हृदय -प्राण

नाम -आरती 
पिता - श्री कर्म बीर 
माता -श्रीमती सरोज शर्मा 
शिक्षा - एम० ए०,(NET)
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--------------- हृदय -प्राण ---------------
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विरान हुए आकाश का सूनापन 
तुम -
क्यों धारण किए हो ?
संसार की नीरवता को 
तुम -
क्यों खुद में कैद किए हो ?
क्यों मेरे हृदय के प्राण ? 
                      - क्यों ?
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क्यों तुम वृक्षों के 
पत्तों की तरह 
हवाओं के सहारे बह गए ?
क्यों तुम फूलों की 
ताजगीमहक को छोड़ 
चुपचाप मुरझा गए ?
क्यों तुम अन्तस में 
श्वासों की भाँति 
महज एक ही बार में घुल गए ?
क्यों मेरे हृदय के प्राण ?
                      - क्यों ?
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मैं तुमसे कई - कई बार 
मिलना चाहती थी 
कई - कई बार 
मिटना चाहती थी 
तुम्हारे मौन को 
कभी नहीं पूजा था

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तुम्हारे मौन ने
मेरे भीतर के ज्वार को
शांत कर मुझे 
निर्जीव-सा बना डाला 
रक्त के प्रवाह की 
तेजी को तुमने 
धीमा-और धीमा कर दिया 
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विरान हुए आकाश का सूनापन 
तुम -
क्यों धारण किए हो ? 
संसार की नीरवता को 
तुम -
क्यों खुद में कैद किए हो ?
क्यों मेरे हृदय के प्राण ? 
                      - क्यों ?
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मैंने चाहा था 
कि,
पवन का मदमस्त झोंका बन जाऊँ 
और तुम्हारे रूखे - सुखे चेहरे की 
रोशनी और चमक बन जाऊँ 
तुम्हारे हदय को क्षण-भर के लिए 
उत्साह दे जाऊँ 
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फिर तुम जीवन को कभी 
नीरवता में 
बांध नहीं सकोगे 
जीवन - मूल्य 
उसकी साधना को
उसकी सम्पन्नता को
कम नहीं कर सकोगे 
फिर तुम कभी 
नीरव उदासीन ,जड़ ,
और प्रभावहीन 
नहीं बन सकोगे 

 मेरे हृदय के प्राण 
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