भारत मंथन

India a country of festivals

कब तक जलाओगे भुझे हुए दीपो को,
मत मंथन करलो।

जो सो रहे हैं न जागने के ख्वाब लिए,
उन मुओ को तो,
यम का भ्रम भी न हिला पाया।
भारत युग की परिकल्पना,
कुछ बुद्धि जीवियों का व्यर्थ कर्म ही रहा होगा।
क्षण क्षण बदलते इन चेहरों को,
भृतवंशियो ने कर्म धरा पर,
यश गाथा के समक्ष, सहज ही,
शून्य रख दिया होगा।

जाहिर हैं कही न कही नकारा गया हैं,
किसी न किसी के साथ गठबंधन करके,
कौरव वंश को स्वीकारा गया हैं।
तभी तो धर्म-कर्म, सदाचार-दुराचार के,
भेद मिट ही गए हैं,
अन्याय की परिभाषा पढ़ते पढ़ते,
न्याय की आशा भूल ही गए हैं।

दोषारोपण के अस्त्र ने,
भारत की ख्याति गढ़ी हैं,
नेता हो, अफसर हो, या हो आम जन,
कोई कही जिम्मेदार नहीं।
यूँ ही पिघल रहा हैं हिमालय,
हमारा किसी का उसमे हाथ नहीं।

घोर तो जब हो गया,
सच्चाई पे चलना ही यहाँ,
चोर हो गया।

दरिद्रता का सवर्णिम युग हैं,
धन धान्य की कमी नही हैं,
मगर,
ईमान, ईश्वर, और आत्मा भी होती हैं,
भारतवंशी भूल ही गए हैं।

समानता सामन्ती जागीर हो गयी,
स्त्री का दामन बचाना, केवल
ममत्व की पीर हो गयी।

उन्नति की पराकाष्ठा तो देखो जग में,
खाने को दाने नही,
पीने को पानी हैं कम,
सोते अपने गलियारों में,
अशिक्षा के फैले हैं पंख,
और भारत चला हैं,
नए सपने संजोने।

ये कौरव जन की दूरगामी नजरें ही तो हैं,
आग लगे तब कुआँ खोदे,
और अपनी गिरबां कब की मैली,
लोगो ऊपर दोष लगावे।
सोचो जरा ओ भारतवंशी,
जल्दी अन्त, निकट न आवे।


राकेश कुमार वर्मा
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