पूर्वोत्तर भारत में हिन्दी का प्रसार एवं उसकी संभावनाएँ (असम के विशेष संदर्भ में)

-  जशोधरा बोरा
‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल ।
बिनु निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।।’
                                        - भारतेन्दु हरिश्चंद्र
      हम सबको अपनी मातृभाषा पर गर्व करना चाहिए, और अगर मातृभाषा हमारी निज भाषा है तो हिन्दी जो पूरे राष्ट्र में फैली हुई है तथा जो संपर्क भाषा का काम कर रही है, क्या वह निज भाषा नहीं है? हिंदुस्तान की आबादी लगभग एक सौ पच्चीस करोड़ की है। इतनी बड़ी जनसंख्या को जोड़ने में भाषा की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। भारत एक ऐसा राष्ट्र है जहाँ भिन्न भाषाएँ, उपभाषाएँ, बोलियाँ पाई जाती हैं, परन्तु अगर उत्तर भारत से दक्षिण भारत तथा पूर्व भारत से पश्चिम भारत तक कोई एक भाषा से सभी लोग कम या ज़्यादा रूप से परिचित है, तो वह हिन्दी है। हिन्दी वह सूत्र है जो पूरे एक सौ पच्चीस करोड़ लोगों को आपस में बाँधती है। अन्य भारतीय भाषाओं की तरह इसका कोई एक निश्चित प्रदेश नहीं है। भारतीय संविधान ने हिन्दी की प्रायोगिक स्थिति के आधार पर पूरे देश को क, ख और ग तीन क्षेत्रों में विभक्त किया है। असम हिन्दी के प्रयोग की दृष्टि से ‘ग’ क्षेत्र के अंतर्गत आता है।
      असम में हिन्दी सीखने के कार्यक्रम का प्रारम्भ मध्यकाल के संतों ने किया था। तीर्थ पर्यटन के लिए असम के दोनों संत महापुरुषों – श्री शंकर देव और श्री माधवदेव ने अपने शिष्यों के साथ पदयात्रा के दौरान धीरे-धीरे उत्तर भारत की आधुनिक (तत्कालीन) भाषाएँ सीखी होंगी। इनकी कुछ परवर्ती रचनाओं की भाषा से इसका प्रमाण मिलता है।
      सबसे पहले जोरहाट में पुलिस सुपरिन्टेंडेंट  श्री यज्ञराम खारधरीया फुकन (1805-1837) ने यह महसूस किया कि असम की उन्नति के लिए असम वासी को बंगला की अपेक्षा हिन्दी सीखना अधिक उपयोगी होगा। इसलिए हिन्दी शिक्षण की दृष्टि से एक उपयुक्त ग्रंथ रचने का उन्होंने संकल्प किया था – और इस योजना को 1832 ई॰ के 79 भट्टे वाले “समाचार दर्पण” में प्रकाशित किया। इसका नाम रखा था – “हिन्दी व्याकरण और अभिधान”। लेकिन आकस्मिक बीमारी और अकाल मृत्यु के कारण उक्त ग्रंथ का लेखन अधूरा रह गया।
      1832 के बाद ब्रह्मपुत्र में काफी पानी बह गया। असम के साथ बाहर के लोगों का संबंध बढ़ता गया। 1885 ई॰ के बाद स्वतन्त्रता आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा। राष्ट्रीय आंदोलन के साथ राष्ट्रीय एकता के प्रतीक राष्ट्र भाषा की आवश्यकता भी लोग महसूस करने लगे। लेकिन तब भी संस्थागत प्रयास असम में नहीं हुआ। सन 1926 ई॰ में असम में पहली बार विद्यालयों में हिन्दी को एक शिक्षण के विषय के रूप में स्थान मिला। इसका श्रेय जाएगा शिवसागर के असम पॉलिटेकनिक इंस्टीट्यूट के प्रतिष्ठाता भुवन चन्द्र गगै (1889-1940) को। आपने अथक परिश्रम और अनेक परेशानियों के बावजूद हिन्दी शिक्षा की तीसरी से आठवीं कक्षा तक अनिवार्य विषय के रूप में और आगे दसवीं तक ऐच्छिक विषय के रूप में व्यवस्था करायी। राष्ट्रीय शिक्षा के केंद्र होने के कारण कलकत्ता विश्वविद्यालय ने इसे मान्यता नहीं दी थी। अंततः काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने ही इसे संबद्ध किया था।
