आज के परिदृश्य में व्यंग्य की स्थिति

  • चेतन चंद्र जोशी

Abstract


संसार में उत्पत्ति और निर्वाण दोनों समान रुप से समय चक्र के अनुसार चलते हैं। दोनों का ही संतुलन सृष्टि के नवनिर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह बात सृष्टि के हर उस वस्तु पर क्रियान्वित होती है जिसने इसमें जन्म लिया है, फिर चाहे वह इंसान हो, जानवर हो या फिर स्वयं प्रकृति सभी को उत्पत्ति और निर्वाण के इस चक्र से गुजरना ही पड़ता है। जो इन सब में अक्षयवट की तरह सदाबहार है वह है हमारा साहित्य और संस्कृति। एक बार जन्मने के बाद ये शाश्वत हो जाती हैं। इन्हीं साहित्यिक विधाओं मे शैली से विधा बनने तक की इस यात्रा में व्यंग्य का सफर काफी रुचिकर रहा है। कालखंड के भाषाई एवं साहित्यिक पड़ावों पर गौर करें तो व्यंग्य का प्रथम प्रयोग आदिकाल के सिद्धकवियों की रचनाओं में देखने को मिलता है। सिद्धकवियों में सर्वाधिक प्रसिद्धि प्राप्त कवि सरहपा के दोहाकोश का ये दोहा देखें जो पंडितों को फटकारते हुए व्यंग्यपूर्ण शैली में कहते हैं-

Published
2021-08-06