**अपनों की शादी में दिल बेगाना**(कहानी)

marriage hindu

शालिनी साहू
ऊँचाहार,रायबरेली
चारों तरफ हरियाली ही हरियाली!!कहते हैं या सच में सावन होता है या फिर सावन के अन्धे को हर जगह हरियाली ही हरियाली नजर आती है...खैर यहाँ पर अन्धे की बात. सच नहीं बल्कि सच में सावन का महीना ही चल रहा था...कहते हैं सावन का महीना बड़ा ही सुखदायी होता है...पर नववधू के लिए तो उसका साजन ही सर्वोपरि होता है क्या सावन तो क्या भादो!!वो गाना भी तो चला है..चूडी़ मजा न देगी कंगन मजा न देगा ....तेरे बगैर साजन..सावन मजा ना देगा..
..खैर इस सावन में ऐसे त्यौहार भी पड़ते हैं जिसमें नववधू को अपने मायके आना पड़ता है..और फिर सावन का महीना मायके का ही होता है..सच्चे अर्थों में एक स्त्री के लिए..वो हरी-हरी चूड़ियों के साथ झूले पर बैठकर..सुन्दर गीत गाना..
और...
विशेष पर्व रक्षाबन्धन जो भाई-बहन के प्यार को एक सूत्र में पिरोते हैं....आज मन्तो बुँआ भी अपने मायके आयी थी रघुवीर चाचा को राखी बाँधने!!गाँव में हमारे यहाँ अवधी का प्रचलन है जहाँ पर रक्षाबन्धन को कजलईयन का त्योहार कहते हैं..मन्तों बुँआ अपने बेटे के साथ आयी थी..राखी बाँधने रघुवीर चाचा को !!उन्होनें राखी बाँधी और ढेर सारी बातें चाचा से की क्योंकि पूरे 5 साल बाद बुँआ अपने भाई के घर आयी थीं...इधर कुमार भइया का दिल एक नवयौवना पर आ गया ...वह रघुवीर चाचा के पड़ोस की रिंकी थी वहीं मनोहर काका की बिटिया...एकदम घर जैसा ही माहौल...था
खैर कुमार भइया ने रिंकी का नम्बर ले ही लिया किसी प्रकार !!रिंकी तो एकदम अन्जान बस इस बार बारहवीं में दाखिला लिया था...
....बुँआ और कुमार भइया राखी बाँधकर चले गये!!लेकिन कुमार भइया तो अपना दिल यही छोड़ गये..कुछ दिन बाद मैसेज -मैसेज होने लगा..फिर थोड़ी बातें...पर रिंकी को तो बस वहीं अल्लहड़पन सूझता केवल!!और कुमार उसकी हर अदा में अपना प्यार देखते!!
कुमार भइया की नौकरी लगने ही वाली थी..देखने में भी ठीक-ठीक ..इ बात सुनकर एकदिन मनोहर काका कहने लगे !!रघुवीर काका से अगर तुम्हैं कुमरवा का नौकरी मिल जाइ तो हम अपन रिंकीया के बियाह वही के साथ कई देब!!जब कुमार को यह बात पता चली तो वह फूले ना समाये!!बार-बार रिंकी के सपने देखने लगे हर जगह हर गली मोहल्ले सड़क पर....पर रिंकी को इन शादी..जैसे चक्करों में पड़ना ही ना था...उसे तो अपने पैरों पर खड़ा होना था और मनोहर काका का दुनियाँ में नाम रौशन करना था...
खैर कुमार ने काफी हद तक उसका अल्लहड़पन दूर किया उसे स्वयं से ठीक से बात करना सिखाया...धीरे-धीरे उसको स्वयं के नजदीक लाने की कोशिश की....क्योंकि अभी तक कुमार का प्यार एकतरफा ही था..
