हाल-ए-दिल उनको सुनाना न आया

हाल-ए-दिल उनको सुनाना न आया 
मोहब्बत निगाहों से बताना न आया 

जब खुद को देखा  मेरी  निगाहों से 
फिर खुद को  ही  छिपाना न आया

हम तेरे तार्रुफ़ से हुए कभी गाफिल 
ऐसा कभी कोई भी ज़माना न आया 

ये खुली ज़ुल्फ़ें और झुकी हुई  नज़रें 
क्यों फिर याद कोई फ़साना न आया 

तेरे मरहमी लबों के सिवा हमें  और  
जहन में कोई ठौर-ठिकाना न आया 

सलिल सरोज 

B 302 तीसरी मंजिल
सिग्नेचर व्यू अपार्टमेंट
मुखर्जी नगर
नई दिल्ली-110009

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