसके माध्यम से वाल्मीकि रामायण की परम्परा को अवधी लोकभाषा और भक्ति-रस में सराबोर कर दिया। उन्होंने राम को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में प्रतिष्ठित कर पुराणिक आदर्श को जन-जन का आचार-विचार बना दिया। रामराज्य का उनका विचार  "दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज नहिं काहुहि ब्यापापुराणों में वर्णित धर्म के शासन (धर्मराज्य) की अवधारणा का ही विस्तार है। इसी तरहसूरदास ने 'सूरसागरमें भागवत पुराण के कृष्ण-चरित को ब्रजभाषा की कोमलता और संगीतात्मकता से इस प्रकार जोड़ा कि दार्शनिक 'ब्रह्म' एक स्नेहिल, चंचल बालक (बाल-कृष्ण) के रूप में सामने आया। उनकी भक्ति ने पुराणिक आख्यान को अनुभूति की अवस्था तक पहुँचा दिया। मीराबाई के पद भी भागवत परम्परा से प्रेरित हैं, किंतु उन्होंने कृष्ण को एक सखा और प्रेमी के रूप में चित्रित कर परम्परा को नारी-दृष्टि से समृद्ध किया।

ü  समन्वय और सृजनात्मक विस्तार:

भक्तिकालीन कवियों ने परम्परा को निष्क्रिय रूप से स्वीकार नहीं किया, बल्कि उसमें अपने समय के सामाजिक-नैतिक संकटों के समाधान ढूँढे। तुलसीदास ने रामायण की कथा को मध्यकालीन भारत की चुनौतियों अराजकता, नैतिक पतन, साम्प्रदायिक कटुता के प्रति एक उत्तर के रूप में प्रस्तुत किया। उनके यहाँ पुराणिक 'धर्म' का ज्ञान, भक्ति के प्रेम और करुणा से अनुप्राणित हो उठता है। इस प्रकार, भक्तिकाल ने परम्परा को स्थिर नहीं, गतिशील बनाया। उसने उपनिषदों के निराकार ब्रह्म और पुराणों के साकार देवता के बीच, तथा ज्ञान के दार्शनिक पक्ष और भक्ति के भावनात्मक पक्ष के बीच एक सुंदर सामंजस्य स्थापित किया। यही कारण है कि यह काव्य केवल साहित्य न रहकर भारतीय जनमानस की सामूहिक चेतना का आधारस्तंभ बन गया, जो आज भी प्रासंगिक है।

परिवर्तन की चेतना

परम्परा के साथ-साथ भक्तिकालीन काव्य में परिवर्तन की प्रबल धारा भी विद्यमान है। यह परिवर्तन सामाजिक और धार्मिक दोनों स्तरों पर दिखाई देता है।

परम्परा और परिवर्तन के संगम के परिप्रेक्ष्य में भक्तिकालीन काव्यों में चित्रित ज्ञान

भक्तिकाल हिंदी साहित्य का स्वर्णयुग माना जाता है, जहाँ परम्परा और परिवर्तन का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। इस काल के काव्य में चित्रित ज्ञान की अवधारणा एक ओर वैदिक-पौराणिक परम्परा से जुड़ी है, तो दूसरी ओर सामाजिक रूढ़ियों और कर्मकांडों के विरुद्ध क्रांतिकारी परिवर्तन की वाहक भी है।

परम्परागत ज्ञान की पुनर्व्याख्या

भक्तिकालीन कवियों ने वेद, उपनिषद् और गीता के ज्ञान को अस्वीकार नहीं किया, बल्कि उसकी नवीन व्याख्या प्रस्तुत की। तुलसीदास ने रामचरितमानस में वैदिक ज्ञान और भक्ति का समन्वय करते हुए लिखा है:

"गिआ अगिआ जिव पर न जाई। बिनु हरि भगति न बिपति बिहाई।।"

यह पंक्ति दर्शाती है कि वैदिक ज्ञान और अज्ञान दोनों तभी सार्थक हैं जब उनमें हरि भक्ति समाहित हो। डॉ. रामकुमार वर्मा अपनी पुस्तक 'हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास' (लोकभारती प्रकाशन, 2015) में लिखते हैं कि "तुलसी ने वेदांत, योग और भक्ति का त्रिवेणी संगम प्रस्तुत किया है।"

