सीमन्तनी उपदेश में व्यवस्था विरोधी स्वर

  • डॉ. राठोड पुंडलिक

Abstract

स्त्री-पुरुष ने इतिहास के राजपथ पर अपनी यात्रा साथ-साथ शुरू की थी, पर शीघ्र ही उनकी नियति भिन्न-भिन्न हो गई । जैसे ही चीजें आसान होने लगीं और घुमंतुओं ने अपनी बस्तियाँ बनाना शुरू किया, स्त्री-पुरुष का स्वाभाविक सन्तुलन गड़बड़ाने लगा । गृहस्थ जीवन छोटी-सी जेल बन गई । लेखिका अपने समय की स्त्रियों को इसी जेलखाने में बंद देखती है । इस जेल को पुरुष ने कालांतर में मंदिर घोषित कर स्त्रियों को इसी में आनंद खोजने की शिक्षा-दीक्षा देने का भरपूर प्रयत्न किया । इसी प्रयत्नशीलता में ऐसी व्यवस्था बना दी गई कि उसके पास अपने बंद जीवन को अधिकतम सहनीय बनाने के आलावा कोई विकल्प नहीं रहा ।

Published
2022-09-11