      असम में अन्य भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण व प्रचार का कार्य 1934 ई॰ से प्रारम्भ हुआ। हिन्दी प्रचार की अखिल भारतीय योजना के अनुसार बाबा राघवदास (1896-1958) 1934 ई॰ में असम आए और उन्होंने कई हिन्दी भाषी व्यक्तियों को प्रचार कार्य में लगाया। इसके बाद 1937 ई॰ में काका साहेब कालेलकर, दादा धर्माधिकारी श्री मन्नारायण और मोटूरी सत्यनारायण के साथ बाबा राघवदास असम आए और उन्होंने कुछ हिन्दी भाषी प्रचारकों को हिन्दी शिक्षण के लिए नियुक्त किया। उनमें जोरहाट में अंबिका प्रसाद त्रिपाठी, डिब्रूगढ़ में शिव सिंहासन मिश्र, शिवसागर में सूर्यवंशी मिश्र, नगाँव में देवेंद्र दत्त शर्मा, गुवाहाटी नगर में धनेश्वर शर्मा और गोलाघाट में वैकुंठ नाथ सिंह मुख्य हैं। ये सभी प्रशिक्षित अध्यापक नहीं थे। इनकी एक सुविधा यह थी कि वे सभी स्थानिक भाषा असमिया से परिचित थे और व्याकरण-अनुवाद पद्धति उनका माध्यम था। इस बीच कुछ असमिया युवक युवतियाँ काशी विद्यापीठ जैसे राष्ट्रीय संस्थान में अध्ययन के लिए गए थे। उनमें नवीन चन्द्र कलिता, खरगेश्वर मजुमदार का नाम उल्लेखनीय है। बाबा राघवदास के आश्रम में हिन्दी सीख रहे थे रजनीकान्त चक्रवर्ती और हेमकांत भट्टाचार्य जी। बाद में नवीनचन्द्र जी भी इनसे आ मिले। 1937 ई॰ में इन तीनों को राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा द्वारा संचालित “हिन्दी अध्यापना मंदिर” में प्रशिक्षण के लिए भेजा गया। दरअसल वे तीनों ही असम के संस्थागत हिन्दी शिक्षण के पुरोधा हैं। प्रशिक्षण समाप्त कर श्री नवीन चन्द्र कलिता – गुवाहाटी में, श्री रजनीकान्त चक्रवर्ती – शिवसागर में और स्व. हेमकांत भट्टाचार्य जी नगाँव में प्रचारक नियुक्त हुए। बाबा राघवदास ने इस यात्रा में राज्य के प्रधानमंत्री लोकप्रिय गोपीनाथ बरदलै के साथ तत्कालीन असम के सभी मूर्धन्य व्यक्तियों से भेंट की। इन सब के उत्साह व प्रेरणा से हिन्दी प्रचार को गति मिली।
      असम में राष्ट्रभाषा प्रचार के संस्थागत प्रयास के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति से अनुभवी प्रचारक यमुना प्रसाद श्रीवास्तव को असम भेजा गया। इनके साथ बाबा राघवदास भी असम आए। इनके अथक प्रयास से 3 नवंबर 1938 ई॰ में असम हिन्दी प्रचार समिति की स्थापना हुई और इसकी पहली बैठक 11-12-1938 को कॉटन कॉलेज में हुई। इसी बैठक में लोकप्रिय बरदलै ने सरकार की तरफ से बारह सौ रुपये के अनुदान की घोषणा की। साथ ही पाँचवीं कक्षाओं से माध्यमिक विद्यालयों में अन्य हिन्दी सिखाने का निर्देश दिया। भुवंचन्द्र गगै जी की व्यक्तिगत प्रचेष्टा के बाद पहली बार पूरे असम के विद्यालयों में भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण की नींव पड़ी। इस बीच कुछ असमिया भाषी युवक हिन्दी सीख कर असम पहुँचे थे। यह समिति आगे चलकर असम राष्ट्र भाषा प्रचार समिति बनी, जो आज भारत के श्रेष्ठ हिन्दी स्वैच्छिक संस्थानों में से एक है। असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की स्थापना का मुख्य उद्देश्य आम लोगों में हिन्दी भाषा तथा साहित्य के प्रचार-प्रसार को लेकर ही था, साथ ही हिन्दी भाषा को जनजातियों तक भी पहुँचाना था। इस समिति द्वारा हिन्दी भाषा तथा साहित्य को आगे बढ़ाने में काफ़ी सारी परीक्षाओं का आयोजन हुआ है जैसे प्रबुद्ध, विशारद, प्रवीण आदि।
      इसी तरह हिन्दी शिक्षण के प्रसार में योगदान देते हुए केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, शिक्षकों को केंद्र में रखकर पूर्वोत्तर भारत के सेवारत हिन्दी शिक्षकों, स्वैच्छिक हिन्दी सेवी संस्थाओं के हिन्दी प्रचारकों तथा पूर्वोत्तर में स्थित केन्द्रीय एवं नवोदय विद्यालयों के हिन्दी शिक्षकों, पूर्वोत्तर के महाविद्यालय तथा विश्वविद्यालयों के हिन्दी प्राध्यापकों को अन्य भाषा शिक्षण (द्वितीय भाषा शिक्षण) की दृष्टि से प्रशिक्षित करता है। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान असम राज्य के प्राथमिक हिन्दी शिक्षकों, माध्यमिक हिन्दी शिक्षकों तथा उच्च माध्यमिक हिन्दी शिक्षकों और हिन्दी प्रचारकों के लिए समूचे असम राज्य में लगभग 150 नवीकरण पाठ्यक्रम (हिन्दी शिक्षक पुनश्चर्या) आयोजित कर चुका है। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, गुवाहाटी केंद्र ने असम में राजकीय हिन्दी शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय की स्थापना कर असम राज्य के अप्रशिक्षित हिन्दी शिक्षकों को प्रशिक्षित करने का कार्य भी किया है। यह संस्थान असम राज्य के उन विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति देता है जो प्रवीण, पारंगत, निष्णात आदि कोर्स के लिए आगरा जाते हैं, तथा प्रतिनियुक्ति पर जाने वाले हिन्दी शिक्षकों को भी इस संस्थान द्वारा स्टाइपेन्ड दिया जाता है।