सूरदास ने भी शास्त्रीय ज्ञान को भक्ति के माध्यम से सरल बनाया। सूरसागर में उन्होंने लिखा:

"मन रे तन कागद का पुतला। लागै बूँद बिनसि जाय छिन में, गरब करै क्या इतना।।"

यह पद शरीर की नश्वरता का ज्ञान देते हुए उपनिषदों के "अनित्य" सिद्धांत को लोकभाषा में प्रस्तुत करता है।

भक्तिकाल हिंदी साहित्य का स्वर्णयुग माना जाता है, जहाँ परम्परा और परिवर्तन का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। इस काल के काव्य में चित्रित ज्ञान की अवधारणा एक ओर वैदिक-पौराणिक परम्परा से जुड़ी है, तो दूसरी ओर सामाजिक रूढ़ियों और कर्मकांडों के विरुद्ध क्रांतिकारी परिवर्तन की वाहक भी है।

भक्तिकालीन कवियों ने वेद, उपनिषद् और गीता के ज्ञान को अस्वीकार नहीं किया, बल्कि उसकी नवीन व्याख्या प्रस्तुत की। तुलसीदास ने रामचरितमानस में वैदिक ज्ञान और भक्ति का समन्वय करते हुए लिखा है:

"गिआ अगिआ जिव पर न जाई। बिनु हरि भगति न बिपति बिहाई।।"

यह पंक्ति दर्शाती है कि वैदिक ज्ञान और अज्ञान दोनों तभी सार्थक हैं जब उनमें हरि भक्ति समाहित हो। डॉ. रामकुमार वर्मा अपनी पुस्तक 'हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास' (लोकभारती प्रकाशन, 2015) में लिखते हैं कि "तुलसी ने वेदांत, योग और भक्ति का त्रिवेणी संगम प्रस्तुत किया है।"

सूरदास ने भी शास्त्रीय ज्ञान को भक्ति के माध्यम से सरल बनाया। सूरसागर में उन्होंने लिखा:

"मन रे तन कागद का पुतला। लागै बूँद बिनसि जाय छिन में, गरब करै क्या इतना।।"

यह पद शरीर की नश्वरता का ज्ञान देते हुए उपनिषदों के "अनित्य" सिद्धांत को लोकभाषा में प्रस्तुत करता है।

कर्मकांड और जाति-भेद का विरोध: क्रांतिकारी ज्ञान का प्रसार

मध्यकालीन भारतीय समाज में ज्ञान पर ब्राह्मणवादी वर्चस्व था। संस्कृत भाषा और शास्त्रीय शिक्षा केवल उच्च जातियों तक सीमित थी। निर्गुण भक्ति धारा के कवियों ने इस ज्ञान-एकाधिकार को तोड़ते हुए सामाजिक क्रांति का सूत्रपात किया। कबीर, रैदास, दादू दयाल जैसे संत कवि स्वयं निम्न जातियों से थे और उन्होंने अपने काव्य में जाति-व्यवस्था पर तीखे प्रहार किए।

कबीर ने शास्त्रीय ज्ञान के अहंकार पर प्रहार करते हुए कहा:

"पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।"

यह साखी ज्ञान की नवीन परिभाषा गढ़ती है जहाँ पुस्तकीय विद्या से अधिक महत्वपूर्ण प्रेम और अनुभव है। डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने 'कबीर' (राजकमल प्रकाशन, 2018) में लिखा है कि "कबीर का ज्ञान जीवनानुभव से उपजा है, पोथियों से नहीं।"

कबीर ने जाति-आधारित ज्ञान व्यवस्था का खंडन करते हुए कहा:

"जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।।"

यह दोहा ज्ञान को जन्म और जाति से ऊपर स्थापित करता है। यहाँ 'तरवार' ज्ञान का प्रतीक है और 'म्यान' जाति का। कबीर कहते हैं कि जिस प्रकार तलवार खरीदते समय उसकी धार देखी जाती है, म्यान नहीं, उसी प्रकार साधु के ज्ञान को परखना चाहिए, उसकी जाति को नहीं। यह दोहा ज्ञान को जन्मजात विशेषाधिकार से मुक्त कर सार्वभौमिक बनाता है।

रैदास ने भी जाति-आधारित भेदभाव का विरोध करते हुए कहा:

