जिंदगी की राह पे...

जिंदगी की राह पे...

जिंदगी की गस्त में
एक नन्हा सा जान
लेकर उंगली का सहारा
था शीखा चलना
दौरना और खेलना
सीखा था हँसाना
लोगों के साथ चलना
पर इसी जिंदगी की रेल में
हर कोई साथ नहीं करता सवारी
चलना परता है
कभी अकेले भी
अनजाने रस्ते पे
हर रह चलते लोग
बनते नहीं हमसफ़र
इसी जिंदगी की दौर में
किसी न किसी मोर पे
रह चलते पत्थर से
लग जाती है ठोकर
खून बहता है, दर्द होता है
चीखता चिल्लाता
दर्द से तड़पता है
दर्द को ही दवा बनाता
आंसू को मरहम बनाता
दिन बिताता, रात काटता
जिन्दगी की रह पे
चलते चलते
कभी फुल मिलता
कभी कांटें चुभता
कही धुप मिलती
कही छाव मिलता
रस्ते पे मोड़ आती
पड़ाव मिलता
थकन मिटती
मन प्रसन्न होता
आगे बदने के लिए
नयी उर्जा मिलता
नयी आशाएं जगती
और खुशियाँ मिलता
आगे बढने को मन करता
जिंदगी की राह पे
चलते चलते
आशाएं बुझती
मन छोटा होता
आदमी थक जाता
तन भी बेचारा क्या करता
जब मन ही हरे
और उमंग मिटे
हिम्मत हारे
तभी मौत आती
या जिंदगी यु ही बितती
- शशिकांत निशांत शर्मा 'सा
हिल'
Shashikant Nishant Sharma
Share on Google Plus

About Pen2Print Services

0 comments:

Post a Comment