भक्ति आंदोलन में महापुरुष श्रीमन्त शंकरदेव का योगदान

  • किरण कलिता

Abstract

भक्ति युग साहित्यिक दृष्टि से अकाल और राजनीतिक दृष्टि से चिंता का काल था। विषम राजनीतिक परिस्थितियों का प्रभाव धार्मिक जन-जीवन पर भी पड़ा। भारत की हिंदू जनता धर्म से दूर हटने लगी थी और उसकी धार्मिक भावना दबने लगी थी। उस समय को संक्षेप में कहे तो यह कहा जा सकता है कि भारत की सांस्कृतिक सूर्य का उस समय अस्त हो चुका था और उसी अस्तगामी सूरज को फिर से उदित करने के लिए सन्तों ने साहित्य के जरिए एक आंदोलन शुरू किया जिसके मूल में थे भक्ति-भावना। यह एक ऐसे विशाल एवं व्यापक  धार्मिक आंदोलन का रूप बन गया था जो देश की सभी आंदोलनों से अधिक व्यापक थी। प्रायः सभी के मन में एक क्रांति या विद्रोह की भाव जागृत हुई थी और इसी को ही भक्ति आंदोलन के नाम से जाना जाता है।

Published
2022-05-13