काकी की चाकी(कहानी)

शालिनी साहू
ऊँचाहार,रायबरेली(उ०प्र०)
Shalinisahu15aug@gmail.com
रात में खाने के बाद हर कोई टहलने के लिए सड़क पर निकल चुके हैं टहलने के बहाने ही जरा सा वक्त अपनों के मध्य बीतता है वरना वर्तमान की आपाधापी में समय कहाँ शेष है किसी के पास
सम्बन्धों में अब वो आत्मीयता कहाँ बस हर कोई रोटी,कपड़ा और मकान में ही निहित है!
रसूलपुर गाँव में सुखिया काकी का बहुत ही बोलबाला है काकी ही पूरे गाँव की हेड है! बुलन्द आवाज,दोहरी कद-काठी साँवला रंग,नैन नक्स बहुत ही खूबसूरत!
बुढ़ापा उम्र काआ गया काकी के पर चेहरे से जान नहीं पड़ता कि काकी इतने बरस की हो गयी है
काकी का कहना भी तो है जब तक गाड़ी में पेट्रोल रहेगा तभी तक तो गाड़ी चलेगी पेट्रोल खत्म गाड़ी अपने आप रुक जायेगी! सच काकी के चेहरे पर दमकती खूबसूरत का यही राज है!
खान-पान का नियमित ध्यान जितना काम वो आज भी इस उम्र में करती है उतना जवान औरतों के बस की बात नहीं!
सच!सुबह चार बजे उठ जाना दुवार बटोरना,गोबर करना,पानी देना,जानवरों को नहलाना उनकी समय से देख-रेख करना काका के लिए चुकन्दर और गाजर का जूस बनाना!फिर नहा-धोकर पूजा-पाठ करना तब जाकर रसोई में प्रवेश करना!इन कामों से फुरसत मिलें तब काकी दरने,फोरने जुट जाती अनाजों को कहीं दाल तो कही दलिया बनाने में व्यस्त काकी को खाली बैठते कोई ना देखा था!
काकी का कहना था जहाँ चार ठू मेहरियाँ जुटत हैं हूहाँ पंचचौरा होत है केवल फिर कउनौ बात मुँह से निकरि आवै तो ..लेव मजा झोटी के झोटा होय फिर एहेसे अच्छा आपन काम में लाग रहौ सबसे नीक!
काकी से कोई मुँह लड़ा भी नहीं सकता था पूरा मुहल्ला जगमग रहता बस चाची की एक आवाज से बहुत ही सह्रदय,दयालु थीं!
दूसरों के दु:ख में सदैव सबसे पहले शामिल!
पर कहते हैं ना कि अच्छे इंसान को हर कोई पूछता है शायद भगवान भी!
काकी की करनी इतनी अच्छी थी कि बिना कष्ट सहे एकदिन काकी इस दुनियाँ से चल बसी!
उस दिन जैसे पूरे गाँव में भूचाल आ गया हो किसी के कानों को विश्वास ही ना हो कि काकी गुजर गयी! सब यही अरे!का मजाक करत हो अबहिन काकी सुनिहैं तव हजार गारी से कम ना देहैं! पर अब काकी कहाँ दुबारा इस दुनियाँ में आने वाली!
चारों तरफ सन्नाटा पसर गया हर तरफ सूनापन !!
काका का जोड़ा बिछड़ गया! इतना ख्याल रखती थी काकी काका का!बिना काका के खाना खाये कभी काकी ने भोजन का कौर नहीं तोड़ा था!
...बच्चों से बहुत स्नेह बस मुँह की खरखर थी काकी जो कहती थी सामने पीठ पीछे नहीं!
काकी के अचानक इस तरह से गुजर जाने से हर तरफ सन्नाटा और सूनापन पसर गया है!आज सालों बीत गये वो चाकी भी चुपचाप किनारे पड़ी है जिसे काकी कभी छुट्टी नहीं देती थीं काकी की चाकी के हिस्से में कभी रविवार नहीं होता! हाँ काकी अपनी चाकी को किसी भगवान से कम नहीं समझती थी उन्होंने कबीरदास जी की पंक्तियों की तरफ अच्छे से ध्यान दिया था-पाथर पूजे यदि हरि मिलत तो मैं पूँजू पहार और घर के चाकी कोउ न पूजत जेहके पीसा कुल घर खाये!पर काकी के अन्दर ऐसा नहीं था काकी ईश्वर के साथ-साथ अपनी चाकी की भी पूजा करती थीं क्योंकि चाकी ही काकी के लिए सब कुछ थी जो काकी के काम में सहायक सिद्ध होती! लेकिन अब हर तरफ सन्नाटा है एक अजीब सा सूनापन है!
अब गाँव की स्त्रियाँ कभी छठें छमासे आ जाती है काकी की चाकी में कुछ दाल वगैरह दरने!वरना अब चाकी चुपचाप एक किनारे पड़ी रहती है क्योंकि अब काकी के बाद कोई ना बचा जो चाकी को चलाता काकी के जाने के बाद अब चाकी के जीवन में हर दिन इतवार ही नजर आता!
काकी इत्ती सी किसी चीज के लिए किसी दूसरे के घर माँगने नहीं गयीं हर चीज काकी स्वयं लाकर रखती थी काकी हमेशा कहती थी इत्ती बड़ी जिन्दगी मा हम पेट नहीं खावा मुदा गिरिसती बहुत बनावा है कि आज हमरे घर सौ आदमी आय जायें तव हमका दूसरे के हियाँ समान माँगें के जरूरत नहीं ना !
लेकिन आज चाची की गृहस्थी वीरान पड़ गयी उनके बिना!और चाकी के जीवन में भी एक अजीब सा सूनापन जिन्दगी भर के लिए पसर गया है अब कौन इस चाकी को चलाने वाला भला अब तो मिक्सी का जमाना है चाकी को तो रिटायर होना ही पड़ेगा अब चाकी के लगता 62 वर्ष पूरे हो चुके हैं!तो काम से हमेशा के लिए छुट्टी!
हाँ पेंशन के रूप में कभी-कभार कुछ धनराशि मिल जाया करेगी...गाँव की स्त्रियों के द्वारा......कुछ विशेष मौकों पर!!
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