कुण्डलिनी: स्वरुप, जागरण एवं फलश्रुति (साहित्यिक सर्वेक्षण के परिपेक्ष्य में एक विवेचनात्मक अध्ययन)

  • डॉ. अरुण कुमार साव

Abstract

योग विज्ञान भी अन्य शास्त्रों के उक्ति ष्यत्र ब्रह्माण्डे तत्र पिण्डे ष् को पूर्णतया स्वीकारता है। इसके अनुसार जो ब्रह्माण्ड में हैए वही इस पिण्ड अर्थात् मनुष्य देह में भी है। अतः परमचेतना ब्रह्माण्ड की भाँति मनुष्य में भी विद्यमान हैंए उनका निवास स्थान मस्तिष्क का सहस्रार चक्र है और उन्हीं का विमर्श स्वरूप.शक्तितत्त्व मनुष्य में कुण्डलिनी के रूप में विद्यमान है। मनुष्य के स्तर पर यह कुण्डलिनी या शक्ति अपनी अचेतन प्रसुप्तावस्था में अधोमुखी रूप में पड़ी रहती है। इसके जागरण व उत्थान से मानव चेतना परमात्म चेतना में रूपान्तरित हो जाती है।

Published
2020-10-31