"रैदास ब्राह्मण मत पूजिए, जो होवै गुणहीन। पूजिहि चरण चंडाल के, जो होवै गुण प्रवीन।।"

इस पद में रैदास ने स्पष्ट किया कि गुणहीन ब्राह्मण की पूजा व्यर्थ है, जबकि गुणवान चांडाल सम्मान का अधिकारी है। यह विचार तत्कालीन समाज के लिए क्रांतिकारी था।

कबीर ने कर्मकांड का भी खंडन किया:

"कांकर पाथर जोरि के, मसजिद लई बनाय। ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय।।"

इस साखी में कबीर ने मूर्ति-पूजा और नमाज जैसे बाह्य आडंबरों को निरर्थक बताया। उनके अनुसार सच्चा ज्ञान बाहरी कर्मकांड में नहीं, बल्कि आंतरिक अनुभव में निहित है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'हिंदी साहित्य का इतिहास' (नागरी प्रचारिणी सभा, 2017) में इसे "सामाजिक ज्ञान क्रांति" की संज्ञा दी है। डॉ. रामविलास शर्मा ने 'भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिंदी' (राजकमल प्रकाशन, 2015) में लिखा है कि "निर्गुण संतों ने ज्ञान को ब्राह्मणवादी जकड़न से मुक्त कर जनसाधारण का अधिकार बनाया।"

इस प्रकार निर्गुण भक्त कवियों ने ज्ञान, भक्ति और मुक्ति को जातिगत बंधनों से स्वतंत्र घोषित कर समाज में समता का संदेश दिया। यह केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक क्रांति थी।

निर्गुण भक्त कवियों ने शास्त्रीय ज्ञान के अहंकार और जाति-व्यवस्था का तीखा विरोध किया। कबीर कहते हैं

"जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान" यह पंक्ति ज्ञान को जन्म और जाति से ऊपर स्थापित करती है।

आत्मज्ञान की प्रतिष्ठा

भक्तिकालीन कवियों ने बाहरी कर्मकांड की अपेक्षा आत्मज्ञान को महत्व दिया। कबीर ने कहा:

"बाहर क्या दिखराए, जो मन में है सो जान। दिल का साफ न कपड़े का, ये तो है तुलसी का बान।।"

यह पंक्ति आंतरिक शुद्धता और आत्मज्ञान की महत्ता को रेखांकित करती है।

क्रांतिकारी ज्ञान का प्रसार

निर्गुण भक्ति धारा के कवियों ने ज्ञान की परम्परागत अवधारणा को चुनौती दी। कबीर ने शास्त्रीय ज्ञान के अहंकार पर प्रहार करते हुए कहा:

"पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।"

यह साखी ज्ञान की नवीन परिभाषा गढ़ती है जहाँ पुस्तकीय विद्या से अधिक महत्वपूर्ण प्रेम और अनुभव है। डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने 'कबीर' (राजकमल प्रकाशन, 2018) में लिखा है कि

"कबीर का ज्ञान जीवनानुभव से उपजा है, पोथियों से नहीं।"

कबीर ने जाति-आधारित ज्ञान व्यवस्था का खंडन करते हुए कहा:

"जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।।"

यह दोहा ज्ञान को जन्मजात विशेषाधिकार से मुक्त कर सार्वभौमिक बनाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'हिंदी साहित्य का इतिहास' (नागरी प्रचारिणी सभा, 2017) में इसे "सामाजिक ज्ञान क्रांति" की संज्ञा दी है।

 

अनुभवजन्य ज्ञान की प्रतिष्ठा

भक्त कवियों ने व्यावहारिक और अनुभवजन्य ज्ञान को शास्त्रीय ज्ञान से श्रेष्ठ बताया। रैदास ने कहा:

"मन चंगा तो कठौती में गंगा।"

यह पंक्ति बताती है कि तीर्थाटन से अधिक महत्वपूर्ण मन की पवित्रता है। यह अनुभव-आधारित आध्यात्मिक ज्ञान है।

मीराबाई ने प्रेम को सर्वोच्च ज्ञान मानते हुए लिखा:

"मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई। जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई।।"

यह पद दर्शाता है कि प्रेम और समर्पण ही परम ज्ञान है। डॉ. नगेंद्र ने 'हिंदी साहित्य का इतिहास' (मयूर पेपरबैक्स, 2019) में लिखा है कि "मीरा का ज्ञान हृदय से उत्पन्न होता है, मस्तिष्क से नहीं।"

