योग दर्शन में चक्रों की अवधारणा : एक विवेचनात्मक अध्ययन

  • रंजीत सिंह

Abstract

चक्र वे ऊर्जा के केन्द्र हैं, जिसके माध्यम से अंतरिक्ष ब्रह्माण्ड की ऊर्जा मानवीय शरीर में निरन्तर प्रवाहित होती रहती है। व्यावहारिक जीवन को और अधिक कुशलता प्रदान करने में इन चक्रों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। चक्र ऊर्जा के वे केन्द्र हैं जो प्रत्येक मनुष्य के अन्दर विद्यमान होते हैं जिनकी संख्या विभिन्न विद्वानों के अनुसार भिन्न-भिन्न होती है। मुख्यतः अधिकांश विद्वानों द्वारा चक्रों की संख्या सात बताई गई है यथा- मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि,आज्ञा और सहस्त्रार। इन चक्रों का स्वरूप, रंग, स्थिति, गुण, स्वभाव आदि भिन्न-भिन्न होते हैं। परन्तु आवश्यकता मात्र इन चक्रों की साधना की होती है। चक्र जागरण की प्रक्रिया के साथ-साथ ही चेतना का विकास होता है। चेतना का विकास ही सिद्धियों की परिणति में फलित होता है जिनका वर्णन पतंजलि योग दर्शन के तृतीय पाद ’विभूतिपाद’ में किया गया है। योग दर्शन में चक्रों की साधना या चक्र जागरण की यात्रा यम, नियम आदि अष्टांग योग के द्वारा बताई है। धारणा, ध्यान और समाधि के सम्मलित रूप को संयम कहते हैं। जिस स्थान पर संयम किया जाता है अर्थात् जहाँ चेतना को घनीभूत किया जाता है वहाँ सिद्धि का प्रतिफल प्राप्त होता है।

उक्त शोध पत्र पतंजलि योगदर्शन में चक्रों के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए मानवीय चेतना का चक्रों के साथ घनिष्ठ संबंध को स्थापित करने का प्रयास करेगा।

Published
2021-08-30