***रिश्ता***(कहानी)

बचपन से साथ रहना,खेलना-कूदना,एक-दूसरे के संग रहना,छोटी-छोटी बातों पर रूठना फिर पल भर में मान जाना यही मिठास सम्बन्धों में थी मनोज भइया के!
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कब मनोज भइया दद्दा बन गये छोटे-छोटे भाई-बहनों का प्यार एकत्रित हो गया कुछ पता ही ना चला !
सबके चहेते मनोज दद्दा साँवला रंग-रूप नैन-नक्श तो पूरे परिवार में शायद ही किसी से मेल खाते हो..इतने खूबसूरत!
...दिमाग भी गजब का ईश्वर ने दे दिया था!
दद्गा ने समय से अपनी पढ़ाई पूरी की एल.एल.बी की डिग्री ली!फिर अपने पैतृक गाँव के जिले में ही वकालत करनी शुरू कर दी!
मतलब की सिविल कोर्ट में! अब दद्दा मनोज भइया से "वकील साहब" बन चुके थे!चाची और चाचा का भी चौड़ा बीस इंच चौड़ा होय गा आपन बेटवा के इ नवुका नाम सुनके जब रोज सबेरे-संझा दुइ-चार मनई पूछे रहत कि चाची-वकील साहब नहीं ना का घर पा तई हमरे मुकदमवा के पैरवी करवावयै का रहै!
...बहुत खूब रूतबा पूरे गाँव के एकमात्र अधिवक्ता मनोज भइया!
...खैर दिन बीतते गये!कुछै दिन मा भौजी के आवै के तईयारी शुरू होयलाग...एक सेक इस्मार्ट ब्यूटीफुल लरकियन के फोटू आवै लाग!...
मनोज भइया सादगी से युक्त पूरा जिम्मा परिवार के लोगों के ऊपर डाल दिये कि जो तुम सबको पसन्द है हम वही से शादी कर लेबे हमें कोई आपत्ति नहीं है अम्मा-बाबू तुम्हरे चुनाव मा!
....आखिर कार शहनाई की वो घड़ी दिसम्बर महीने में मनोज भइया के दुवारे बजिन गयै!
खूबै धूम-धाम से बियाह भा पहिल बियाब रहा लरिका केर चाची खिन!
खूबै उत्साह! सबके मन मा कि दद्दा के बियाह है हम सब मिलके नागिन वाला डांस करब!सब अरमान पूर कर लेब!
....मनोज भइया भौजी लाइकै घर भर दीहिन आपन!
...कुछ दिन सुखपूर्वक बीते! पर कहत हय ना कि जहाँ पर चार-बरतन रहत हय हूँवा खटर-पटर जरूर होत हय! फिर वहू सास-ननद मा तव औरिव! कहत हय कि माटिव के नन्द बिरावत हय!
...मुदा अम्मा तो अम्मा है औरि दुलहिन-तो दुलहिन भइया के बरै!
खैर जिन्दगी के रफ्तार अापन वेग से चलत रहै!
अइसन मा एक दिन चाचा अचानक इ संसार से अलविदा कहि चलत हय!
अब तव सारा कार-भार सब बड़कै बेटवा पर मतलब कि मनोज भइया पर टूट परा!
..खैर अब तो उन्हें अपने पिता के दायित्वों को निभाना ही था!
किया भी!सब भाई-बहिनी के बियाह सम्पन्न करिन!
मुदा अब चार बरतन से आठ बरतन होयगै तव अब खटर-पटर बहुतै ज्यादा होयगै! अब भइया के सर से पानी ऊपर...अब भइया का करै भौजी के सुनै कि अम्मा के!दिन-भर बाहर के वकालत करै राति मा आपन घर के!
...भइया बहुतै विचलित हारि गयै इ रोज-रोज के नौटंकी से!तव बिनै कउनौ परवाह किये दरकिनार होयगै!इ जानत रहेन कि दुनियाँ मा तमाम तिरा के सवाल उठी हम पर कि महतारी का छोड़िके.. पर....खटर-पटर तव अब बहुतै जेदा होयगै रही!
जो अब सम्भलने कहाँ वाली!
....लेकिन चाची के लिए तो उनके सभी औलाद बराबर हैं सबके लिए दर्द है मनोज भइया को अइसे घर छोड़ जात चाची आपन आँसू रोक ना सकी!
....और चाचा का खूबै याद करिन कि ई दिन बाकी रहा!सब हमका छोड़िके???
...आँसुओं की धारा अब बन्द कहाँ होने वाली प्रकृति से भी माँ-बेटे की जुदाई देखी नहीं जा रही थी तभी प्रकृति भी घनघोर विलाप करने लगी ...जोरों से बारिश शुरू हो गयी!काला घना अँधेरा चारों तरफ पसर गया!
....औरि माई-बेटवा के रिश्ता औरि गहिरा होयगा!
सच सम्बन्धों की सच्ची परख दूर होने पर जाहिर होती है!
कहते हैं ना घर की मुर्गी दाल बराबर!जरा सी दूरियों से रिश्तों में बेहद प्यार उमड़ पड़ता है!
वहीं साथ रहने पर लोग अहमियत...नहीं दे पाते अपने रिश्तों को!
रिश्ते की अहमियत तो बिछड़ने पर मालूम होती है सच्चे अर्थों में...
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शालिनी साहू
ऊँचाहार,रायबरेली(उ०प्र०)
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