औसत बच्चे आगे चल कर देश की प्रगति में अपना योगदान देते हैं


"बतौर छात्र के और एजुकेशन से जुड़े होने के लगभग 30 वर्षों के अनुभव के आधार पर मैं यक़ीनन कह सकता हूँ कि जीवन की परीक्षाओं में एग्जाम में टॉप करने वाले बच्चों से अधिक क़ामयाब होते हैं औसत परिणाम वाले बच्चे। वो नाकामयाबियों को झेल चुके होते हैं। पक गए होते हैं। यही औसत बच्चे आगे चल कर देश की प्रगति में अपना योगदान देते हैं। अधिकांश टॉपर तो विदेशों में चले जाते हैं या फिर किसी औसत सी जगह औसत सी नौकरी कर रहे होते हैं। अगर कोई स्वतंत्र एजेंसी इस बारे में पिछले बीस वर्षों के मेरिट होल्डर्स  की छान-बीन करेगी तो मेरा दावा ग़लत नहीं निकलेगा।


मैंने कभी नही सुना के अमेरिका में  बोर्ड इग्जाम के रिजल्ट आ रहे हैं या यूके में लड़कीयो ने बाजी मार ली है या आस्ट्रेलिया में 99•5 % आऐ है किसी छात्र के.


मई-जून के महीने में हिन्दुस्तान में मानसून के साथ साथ हर घर में दस्तक देती है एक भय एक उत्तेजना, एक जिज्ञासा ,एक मानसिक विकृती...हर माँ, हर बाप, हर बोर्ड के  इग्जाम मे बैठा बच्चा हर बीतते हुए पल को एक ओबसेसन, एक डिप्रेशन, एक इनसेक्योरीटी में काट रहा होता है ..कि क्या होगा???


मानसून दुनिया में सिर्फ इंडियन उपमहाद्वीप की निशानी है ..पर इनसिक्योरिटी और मानसिक अवसाद का मेरिट लिस्ट वाला ये नया मानसून देश के हर हिस्से में तनाव और अवसाद की बारिश करने में काफ़ी असरदार हो चुका है।


थोड़े से अपवाद छोड़ दें तो अधिकांश माँ-पिता फ़सल की तरह बच्चों को पाल रहे हैं कि कब फ़सल पके और कब उनकी अधूरी रह चुकी इच्छाएँ पूरी हों? कब वे फ़सल काटेगे?


वे या उनके सपने बच्चो की लाइफ को गाइड कर रहे हैं। हमारे पूंजीवादी इनवेस्टर्स को क्या प्रोडक्ट चाहिये, इस हिसाब से शिक्षा और उसके उद्देश्य तय हो रहे हैं..एक परिवार सुख-चैन त्याग, दिन-रात खप के, संघर्षों, घोर परीश्रम में गुज़ार देता है। उस परिवार का अपना अस्तित्व और सुख-चैन और मानवीय भावनाएं इसलिये इन सपनों की भेंट चढ़ जाती है क्योंकि टीसीएस को एक बेहतरीन सॉफ्टवेयर डेवलेपर चाहिये..या मेकेन्से को बेस्ट ब्रेन चाहिये...या किसी गेमिंग कंपनी को बेहतरीन गेम डिजाइननर चाहिये।


हमारी शिक्षा व्यवस्था व उसके आदर्श कहाँ रह गये?


हमारे स्कूल देश के बेस्ट नागरिक नही देश के बेस्ट मज़दूर बनाने में दिन-रात एक कर के जुटे हुए हैं।


और लानत है उन अभिभावकों को जो बच्चों को बच्चा नही एक मेकेनिकल डिवाइस बनाने को प्रतिज्ञाबद्ध हैं। 


प्लीज़। बच्चों को जीने दो। दुनिया ख़त्म नहीं होने जा रही। उन्हें बेस्ट इम्प्लोई नही बेस्ट सीटीजन बनाने में यकीन रखो, दोस्तों।


बचपन की भी ख़ुद से कुछ अपेक्षाएँ होती हैं, अपने निस्वार्थ स्वप्न होते हैं। उनका हमारे लिये कोई अर्थ नहीं पर..बच्चों के लिये वो जन्नत से कम नही ..प्लीज़ उनकी दुनिया मत उजाड़ो ..प्लीज़ उन्हे मनोरोगी मत बनाओ।


क्या है ये? ये एक मानसिक रुग्णता ही तो है ..टॉपर्स की ख़बरें..उन्हे मिठाई खिलाते माँ-बाप की फ़ोटो ..क्या ये एक आम सामान्य स्तर के बच्चों को हीनता की अनुभूती नही देंगे। टॉपर तो दो-चार ही होंगे बाकी देश का बोझ तो 99 % इन्हीं फूल से कोमल सामान्य बच्चों ने ही उठाना है। दूसरों को, जो हो सकता है कि उनसे कई मामलों में कमतर होंगे, इस तरह 'छाते' हुए देखना उनके मन में किस ग्रंथि को बो रहा है उसका अनुमान हमें नहीं है। उनके मन में एक होड़ खड़ी हो रही है। उनकी संवेदना कम होते हुए ख़त्म हो जाएगी। उनकी मुस्कान मत छीनो ..देश से उसकी सृजनात्मक शक्ति मत छीनो।


जैसे मेरे देश के लिये नेपाल के माँ बाप मज़दूर तैयार कर रहे है, वैसे ही तुम अन्य मल्टीनेशनल कंपनीज़ के लिये मजदूर तैयार कर रहे हो।


वे कुछ भी बन जाऐ ..एमएनसी  में सीईओ हो जाएं पर जो बचपन की रिक्तता, होड़ तुमने आरोपित कर दी है वो उन्हें जीवन भर खलेगी और मानवीय विकृतियों के रुप में फलेगी। खलेगी। आपको बेस्ट सीईओ मिलेंगे जिनकी प्राथमिकता उनकी कंपनी होगी। देश और परिवार नहीं।"

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