प्रशासनिक व्यवस्था और भ्रष्टाचार: आरटीआई का प्रभाव

* डॉ. कुंजन आचार्य, असिस्टेंट प्रोफेसर, पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर

** देवेंद्र शर्मा, शोधार्थी, पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर
Sharmadev09@gmail.com


प्रस्तावना   (Introduction)

सूचना वह शक्ति है जो शब्दाडंबर नहीं है बल्कि एक गूढ़ सत्य है और यह भी उतना ही सत्य है कि सूचना का अभाव एक गंभीर जिम्मेदारी हो सकती है। हम अपनी जनता को सही सूचना, उपयोगी सूचना दें और फिर हमें दिखाई देगा कि हमारी नीतियों तथा कार्यक्रमों को लागू करने में वे हमारे कितने बड़े सहायक हो जाएंगे। लेकिन जिस सूचना की उन्हें आवश्यकता है, उन्हें विकृत या गलत सूचना के स्त्रोतों पर निर्भर कर दें तो हम पाएंगे कि हमारी सर्वोत्तम योजनाएं किस तरह से असफलता के दलदल में फंसी रह जाएंगी। सूचना हमारी जनता का मूलभूत अधिकार है।
-अटल बिहारी वाजपेयी


देश के महत्वपूर्ण कानूनों में शामिल सूचना का अधिकार लंबे संघर्ष के बाद 12 अक्टूबर 2005 को प्रभावी रूप से लागू हो पाया। करीब 30 साल तक आंदोलनों, अभियानों और मीडिया की सक्रियता से देश के नागरिकों को सूचना का अधिकार हासिल हुआ। इससे पहले तक भारतीय संविधान की धारा 19 (1) () के तहत नागरिकों को अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार तो था लेकिन सूचना के अधिकार के बिना ये अधूरा था।
हालांकि राजनीतिक दलों ने अपने आप को सूचना के अधिकार कानून के दायरे से बाहर रखा और इस अहम कानून के 10 साल बाद भी स्थिति वही है। लेकिन फिर भी देश के नागरिकों को सरकार, सार्वजनिक विभाग और अधिकारियों के कामकाज की पड़ताल का सबसे बड़ा और आसान माध्यम सूचना के अधिकार के रूप में मिल चुका था।
सूचना का अधिकार लागू होने के साथ ही अधिकारियों और राजनेताओं के लिए ढाल का काम कर रहा गोपनीयता कानून निरर्थक हो गया।

सूचना का अधिकार लागू होने के बाद यह उम्मीद मजबूत हुई कि इस अधिकार का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल कर नौकरशाहों, जनप्रतिनिधियों और सरकारी विभागों की अनियमितताओं और घोटालों को लिखित साक्ष्यों के साथ उजागर किया जा सकेगा।

शोध का लक्ष्य
भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में सूचना के अधिकार की भूमिका का अध्ययन कर भविष्य में उम्मीदों और जानकारी हासिल करने में आने वाली परेशानियों का अध्ययन करना है।

सूचना के अधिकार से हुए बड़े खुलासे-

       30 दिसंबर 2009 को इंडिया टुडे में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक नेशनल रिवर कंजर्वेशन प्लान के तहत 3,892 करोड़ रुपए खर्च करने के बावजूद देश की ज्यादातर नदियां खतरनाक रूप से प्रदूषित थीं। दिल्ली में यमुना में प्रदूषण लगातार बढ़ रहा था। दिल्ली में रोजाना 3,470 मिलियन लीटर सीवेज रोजाना पैदा हो रहा था लेकिन शहर की सीवेज ट्रीटमेंट क्षमता सिर्फ 2,325 मिलियन लीटर प्रतिदिन थी।
सरकार की नदी संरक्षण योजनाओं में पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा था लेकिन इसका असर ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर दिख रहा था। पत्रकार श्यामलाल यादव के मुताबिक एक-दो नहीं बल्कि 39 आरटीआई एप्लिकेशन के बाद इससे जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े जुटाना संभव हो सका जिसमें करीब एक साल का वक्त लगा।

       यूपीए सरकार के मंत्रियों और अधिकारियों की विदेश यात्राओं से जुड़े महत्वपूर्ण खुलासे सूचना के अधिकार के जरिए ही संभव हो पाए।
एक फरवरी 2005 से 30 अप्रैल 2008 के दौरान डायरेक्टर और इससे ऊपर रैंक के 1,576 अधिकारियों ने 40 महीने में 24,458 दिन विदेश में बिताए। इन विदेश दौरों पर 56.38 करोड़ रुपए का खर्च आया। इसमें वाणिज्य मंत्रालय के सबसे ज्यादा 101 अधिकारी शामिल थे।
सूचना के अधिकार के तहत इंडिया टुडे के 80 आवेदन, स्पष्टीकरण, अपील और रिमांइडर के बाद ये तथ्य सामने सके। इसका असर ये हुआ कि वित्त मंत्रालय ने एक अक्टूबर 2008 को सर्कुलर जारी करते हुए निर्देश दिए कि आधिकारिक यात्राओं के लिए सरकारी कर्मचारियों द्वारा खरीदे गए टिकट से मिले फ्री माइलेज प्वाइंट्स सिर्फ आधिकारिक यात्राओं के लिए इस्तेमाल किए जाएं ना कि निजी यात्राओं के लिए।
इसी तरह के खुलासे यूपीए सरकार के कई मंत्रियों के मामले में हुए।
इसके बाद प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रियों को पत्र लिखकर विदेश यात्राओं का खर्च घटाने के लिए कहा।

