जन्नत

जन्नत

ग़र फ़िरदौस-ए-बरूहे ज़मीं अस्तो
हमीं अस्तो। हमीं अस्तो। हमीं अस्तो।
जन्नत है धरती पर सुना था मैंने
लेकिन जन्नत कभी देखा नहीं,
मगर यक़ीन है इतना मुझे
तुझसे हसीन वो होगा नहीं।

सब कहते हैं जन्नत ने 
कोई झील छुपाये रखा है
बसते हैं शहर से घर उसपे
दाल झील नाम सबने सुनाया है।
बसते होंगे शहर उसपे
बाज़ार भी शायद लगता होगा
मगर तेरी निगाहों सा गहरा ना होगा वो
समंदर ना उसमें कोई डूबता होगा।

गुलमर्ग के गुल्शन का 
मैंने ज़िक़्र सुना है
इत्र की खुशबू सुनी है
केसर का नाम सुना है।
फ़ीके लगे तेरी रौनक़ के आगे
तेरी चमक के आगे बेज़ार लगा
सुना था झेलम गूँजती है एक अर्से तक दिल में
मगर तेरी हँसी की गूँज में वो भी खो गया।

जन्नत है कशमीर सुना है
ख़ुदा शायद वहीं रहता होगा
जन्नत ख़ुदा कुछ देखा नहीं मगर
शायद वो तुझसा ही दिखता होगा।
-इप्शिता सेनगुप्ता


कवियित्री परिचय

इप्शिता सेनगुप्ता, कलकत्ता निवासी हैं। पिछले वर्ष ही पॉन्डिचेरी विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. किया है और वर्तमान में एक प्राइवेट कंपनी में कर्मरत हैं । इप्शिता लेखन एवं पाठन के साथ-साथ संगीत और रंधन में भी रुचि रखती हैं। 
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