प्यार पहले और बाद में

आवारा बंजारा
प्यार पहले और बाद में


कहा दूंदू वही चहरा जिसे देखकर,
लम्हे कदम बदने से इंकार कर जाते थे,
सूरज की किरने कितनी भी तेज हो,
मेरी नजरो को तुझसे डिगा न पाते थे,

मासूमियत तेरी अब कही न बाकि है,
तेरे चहरे से तू बदली हुई सी नजर आती है,
वो मुस्कुराना देना मेरे भोलेपन पे,
मुझसे लिपट जाना मेरे ठिठोलेपन पे,
अब यादो की किताब नजर आता है,
जो इन सडको पे चलता, झूमता,
सिर्फ नजर आता है.

सवाल खुदसे है के क्या बदल गया दरमियां,
कमी किन मायनों में के ये है दुरी,
वो हॉट जो चहक उठाते थे मेरे लोट आने पे,
आज क्यू खामोश है यही सोच है दिल में मेरे,

प्यार की सीमाए क्या किताबो के पन्नो में ही सिमटी है?
या बदलते मोसम संग बदलना,
प्यार का भी एक मोसम है?

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