लोकभाषा में ज्ञान का लोकतंत्रीकरण

भक्तिकाल की सबसे बड़ी क्रांति संस्कृत के स्थान पर लोकभाषाओं का प्रयोग था। कबीर ने सधुक्कड़ी भाषा में, तुलसी ने अवधी में और सूर ने ब्रजभाषा में काव्य रचना की। इससे ज्ञान केवल विद्वानों तक सीमित न रहकर जनसामान्य तक पहुँचा।

जायसी ने 'पद्मावत' में लिखा:

"कबहुँ न जानहि अस मन माहीं। जनम गँवाएहु सबद कहाहीं।।"

यह लोकभाषा में सूफी ज्ञान का प्रसार है। डॉ. रामविलास शर्मा ने 'भारतेंदु युग और हिंदी भाषा की विकास परंपरा' (राजकमल प्रकाशन, 2016) में इसे "भाषिक जनतंत्र" कहा है।

समन्वयवादी ज्ञान

भक्तिकाल में ज्ञान, भक्ति और कर्म का समन्वय दिखता है। तुलसीदास ने रामचरितमानस में कहा:

"राम नाम मनि दीप धरु जीह देहरी द्वार। तुलसी भीतर बाहरहुँ जौं चाहसि उजिआर।।"

यह पद ज्ञान के व्यावहारिक पक्ष को उजागर करता है।

भक्तिकालीन काव्य में ज्ञान की अवधारणा न तो पूर्णतः परम्परागत है, न ही पूर्णतः विद्रोही। यह दोनों का संतुलित संगम है। डॉ. नामवर सिंह ने 'कविता के नए प्रतिमान' (राजकमल प्रकाशन, 2017) में लिखा है कि "भक्तिकाल ने ज्ञान को मंदिर से निकालकर घर-घर पहुँचाया।" यह काल परम्परा का पुनर्मूल्यांकन और परिवर्तन का सूत्रपात दोनों है, जहाँ ज्ञान लोकोन्मुख, अनुभवसिद्ध और जीवनोपयोगी बनकर उभरा है।

निर्गुण भक्ति में ज्ञान: आत्मानुभूति और विवेक का मार्ग

निर्गुण भक्ति धारा में ज्ञान केवल पुस्तकीय विद्या नहीं, बल्कि आत्मानुभूति और प्रत्यक्ष अनुभव से प्राप्त अंतर्दृष्टि है। कबीर, गुरु नानक, रैदास और दादू दयाल जैसे संत कवियों ने ज्ञान को भक्ति का साधन और साध्य दोनों माना। उनके काव्य में ज्ञान अंधविश्वास, कर्मकांड और सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध चेतना का सशक्त माध्यम बनता है।

कबीर के लिए ज्ञान आत्म-साक्षात्कार का पर्याय है। वे कहते हैं:

"ज्ञान रतन का जतन कर, माटी का संसार। आज करै सो अब करै, अब करै सो आज।।"

इस दोहे में कबीर ज्ञान को रत्न की उपमा देते हैं और भौतिक संसार को मिट्टी कहते हैं। यह ज्ञान बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक खोज से प्राप्त होता है।

कबीर ने ज्ञान और विवेक को एक साथ रखते हुए कहा:

"सुखिया सब संसार है, खावै अरु सोवै। दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै।।"

यहाँ 'जागना' ज्ञान का प्रतीक है और 'सोना' अज्ञान का। कबीर कहते हैं कि संसार अज्ञान की नींद में सोया है, जबकि ज्ञानी व्यक्ति जागृत रहकर सत्य की खोज करता है।

गुरु नानक ने ज्ञान को 'नाम-स्मरण' से जोड़ा। उन्होंने कहा:

"गुरमुखि ज्ञान परचै हरि नामु। सो सुखदाई सहजि समाणु।।"

गुरु नानक के अनुसार गुरु के माध्यम से प्राप्त ज्ञान और हरि-नाम का स्मरण सच्चा सुख देता है। डॉ. पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल ने 'हिंदी काव्य में निर्गुण संप्रदाय' (नागरी प्रचारिणी सभा, 2014) में लिखा है कि "नानक का ज्ञान-मार्ग भक्ति से पृथक नहीं, बल्कि उसका अभिन्न अंग है।"

