इन लहजों ने कुछ तो छिपा रक्खा है


इन लहजों ने कुछ तो छिपा रक्खा है
कहीं आँधी कहीं तूफाँ उठा रक्खा है

आँखों के दरीचे में काश्मीर दिखे हैं
हर अँगड़ाई में बहार बिछा रक्खा है

हुश्न का मजाल तो अब समझ में आया
दिल्ली कभी पंजाब जगा रक्खा है

तुम्हारे नाम की जिरह शुरू हुई जैसे ही
दोनों सदनों ने हंगामा मचा रक्खा है

जिस्म कहीं और शुमार होता ही नहीं 
तूने सचमुच खुदा ही दिखा रक्खा है

सलिल सरोज
उपरोक्त सभी रचनाएँ मेरी स्वरचित और मौलिक हैं।

नाम:सलिल सरोज
पता: बी 302, तीसरी मंजिल
सिग्नेचर व्यू अपार्टमेंट्स
मुखर्जी नगर
नई दिल्ली-110009
उम्र:31 वर्ष
शिक्षा: सैनिक स्कूल तिलैया,कोडरमा,झारखण्ड से 10वी और 12वी उतीर्ण। 12वी में स्कूल का बायोलॉजी का सर्वाधिक अंक 95/100
जी डी कॉलेज,बेगूसराय,बिहार से इग्नू से अंग्रेजी में स्नातक एवं केंद्र  टॉपर, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय ,नई दिल्ली से रूसी भाषा में स्नातक और तुर्की भाषा में एक साल का कोर्स और तुर्की जाने का छात्रवृति अर्जित। जीजस एन्ड मेरी कॉलेज,चाणक्यपुरी,नई दिल्ली इग्नोउ से समाजशास्त्र में परास्नातक एवं नेट की परीक्षा पास।
व्यवसाय:कार्यालय महानिदेशक लेखापरीक्षा,वैज्ञानिक विभाग,नई दिल्ली में सीनियर ऑडिटर के पद पर 2014 से कार्यरत।
सामाजिक एवं साहित्यिक सहयोग: बेगूसराय में आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को अंग्रेज़ी की  मुफ्त कोचिंग। मोहल्ले के बच्चों के कहानी,कविता और पेंटिंग को बढ़ावा देने हेतु स्थानीय पत्रिका"कोशिश" का प्रकाशन और सम्पादन किया। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में विदेशी भाषा में स्नातक की परीक्षा के लिए "Splendid World Informatica"  किताब का सह लेखन एवं बच्चों को कोचिंग। बेगूसराय ,बिहार एवं अन्य राज्यों के हिंदी माध्यम के बच्चों के लिए "Remember Complete Dictionary" किताब का अनुवाद। बेगूसराय,बिहार में स्थित अनाथालय में बच्चों को छोटा अनुदान। 
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