कलम

राजेश त्रिपाठी

कलम वो  है  लिख सकती है तकदीर भी।
कलम  वो  है  बन सकती है शमशीर भी।।
कलम  वो है जिसमें लहराता है सुख-सागर।
कलम  चाहे  तो भर दे गागर में ही सागर।।
कलम  चाहे  तो  पल  में  लगा दे जंग भी।
ये जुल्मियों के साथ भी, मजलूमों के संग भी।।
       है छोटी पर यह करती घाव नावक के तीर सी।
      ये लिखती है खुशी, कभी विरहिन की पीर भी।।
कलम के कितने पुजारी इसके चलते हो गये अमर।
इसने कभी संधि लिखी तो इसने ही करवाये समर।।
चाहे तो ये वीराने में गुलशन खिला दे, या दे खिजां।
है ये वो शै कि जिसके इशारे पर दिशा बदले फिजा।।
     यह कभी राजा तो कभी बन जाती फकीर है।
    धार जिसकी कुंद ना हो ये ऐसी शमशीर  है।।
              कलम  वह  है  ज्ञान और विज्ञान का आधार है।
              कलम का  क्या  कहें  यह  चला रही संसार है।।
              कलम  के  दिल में नफरत, भरा इसमें प्यार है।
              कलम की  दुनिया में खिजां, इसमें ही बहार ।।
                   कलम चाहे तो हंसा दे या ला दे आंखों में नीर भी।
                   दे सकती है सुख का संदेशा, गा सकती है पीर भी।।
              कलम  राजा  है,  है  रंक-सी, ये महान है।
              चाहे तो बंटाढार कर दे, ये इतनी बलवान है।।
              इससे  लखपति  पल  में  भिखारी  हो गये।
              किसी के सपने फले, भाग्य कुछ के सो गये।।
                   धरा  को  इसने  दिये थे, तुलसी और कबीर भी।
                   अर्श से फर्श पर ला सकती है, इसकी तहरीर भी।।
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