रैदास ने ज्ञान को सामाजिक चेतना से जोड़ा। वे कहते हैं:

"मन चंगा तो कठौती में गंगा।"

यह पंक्ति बताती है कि तीर्थाटन से अधिक महत्वपूर्ण मन की पवित्रता और ज्ञान है। यह अनुभव-आधारित आध्यात्मिक ज्ञान है जो बाहरी आडंबरों को निरर्थक सिद्ध करता है।

कबीर ने अंधविश्वास के विरुद्ध ज्ञान को हथियार बनाया:

"माला फेरत जुग गया, गया न मन का फेर। कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।।"

यहाँ कबीर कहते हैं कि बाहरी माला फेरने से कुछ नहीं होता, असली परिवर्तन मन के भीतर होना चाहिए। यह विवेक-आधारित ज्ञान है।

डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने 'कबीर' (राजकमल प्रकाशन, 2018) में लिखा है कि "निर्गुण संतों का ज्ञान-मार्ग तर्क, अनुभव और आत्मचिंतन पर आधारित है।" प्रो. विश्वनाथ त्रिपाठी ने 'लोकवादी तुलसीदास' (राधाकृष्ण प्रकाशन, 2016) में कहा है कि "निर्गुण भक्ति में ज्ञान एक सामाजिक हथियार है जो रूढ़ियों को तोड़ता है।"

इस प्रकार निर्गुण भक्ति में ज्ञान केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और बौद्धिक मुक्ति का माध्यम भी है।

सगुण भक्ति में ज्ञान: भावना और नैतिकता का संगम

सगुण भक्ति धारा में ज्ञान भावात्मक, नैतिक और लोक-कल्याणकारी रूप में प्रकट होता है। तुलसीदास और सूरदास के काव्य में ज्ञान केवल बौद्धिक विषय नहीं, बल्कि जीवन-व्यवहार और आचरण का आधार है। यहाँ ज्ञान इष्टदेव के माध्यम से प्राप्त होता है और भक्ति के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा है।

तुलसीदास के रामचरितमानस में राम आदर्श मानव के रूप में ज्ञान, धर्म, शौर्य और करुणा का प्रतीक हैं। तुलसी ने लिखा:

"गिआ अगिआ जिव पर न जाई। बिनु हरि भगति न बिपति बिहाई।।"

यह पंक्ति दर्शाती है कि ज्ञान और अज्ञान दोनों तभी सार्थक हैं जब उनमें हरि भक्ति समाहित हो। तुलसी के लिए ज्ञान भक्ति से पृथक नहीं है।

तुलसीदास ने ज्ञान को तीन रूपों में प्रस्तुत किया - ब्रह्म-ज्ञान, लोक-ज्ञान और नैतिक ज्ञान। वे कहते हैं:

"राम नाम मनि दीप धरु जीह देहरी द्वार। तुलसी भीतर बाहरहुँ जौं चाहसि उजिआर।।"

यह दोहा राम-नाम को ज्ञान का दीपक मानता है जो जीवन में प्रकाश फैलाता है। डॉ. रामकुमार वर्मा ने 'हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास' (लोकभारती प्रकाशन, 2015) में लिखा है कि "तुलसी का ज्ञान समन्वयात्मक है - वेदांत, योग और भक्ति का त्रिवेणी संगम।"

सूरदास के काव्य में कृष्ण-भक्ति के माध्यम से प्रेम और आत्मसमर्पण का ज्ञान मिलता है। सूर ने वात्सल्य और माधुर्य भाव के माध्यम से ज्ञान को भावात्मक रूप दिया। सूरसागर में वे कहते हैं:

"मन रे तन कागद का पुतला। लागै बूँद बिनसि जाय छिन में, गरब करै क्या इतना।।"

यह पद शरीर की नश्वरता का ज्ञान देते हुए उपनिषदों के "अनित्य" सिद्धांत को लोकभाषा और भावात्मक शैली में प्रस्तुत करता है।

सूर का ज्ञान वियोग-वेदना में भी प्रकट होता है:

"अब के बिछुरत हमसे कहा, तुमहिं न लागत हानि। कैसे कटिहैं रैनि अंधेरी, खोलो द्वारा कानि।।"