इधर कुमार के घर पर हर रोज रिश्तों की लाइन लगती !!और कुमार बस ना ही करते जाते!!सैकड़ों से ऊपर एक से एक बडे़ घराने और खूबसूरत से खूबसूरत लड़कियों के रिश्ते पर वही हर बार की तरह ना!!
एक दिन घर वाले ऊब गये तो कारण पूँछ ही लिया...तब कुमार ने सच बता दिया...खैर उन सबने कहा ठीक है!! बोलो उन सबसे रिश्ता लेकर आये!!आखिर हम लड़के वाले हैं हम पहले थोड़े जायेंगे...और इसी नवरात्रि में शादी करनी है...जब ये बात कुमार ने रिंकी को बताई....जैसे रिंकी का सर्वस्य लुट गया हो कुमार के प्रति नफरत की भावना जाग गयी!! क्येंकि उसे अपने पैरों पर खड़ा होकर ही शादी के बन्धन में बँधना था...
....सारे रिश्ते तोड़ दिये अब कुमार को उल्टे पैर ही लौटना पड़ा....
अब कुमार घरवालों को क्या जवाब देता..अाखिर उसने अपनी शादी का हवाला घर वालों के माथे पर ही डाल दिया...क्योंकि रिंकी अब ते उसे मिलने ना वाली!!
....लगभग एक साल बीत गया इधर कुमार की शादी तय हो गयी ..विवाह घड़ी निकट आ गयी तब कुमार कार्ड लेकर रघुवीर चाचा के घर पहुँचा !!कहते हैं ना पहला निमन्त्रण मामा के घर से ही शुरू किया जाता है...फिर मनोहर काका के भी घर जाना हुआ द्वार पर ही रिंकी मिल गयी कुमार को...पर शायद अब रिंकी को देखना भी कुमार के लिए पाप था..अन्दर गया..कार्ड दिया मनोहर काका को..रिंकी ने उसकी आव-भगत की !!कुमार ने छिपे शब्दों में चाचा से ये बात कही सबको आना है!!शादी में !!काका ने कहा हाँ जरूर आयेंगे बबुआ!!
...पर रिंकी से एक बार भी ना कहा..अचानक जाते-जाते बस इतना पूँछ लिया और क्या चल रहा है आजकल...
रिंकी का गला रूँध गया आँखों में आँसू आ गये पर वो उन्हें बाहर ना आने का हर सम्भव प्रयास करने लगी शायद कुमार उसे पहचान भी गया!!रिंकी ने जवाब दिया बस कुछ नहीं यू हीं....
रिंकी का दिल यही कहने लगा इस शादी में मेरा ही दिल बेगाना है मुझे ही निमन्त्रण नहीं!!कोई बात नहीं कुमार मुझे आना ही नहीं तुम्हारे यहाँ!!रमा को तो मैं कोई सा भी बहाना देखकर टाल दूँगी कि मैं नहीं जाऊँगी....
....कुमार भी अपनी बेगानी मोहब्बत को हर रूप में अपना रूप देना चाहता था..क्योंकि अगर वो वापस लौटा तो..उस नयी जिन्दगी का अपमान होता...
....रिंकी ये बात अच्छे से समझती थी..पर उसे कुछ नहीं उस बेगानेपन का मलाल था..कि क्या ये वही कुमार है जो मुझे दिनभर परेशान करता था...
.पर सच तो यह था कि कुमार रिंकी का होकर भी ..किसी और के साथ बँध गया...जो उसे सारी उम्र निभाना है...आज कुमार ने रिंकी से आँखें तक ना मिलायी थी..और ना रिंकी ने कुमार को देखा...क्योंकि शादी का कार्ड कुमार के हाथ में ही देखकर ही समझ गयी थी कि कुमार ...अपनी शादी का निमन्त्रण ही देने आया होगा....
.बाहर निकलते हुए सर पर हेलमेट लगाकर रिंकी से नमस्ते करते हुए वह चला जाता है...
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