       1964 में प्रस्ताव स्वीकृत हुआ था जिसके तहत सभी मंत्रियों को प्रधानमंत्री कार्यालय को अपनी संपत्तियों और देनदारियों के बारे में घोषणा करनी थी। लेकिन 44 सालों बाद भी प्रधानमंत्री कार्यालय और मंत्रिमंडल सचिवालय इससे अनजान थे। जून 2008 में ये समाचार प्रकाशित हुआ और जून 2009 में सभी मंत्रियों ने अपनी संपत्तियों और देनदारियों की घोषणा की। आरटीआई की वजह से ही ये संभव हो पाया।

ऐसे कई और भी महत्वपूर्ण खुलासे पत्रकारों, एनजीओ और आरटीआई कार्यकर्ताओं की कोशिशों से हो पाए।

       एलआईसी से जुड़ा खुलासा भी इन्हीं में से एक था। इंडिया टुडे की वेबसाइट पर 24 दिसंबर 2008 को इस संबंध में खबर प्रकाशित हुई। आरटीआई के जरिए सामने आया कि 2 करोड़ 9 लाख पॉलिसी प्रीमियम जमा नहीं होने की वजह से स्थाई तौर पर रद्द की जा चुकी थीं। जो प्रीमियम पॉलिसी धारकों ने पहले जमा करवाया था वो एलआईसी की संपत्ति हो गया। ऐसी पॉलिसी की कितनी राशि एलआईसी के पास जमा थी इसके बारे में सूचना नहीं दी गई। लेकिन खबर प्रकाशित होने के 25 दिन में ही ऐसी पॉलिसीज के फिर से चालू करने की स्कीम का विज्ञापन अखबारों में जारी किया।
इस तरह देखा गया कि धीरे ही सही लेकिन सूचना के अधिकार कानून का प्रभावी असर हो रहा है।

       दिल्ली जल बोर्ड के निजीकरण से पीछे हटने का सरकार का फैसला भी सूचना के अधिकार कानून की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक है।
1998 में वर्ल्ड बैंक की मदद से दिल्ली जल बोर्ड के निजीकरण की शुरुआत हो चुकी थी। लेकिन आरटीआई कार्यकर्ताओं ने चार हजार पेजों के दस्तावेजों को ध्यान से पढ़कर पता लगाया कि कैसे वर्ल्ड बैंक ने प्राइस वाटरहाउस कूपर कंपनी को टेंडर दिलवाने के लिए दिल्ली जल बोर्ड और तत्कालीन दिल्ली सरकार पर दबाव डाला। ये योजना लागू होती तो दिल्ली में पानी छह गुना महंगा हो जाता।

       ये सूचना के अधिकार का ही असर है कि शैक्षणिक संस्थानों और
अन्य सरकारी विभागों के कामकाज में कुछ हद तक पारदर्शिता आई है। सूचना के अधिकार की बाध्यता के चलते विभागीय वेबसाइट पर आंकड़ों, नीतियों और नियमों और रोजगार भर्ती प्रक्रिया का उल्लेख करना अनिवार्य हो गया है।


सूचना में देरी और तथ्य छिपाने की कोशिश-

सूचना का अधिकार लागू होने के शुरुआती वर्षों में संबंधित विभागों और अधिकारियों के सूचना छिपाने और जानबूझकर देरी करने की कोशिशों की लगातार शिकायतें मिलीं। आवेदन में खामियां निकालकर, अन्य स्पष्टीकरण मांगकर और जान बूझकर जवाब में देरी की कोशिशें की जाती रहीं।     
साल 2007-2008 राजस्थान सूचना आयोग को सूचना देने में देरी, गलत सूचना देने या फिर सूचना देने से इनकार करने के मामलों की 418 शिकायतें मलीं लेकिन इनमें से सिर्फ 194 शिकायतों का निपटारा हो सका।
राजस्थान सूचना आयोग की कार्यप्रणाली पर अपीलार्थियों के साथ किए गए सूचना का अधिकार मंच के सर्वे में सामने आया कि आयोग के पास 2006-2007 में 86 परिवाद आए जिनमें से सिर्फ 48 का निपटारा हुआ। इसी साल जनवरी से जुलाई के बीच 438 परिवाद आए जिनमें से सिर्फ 58 फीसदी का निपटारा हुआ।