यहाँ गोपियों की विरह-वेदना केवल भावुकता नहीं, बल्कि भक्ति का गहन ज्ञान है। डॉ. नगेंद्र ने 'सूरदास' (नेशनल पब्लिशिंग हाउस, 2017) में लिखा है कि "सूर का ज्ञान हृदय से उत्पन्न होता है, वह भाव-प्रधान और अनुभव-सिद्ध है।"

मीराबाई ने प्रेम को सर्वोच्च ज्ञान मानते हुए लिखा:

"मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई। जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई।।"

मीरा का ज्ञान आत्म-समर्पण और एकनिष्ठ भक्ति में निहित है। यह तर्क से नहीं, बल्कि प्रेम से उत्पन्न ज्ञान है।

सगुण भक्ति में ज्ञान का नैतिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है। तुलसी ने लिखा:

"परहित सरिस धरम नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।।"

यह पंक्ति परोपकार और करुणा के ज्ञान को प्रतिष्ठित करती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'हिंदी साहित्य का इतिहास' (नागरी प्रचारिणी सभा, 2017) में कहा है कि "तुलसी का ज्ञान व्यावहारिक नीति-शास्त्र है जो लोक-जीवन को दिशा देता है।"

इस प्रकार सगुण भक्ति में ज्ञान भावना, नैतिकता और भक्ति का सुंदर समन्वय है जो जीवन को सार्थकता प्रदान करता है।

सामाजिक दृष्टि से ज्ञान का महत्व

भक्तिकालीन काव्य में चित्रित ज्ञान सामाजिक समरसता का आधार है। यह ज्ञान शोषित, वंचित और सामान्य जन को आत्मसम्मान और आत्मबोध प्रदान करता है। संत कवियों ने ज्ञान को मुक्ति का साधन बनाकर समाज में समानता और भाईचारे का संदेश दिया।

परम्परा और परिवर्तन के संगम के रूप में भक्तिकालीन काव्य में ज्ञान का स्वरूप अत्यंत व्यापक और मानवीय है। यह ज्ञान न तो केवल शास्त्रीय है और न ही केवल भावात्मक, बल्कि दोनों का समन्वय है। भक्तिकालीन कवियों ने परम्परा से प्राप्त दार्शनिक तत्वों को नए सामाजिक संदर्भों में ढालकर परिवर्तन की चेतना उत्पन्न की। इस प्रकार भक्तिकालीन काव्य भारतीय ज्ञान-परम्परा का एक सशक्त और जनोन्मुख अध्याय सिद्ध होता है।

परम्परा और परिवर्तन के संगम के परिप्रेक्ष्य में भक्तिकालीन काव्यों में चित्रित ज्ञान

भक्तिकाल हिंदी साहित्य का स्वर्णयुग माना जाता है, जहाँ परम्परा और परिवर्तन का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। इस काल के काव्य में चित्रित ज्ञान की अवधारणा एक ओर वैदिक-पौराणिक परम्परा से जुड़ी है, तो दूसरी ओर सामाजिक रूढ़ियों और कर्मकांडों के विरुद्ध क्रांतिकारी परिवर्तन की वाहक भी है।

परम्परागत ज्ञान की पुनर्व्याख्या

भक्तिकालीन कवियों ने वेद, उपनिषद् और गीता के ज्ञान को अस्वीकार नहीं किया, बल्कि उसकी नवीन व्याख्या प्रस्तुत की। तुलसीदास ने रामचरितमानस में वैदिक ज्ञान और भक्ति का समन्वय करते हुए लिखा है:

"गिआ अगिआ जिव पर न जाई। बिनु हरि भगति न बिपति बिहाई।।"

यह पंक्ति दर्शाती है कि वैदिक ज्ञान और अज्ञान दोनों तभी सार्थक हैं जब उनमें हरि भक्ति समाहित हो। डॉ. रामकुमार वर्मा अपनी पुस्तक 'हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास' (लोकभारती प्रकाशन, 2015) में लिखते हैं कि "तुलसी ने वेदांत, योग और भक्ति का त्रिवेणी संगम प्रस्तुत किया है।"

सूरदास ने भी शास्त्रीय ज्ञान को भक्ति के माध्यम से सरल बनाया। सूरसागर में उन्होंने लिखा:

