प्रसाद जी की 'कामायनी' में रूपक तत्व

  • डॉ. तृप्ता

Abstract

साहित्य शास्त्र में प्रायः रूपक का प्रयोग दो रूपों में होता है- एक तो दृश्य-काव्य के रूप में और एक अलंकार विशेष के रूप में। इन दो अर्थों के अतिरिक्त एक तीसरा भी है जो अंग्रेजी के ‘एलिगिरी’ ;।ससमहवतलद्ध का पर्याय है। इसकी व्याख्या में कहा जाता है कि इसमें द्वयर्थक कथा होती है। कथा में प्रत्यक्ष के साथ-साथ अप्रत्यक्ष गूढ़ार्थ भी ध्वनित होता है। भारतीय साहित्यशास्त्रियों ने कथा रूपक को अन्योक्ति भी कहा है। शुक्ल जी ‘अन्योक्ति’ शब्द के समर्थ प्रयोक्ता हैं। डॉ. नगेन्द्र के शब्दों में-‘‘प्रस्तुत कथा, स्थूल, भौतिक घटनामयी होती है और अप्रस्तुत कथा सूक्ष्म सैद्धांतिक होती है। यह सैद्धांतिक कथा दार्शनिक, नैतिक, राजनीतिक, सामाजिक, वैज्ञानिक आदि किसी भी प्रकार हो सकती है, परन्तु इसका अस्तित्व मूर्त नहीं होता है। वह प्रायः प्रस्तुत कथा का अन्य अर्थ ही होता है जो उसे ध्वनित करता है।’’

Published
2021-06-01