संयुक्त राष्ट्र संघ और हिन्दी भाषा

United Nations

-चावड़ा संजय करमणभाई
(एम.फिल्. NET), शोध छात्र, हिन्दी भवन, सौराष्ट्र विश्वविद्यालय-राजकोट, गुजरात

आलेख का सारांश : -
इस आलेख में भारत तथा समस्त विश्व में हिन्दी की स्थिति, राजभाषा हिन्दी की संवैधानिक स्थिति तथा संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी अधिकृत भाषा न बन पाने के कारण एवं समाधान पर विचार किया गया है ।


"संयुक्त राष्ट्र संघ ने 6 भाषाओं को स्वीकृत किया है -अरबी, चीनी, अंग्रेज़ी, फ़्रांसीसी, रूसी और स्पेनीश1", परंतु इन में से केवल दो भाषाओं को संचालन भाषा माना जाता है - अंग्रेज़ी और फ़्रांसीसी ।पीछले कुछ समय से भारत में हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकृत भाषा बनाने की मांग हो रही है । पर क्या केवल 14 सितंबर के एक दिन हिन्दी को याद कर लेने से हिन्दी संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्यता प्राप्त भाषा बन सकती है ? कदापि नहीं । हमने हिन्दी के महत्त्व को  स्वीकारा ही नहीं । आज भी भारत में सिर्फ कहने के लिए ही हिन्दी राजभाषा है । सन् 1963 में राजभाषा अधिनियम पारित करके हिन्दी को हमने अनिश्चित काल के लिए वनवास दे दिया है । अतः हिन्दी केवल और केवल कहने के लिए ही राजभाषा है, और सभी व्यवहार सहराजभाषा अंग्रेज़ी से ही होता है । हमने हिन्दी को वह सम्मान कभी नहीं दिया जो उसे मिलना चाहिए । आज हमारी अपेक्षा है हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकृत भाषा बनाने की, पर उससे पहले हमें हिन्दी को अपने देश में उचित स्थान देना चाहिए । हिन्दी में संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनने के सभी गुण हैं । संस्कृत के अतिरिक्त, पूरे विश्व में एक भी ऐसी भाषा नहीं जो वैज्ञानिकता की दृष्टि से हिन्दी के सामने टिक सके । पूरा विश्व आज भूमण्डलीकरण की वजह से हिन्दी के महत्व को स्वीकार रहा है । ऐसे समय में भारत में राजभाषा हिन्दी की स्थिति को लेकर कई सवाल उठ सकते हैं ।
2015 के हिन्दी दिवस समारोह पर आयोजित कार्यक्रम में राजभाषा पुरस्कार प्रदान करने के बाद महामहिम राष्ट्रपति जी ने कहा कि अब हिन्दी की गूंज संयुक्त राष्ट्र जैसी विश्व संस्थाओं में भी सुनाई दे रही है । तो हिन्दी को लेकर कई आशाएँ बनने लगीं । आज आवश्यकता है एक बहुत बड़े बदलाव की, एक ऐसा बदलाव जिससे राजभाषा केवल हिन्दी हो और सहराजभाषा का कोई अस्तित्व ही न हो ।जापान, चीन, और रशिया ने अपनी भाषाओं में ही विकास की नई उचाइयों को प्राप्त किया है । "इण्डोनेशिया ने स्वतंत्र होने के चार वर्ष बाद ही अपनी भाषा को राजभाषा का पद दे दिया । टर्की के स्वतंत्र होने पर मुस्तफा कमाल पाशा ने एक दिन में टर्की को राष्ट्रभाषा बना दिया था ।"2 इण्डोनेशिया और टर्की से हमे प्रेरणा लेकर हिन्दी को गौरवान्वित करना चाहिए । मान लीजिए कि यदि कोई सरकार अंग्रेज़ी के स्थान पर हिन्दी को राजभाषा के सारे अधिकार देने के पक्ष में हो तो भी कुछेक मानसिक गुलाम लोग ऐसा होने नहीं देंगे । भारतीय संस्कृति के विशाल वट वृक्ष की प्रत्येक शाख पर ऐसे हजारों उल्लु बैठे हैं जो हिन्दी का अवश्य ही विरोध करेंगे । जो विरोध करते हैं उन्हें करने दें । यदि दो-तीन गटर आंदोलन करती हैं, तो क्या गंगा बहना बंध कर देगी ? भारत को आजादी के इतने सालों बाद भी 'भारत' नाम से नहीं अपितु फिरंगियों के द्वारा दिए गए नाम 'इंडिया' से ही पहचाना जाता है, उनकी ही भाषा अंग्रेज़ी का सहराजभाषा के रूप में देश पर राज है । और उनके ही नजरिये के कारण विश्व के सबसे समृद्ध ज्ञान के भण्डार भारत को गवारों और सपेरों का  देश माना जाता है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं कि असल और खानदानी अंग्रेज़ इंग्लैंड में नहीं पर भारत में पैदा होंगे और हमें अपनी भाषा व संस्कृति के लिए भी अमेरिका सहित पश्चिमी देशों पर निर्भर होना पड़ेगा ।
जब हमें हमारी बात पर भरोसा नहीं होता, तब दूसरे हमारी बात पर कभी भरोसा नहीं करते । ठीक इस तरह हिन्दी को हमने अपने देश में ही उचित स्थान नहीं दिया, और हम अपेक्षा रखते हैं कि हिन्दी संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बने । अहो वैचित्र्यम्..........
- चावड़ा संजय करमणभाई (एम.फिल्. NET) मोरबी, गुजरात


संदर्भ सूची
1- संदेश पृ.14, दैनिक पत्र, दिनांक 21, फरवरी 2016


2-श्यामचंद्र कपूर, हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ .19, ग्रंथ अकादमी प्रकाशन-नई दिल्ली, संस्करण- प्रथम, 1991
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