बढ़ रहा ऊपर निडर पहाड़

बढ़ रहा ऊपर निडर पहाड़

उचें ऊँचें पर्वत व् पहाड़ 
छू रहे गगन को 
उनकी आकृति प्रकृति 
ललचा  रही मन को 
ऊँचें नीचें रास्तों से 
जा रहा  हु मिलने 
उन पर्वतों से 
जो होकर निर्भीक रोके 
हवाओं की झोंकें 
यही हवान्यें जो 
जिचार चाहती उधर 
बेजान तिनकों को 
और हरसाती लहराकर 
अथाह बेवाक सागर को 
पर देख रहा साहिल 
हवाओं का झोंका हो जाता विफल 
टकराकर 
और शांत भाव से 
खड़ा रहता पहाड़ 
होकर अविचल 
रहता जमकर पव अचल 
सभी मुसीबतों के सहता 
कुछ भी न कहता 
न करता सिंह सा दहार
पर खड़ा पहाड़ 
चुने को गगन 
है  प्रयासरत  निरंतर 
मन में लिया है थान 
होकर मस्त मगन 
बाद रहा है आहिस्तें  आहिस्तें 
उन्मुक्त आसमान की ओर
उचें ऊँचें पर्वत व् पहाड़ 
छू रहे गगन को 
शशिकांत निशांत शर्मा 'साहिल'
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