सूचना में देरी पर जुर्माने का प्रावधान शुरू से ही था पिछले कुछ सालों में इसका असर ज्यादा देखने को मिला है।
2013 में जोधपुर में आरटीआई कार्यकर्ता ने नगर निगम से सूचना मांगी थी। सूचना नहीं मिलने पर अप्रैल 2013 में अपील की जिसके बाद निगम आयुक्त को सूचना आयोग में 17 अप्रैल 2013 को तलब किया गया। निगम से इससे ठीक एक दिन पहले 16 अप्रैल को सूचना उपलब्ध करवाकर बचना चाहा लेकिन सूचना आयुक्त ने इसे लापरवाही मानते हुए निगम आयुक्त पर 10 हजार रुपए पेनल्टी लगा दी। इस तरह की सख्ती के कई मामले पिछले कुछ सालों में सामने आए हैं।

कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनीशिएटिव के 10 राज्यों और केंद्र में आरटीआई के एसेसमेंट में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। गुजरात, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, तमिलनाडु, मणिपुर सिक्किम और त्रिपुरा सूचना आयोग 2011-12 में लगातार दूसरे साल अपनी वेबसाइट पर वार्षिक रिपोर्ट जारी करने में असफल रहे। सिर्फ महाराष्ट्र इस मामले में सफल रहा।

हेराल्ड जे लास्की और कर्ट आइजनर ने सूचना के महत्व और उसकी उपयोगिता को रेखांकित करते हुए कहा है किजिन लोगों को सही और विश्वसनीय सूचनाएं प्राप्त नहीं हो रहीं उनकी आजादी असुरक्षित है। उसे आज नहीं तो कल समाप्त हो जाना है। सत्य किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी थाती होती है, जो लोग और जो संस्थाएं उसे दबाने छिपाने का प्रयास करती हैं या उनके प्रकाश में जाने से डरती हैं, ध्वस्त और नष्ट हो जाना ही उनकी नियति है

आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हमले-
सूचना को दबाने और सूचना में देरी के अलावा आरटीआई कार्यकर्ताओं को हमले और प्रताड़ना भी झेलनी पड़ रही है। कई आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या तक कर दी गई।
कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनीशिएटिव के आंकलन में सामने आया कि आरटीआई कानून लागू होने के आठ सालों में महाराष्ट्र में आरटीआई कार्यकर्ताओं पर 52 बार हमले हुए। इनमें सूचना मांगने वालों की हत्या के 8 मामले थे। इस मामले में गुजरात दूसरे नंबर पर रहा जहां 3 हत्याओं समेत 34 हमले हुए। इसके बाद दिल्ली, उत्तरप्रदेश और आंध्रप्रदेश का नंबर था।

आरटीआई का बेहद कम इस्तेमाल-
अब तक के खुलासे और आकंड़े सिर्फ तब हैं जब सूचना के अधिकार का बेहद कम इस्तेमाल हो रहा है। कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनीशिएटिव के सर्वे के मुताबिक 2011-12 में सिर्फ 0.3 फीसदी लोगों ने सूचना के अधिकार का इस्तेमाल किया।

निष्कर्ष-
सूचना के अधिकार से भ्रष्टाचार पर कुछ हद तक लगाम लगी है। कई बड़े घोटाले आरटीआई के जरिए उजागर हुए हैं। सरकारी कामकाज में कुछ हद तक पारदर्शिता आई है। अधिकारियों की जवाबदेही बढ़ी है। मौखिक की बजाय दस्तावेज और आधिकारिक रिकॉर्ड का महत्व बढ़ा है। लेकिन आरटीआई का इस्तेमाल इस कानून के लागू होने के 10 साल बाद भी काफी कम हो रहा है। जागरुकता की कमी, सूचना में लेटलतीफी, सही जानकारी का अभाव और आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हमले इसकी प्रमुख वजहों में शामिल हैं। आरटीआई आवेदन प्रक्रिया ऑनलाइन किए जाने से इसका इस्तेमाल बढ़ने की उम्मीद है लेकिन केंद्र के साथ ही राज्यों में भी ऑनलाइन सेवा के विस्तार की जरूरत है। लगातार जागरुकता अभियान भी आरटीआई का मकसद हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। एक लंबी लड़ाई और दशकों के सफर के बाद देश की जनता को सूचना का अधिकार हासिल हुआ लेकिन जिस धीमी गति से ये अधिकार हासिल हुआ उतनी ही धीमी गति से इसका प्रभाव देखा जा रहा है। ऐसे में अपने मकसद में पूरी तरह कामयाब होने के लिए सूचना के अधिकार को अभी और लंबा सफर तय करना है। समय-समय पर इसके प्रभाव का आंकलन  और नियमों में बदलाव भी जरूरी है। सब्र का फल मीठा होता है लेकिन इसे उन नजरों से बचाने की जरूरत भी हमेशा होती है जो इसे पकने से पहले ही गिरा देना चाहते हैं।

वह सरकार जो गोपनीयता में रंगरलियां मनाती है केवल लोकतांत्रिक शिष्टता के विरुद्ध कार्य नहीं करती बल्कि अपने को अपने ही दफन में व्यस्त रखती है
                                                                                         
न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर

 REFERENCES:
Books:

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