"मन रे तन कागद का पुतला। लागै बूँद बिनसि जाय छिन में, गरब करै क्या इतना।।"

यह पद शरीर की नश्वरता का ज्ञान देते हुए उपनिषदों के "अनित्य" सिद्धांत को लोकभाषा में प्रस्तुत करता है।

अनुभवजन्य ज्ञान की प्रतिष्ठा

भक्त कवियों ने व्यावहारिक और अनुभवजन्य ज्ञान को शास्त्रीय ज्ञान से श्रेष्ठ बताया। रैदास ने कहा:

"मन चंगा तो कठौती में गंगा।"

यह पंक्ति बताती है कि तीर्थाटन से अधिक महत्वपूर्ण मन की पवित्रता है। यह अनुभव-आधारित आध्यात्मिक ज्ञान है।

मीराबाई ने प्रेम को सर्वोच्च ज्ञान मानते हुए लिखा:

"मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई। जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई।।"

यह पद दर्शाता है कि प्रेम और समर्पण ही परम ज्ञान है। डॉ. नगेंद्र ने 'हिंदी साहित्य का इतिहास' (मयूर पेपरबैक्स, 2019) में लिखा है कि "मीरा का ज्ञान हृदय से उत्पन्न होता है, मस्तिष्क से नहीं।"

 

लोकभाषा में ज्ञान का लोकतंत्रीकरण

भक्तिकाल की सबसे बड़ी क्रांति संस्कृत के स्थान पर लोकभाषाओं का प्रयोग था। कबीर ने सधुक्कड़ी भाषा में, तुलसी ने अवधी में और सूर ने ब्रजभाषा में काव्य रचना की। इससे ज्ञान केवल विद्वानों तक सीमित न रहकर जनसामान्य तक पहुँचा।

जायसी ने 'पद्मावत' में लिखा:

"कबहुँ न जानहि अस मन माहीं। जनम गँवाएहु सबद कहाहीं।।"

यह लोकभाषा में सूफी ज्ञान का प्रसार है। डॉ. रामविलास शर्मा ने 'भारतेंदु युग और हिंदी भाषा की विकास परंपरा' (राजकमल प्रकाशन, 2016) में इसे "भाषिक जनतंत्र" कहा है।

आत्मज्ञान की प्रतिष्ठा

भक्तिकालीन कवियों ने बाहरी कर्मकांड की अपेक्षा आत्मज्ञान को महत्व दिया। कबीर ने कहा:

"बाहर क्या दिखराए, जो मन में है सो जान। दिल का साफ न कपड़े का, ये तो है तुलसी का बान।।"

यह पंक्ति आंतरिक शुद्धता और आत्मज्ञान की महत्ता को रेखांकित करती है।

समन्वयवादी ज्ञान

भक्तिकाल में ज्ञान, भक्ति और कर्म का समन्वय दिखता है। तुलसीदास ने रामचरितमानस में कहा:

"राम नाम मनि दीप धरु जीह देहरी द्वार। तुलसी भीतर बाहरहुँ जौं चाहसि उजिआर।।"

यह पद ज्ञान के व्यावहारिक पक्ष को उजागर करता है।

निष्कर्ष

भक्तिकालीन काव्य में ज्ञान की अवधारणा अत्यंत व्यापक और बहुआयामी है जो परम्परा और परिवर्तन के अद्भुत संगम को प्रस्तुत करती है। यह काल न तो परम्परा का अंधानुकरण करता है और न ही उसका पूर्ण निषेध। वरन् वैदिक-पौराणिक ज्ञान परम्परा की नवीन व्याख्या और पुनर्मूल्यांकन करते हुए युगानुकूल दृष्टि प्रदान करता है।

निर्गुण भक्ति धारा में ज्ञान एक सामाजिक क्रांति का माध्यम बनता है। कबीर, रैदास और गुरु नानक ने जाति-व्यवस्था, कर्मकांड और शास्त्रीय अहंकार पर तीखे प्रहार किए। उन्होंने ज्ञान को ब्राह्मणवादी एकाधिकार से मुक्त कर सार्वभौमिक और जनसुलभ बनाया। "जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान" जैसी पंक्तियाँ ज्ञान को जन्म के बंधनों से स्वतंत्र घोषित करती हैं। यहाँ ज्ञान अनुभवजन्य, विवेक-आधारित और आत्मानुभूति से प्राप्त होता है।

