‘‘गाँधी जी और सामाजिक न्याय’’

  • अभय कुमार
  • प्रो. अखिलेश्वर प्रसाद दुबे

Abstract

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी बचपन से ही अपनी माँ के सानिध्य व माता तुल्य आया (दाई माँ) के साथ ज्यादा समय गुजारते थे। वे बहुत ही आज्ञाप्रिय, होनहार, ईमानदार तथा तर्कशील, बुद्धि विलक्षण के छात्र भी थे। एक बार बचपन में 10वीं की परीक्षा में इनके गुरु द्वारा बताये गए उत्तर को उन्होंने परीक्षा में नहीं लिखा और उत्तर में ये बताया कि जितना मुझे ज्ञान है, उतना ही मैं लिखूँगा, अंततः वे गुरु द्वारा परीक्षा के दौरान बताये गए उत्तर को अपनी उत्तरपुस्तिका में नहीं लिखे, जो आता था वे लिखे। ये क्रिया अन्य विद्यार्थीयों के साथ एक न्याय की समझ से देखा जा सकता है।

Published
2019-12-18