आचार्य हरिभद्रसूरिकृत षड्दर्शनसमुच्चय में ‘ईश्वर’ तत्त्व

  • Palvi Thakur

Abstract

युगों-युगान्तर से धर्म के क्षेत्र में दो विचारधारायें चली आ रही हैं । एक का संबंध मुख्यतः पूजा और यज्ञ से है और दूसरे का आत्मसंयम और आध्यात्मिक उन्नयन से है । प्राचीन प्रागैतिहासिक काल में मनुष्य ‘मेघ’ , ‘वर्षा’, ‘अग्नि’ और इसी तरह के अन्य कल्पित प्राकृतिक देवताओं को अपनी प्रिय से प्रिय वस्तु अर्पित करते थे । लेकिन जैसे-जैसे सभ्यता का विकास हुआ मनुष्य का जीवन अधिक से अधिक सुव्यवस्थित होता गया और उसकी विचारधारा आध्यात्मिक स्वरूप लेकर विकसित हुई । उसका ध्यान जीवन-मरण के कारणों, संन्यास आदि की ओर गया ।

Published
2022-05-13