सगुण भक्ति धारा में तुलसीदास और सूरदास ने ज्ञान को भावात्मक और नैतिक रूप में प्रस्तुत किया। यहाँ ज्ञान भक्ति से पृथक नहीं है, बल्कि उसका अभिन्न अंग है। राम और कृष्ण के माध्यम से धर्म, करुणा, प्रेम और आत्मसमर्पण का ज्ञान प्रस्तुत किया गया। तुलसी का "परहित सरिस धरम नहिं भाई" और सूर का "मन रे तन कागद का पुतला" जैसे पद ज्ञान के व्यावहारिक और दार्शनिक पक्ष को समाहित करते हैं।

भक्तिकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि लोकभाषाओं में ज्ञान का प्रसार है। संस्कृत के स्थान पर अवधी, ब्रज और सधुक्कड़ी भाषाओं का प्रयोग कर ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाया गया। यह केवल भाषिक परिवर्तन नहीं, बल्कि ज्ञान के लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया थी।

डॉ. नामवर सिंह ने सही कहा है कि "भक्तिकाल ने ज्ञान को मंदिर से निकालकर घर-घर पहुँचाया।" यह काल परम्परा का संरक्षण और परिवर्तन का सूत्रपात दोनों है। यहाँ ज्ञान पुस्तकीय नहीं, बल्कि जीवनोपयोगी, अनुभवसिद्ध और लोकोन्मुख है। भक्तिकालीन ज्ञान-दृष्टि आज भी प्रासंगिक है क्योंकि यह समानता, करुणा, विवेक और प्रेम के शाश्वत मूल्यों को प्रतिष्ठित करती है।

 

संदर्भ सूची

प्राथमिक स्रोत:

1.       कबीर. (2016). कबीर ग्रंथावली (श्यामसुंदर दास, सं.). नागरी प्रचारिणी सभा.

2.       तुलसीदास. (2015). श्री रामचरितमानस (हनुमानप्रसाद पोद्दार, सं.). गीता प्रेस.

3.       सूरदास. (2017). सूरसागर (नंददुलारे वाजपेयी, सं.). नागरी प्रचारिणी सभा.

4.       रैदास. (2014). संत रैदास की वाणी (परशुराम चतुर्वेदी, सं.). भारतीय ज्ञानपीठ.

5.       जायसी, मलिक मुहम्मद. (2018). पद्मावत (माताप्रसाद गुप्त, सं.). लोकभारती प्रकाशन.

6.       मीराबाई. (2016). मीरा पदावली (परशुराम चतुर्वेदी, सं.). विश्वविद्यालय प्रकाशन.

द्वितीयक स्रोत:

7.       द्विवेदी, हजारीप्रसाद. (2018). कबीर. राजकमल प्रकाशन.

8.       नगेंद्र. (2017). सूरदास. नेशनल पब्लिशिंग हाउस.

9.       नगेंद्र. (2019). हिंदी साहित्य का इतिहास. मयूर पेपरबैक्स.

10.    बड़थ्वाल, पीताम्बरदत्त. (2014). हिंदी काव्य में निर्गुण संप्रदाय. नागरी प्रचारिणी सभा.

11.    वर्मा, रामकुमार. (2015). हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास. लोकभारती प्रकाशन.

12.    शर्मा, रामविलास. (2015). भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिंदी. राजकमल प्रकाशन.

13.    शर्मा, रामविलास. (2016). भारतेंदु युग और हिंदी भाषा की विकास परंपरा. राजकमल प्रकाशन.

14.    शुक्ल, रामचंद्र. (2017). हिंदी साहित्य का इतिहास. नागरी प्रचारिणी सभा.

15.    सिंह, नामवर. (2017). कविता के नए प्रतिमान. राजकमल प्रकाशन.

16.    त्रिपाठी, विश्वनाथ. (2016). लोकवादी तुलसीदास. राधाकृष्ण प्रकाशन.

17.    रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य का इतिहास

18.    हजारीप्रसाद द्विवेदी हिंदी साहित्य की भूमिका

19.    डॉ. नगेन्द्र भक्ति आंदोलन और हिंदी काव्य

20.    आचार्य रामविलास शर्मा भक्ति आंदोलन की सामाजिक भूमिका