मुंशी प्रेमचंद के उपन्यासों में सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक चिंतन

  • जितेन्द्र कुुमार मौर्य

Abstract

प्रेमचन्द जी के सामाजिक उपन्यासों में दलित चेतना संवेदनाएँ, मानवीय कमजोरियां, जीजीविषा, प्रतिकार एवं शेाषण करने की प्रकृति इन सब की चितला हर एवं व्यवस्थाएँ सामाजिक उपन्यासों में देखने को मिलती हैं, प्रेमचन्द के साहित्य के साथ-साथ गाँधी, डाॅ. पी.आ अधेडन, ज्योति राव फूले जैसे प्रयोगवादी विचारों एवे लेखकों के दायित्व ने समाज को चेतन करने का प्रयोग किया। इन सबका लक्ष्य था कि समाज में समानता रूपी विचारधारा हो तथा किसी प्रकार की आपस में मानव-मानव के बीच कोई भी भेदभाव न हो समानता तथा बन्धुत्व को जमीन पर लाने का श्रेय डाॅ. अम्बेडकर को जाता है और मुंशी प्रेमचन्द जैसे महान उपन्यासकार को भी, भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में सदियों से जीवन की स्वाभाविक मुख्यधारा से वंचित लोगों में अपने अतीत की दुर्दशा से सीख लेकर आयी अधिकारों को प्राप्त करने की जिजीविषा स्वाभिमान पूर्वक अपने होने को टटोलने की बौद्धिक प्रक्रिया दलित चेतना है। इस चेतना के माध्यम से उनके अन्दर उनके पूर्वजों की विवशताएँें प्रतिकार स्वरूप कुलाचे मारने लगी हैं।

Published
2020-03-15