      आज भूमंडलीकरण के दौर में जबकि हर तरह की सीमाओं का विलयन हो चुका है तो पूर्वोत्तर भारत में स्थित असम जो एक अहिन्दी प्रदेश है, में भी हिन्दी बोलने वालों की संख्या बढ़ी है और हिन्दी की प्रयोजनीयता में वृद्धि के कारण यहाँ दिन-ब-दिन हिन्दी की परिधि का विस्तार होता जा रहा है। इस संदर्भ में जनसंचार के माध्यमों का योगदान अनौपचारिक रूप से ही सही लेकिन महत्वपूर्ण है। हिन्दी सिनेमा, फिल्मी गीतों एवं धारावाहिकों ने असम प्रदेश में हिन्दी समझने और बोलने वालों की संख्या में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि की है। दूसरी ओर औपचारिक दृष्टि से भी असम के विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में हिन्दी-शिक्षण काफी मात्रा में हो रही है। केवल पूर्वोत्तर भारत के छात्र ही नहीं, बल्कि भारतवर्ष के विभिन्न कोनों से छात्र असम आकर हिन्दी की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं तथा हिन्दी साहित्य और भाषा पर शोध कार्य कर रहे हैं।
      पूर्वोत्तर भारत में ऐसी कई संस्थाएँ हैं जो हिन्दी के प्रचार-प्रसार में लगी हुई है, जैसे –
  • असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, गुवाहाटी
  • केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, गुवाहाटी
  • असम राज्य राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, जोरहाट
  • राजकीय हिन्दी शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय, गुवाहाटी
  • राजकीय हिन्दी शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान, आइज़ोल, मिज़ोरम सरकार
  • राजकीय हिन्दी शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान, दीमापुर, नागालैंड सरकार
  • राजकीय हिन्दी शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान, नॉर्थ गुवाहाटी, असम सरकार
  • राजकीय हिन्दी शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान, इंफाल महाविद्यालय, मनीपुर यूनिवर्सिटी
  • राजभाषाविभाग, गृहमंत्रालय, असम सरकार
       निष्कर्ष रूप में इतना कहा जा सकता है कि – देश में सर्वाधिक बोलने वाली और समझने वाली भाषा हिन्दी है। सारे देश में संपर्क भाषा के रूप में यह सालों से सेवा करती आ रही है। हिन्दी भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का वाहक है। सिद्धों, जैनों, नाथ-मुनियों, संतों सूफियों, रामभक्त-कृष्णभक्त कवियों से लेकर रीतिकाल, आधुनिक कालीन साहित्य का जो सागर हिन्दी ने हमको  उपलब्ध कराया है, उस सागर में मोती चुनते-चुनते एक सुखद जीवन हम जी सकते हैं। हिन्दी की खासियत यह भी है कि यह दूसरी भाषाओं के शब्दों को सादर ग्रहण करती है। हिन्दी भाषा का शब्दभंडार सैकड़ों विदेशी शब्दों से भरा हुआ है। हिन्दी के जरिये हमारी भाषा के शब्द चलते रहेंगे। विद्यालय हो, महाविद्यालय हो या विश्वविद्यालय, हिन्दी के विद्यार्थियों के रोजगार के स्थल होते ही हैं। इतना ही नहीं, सरकारी कार्यालयों में भी टंकक, अनुवादक, अधिकारी आदि की पदवी भी होती है। इसके बावजूद सरकारी कार्यालयों के जो कर्मचारी हिन्दी में निपुण होते हैं, उनके लिए अन्य सुविधाएं भी होती हैं। नौजवान देश के भविष्य होते हैं। वे आज हिन्दी की इन्हीं गुणों के कारण हिन्दी पढ़ने के लिए आगे आ रहे हैं।
      राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हिन्दी को राजभाषा बनाने के लिए हिन्दी को अनिवार्य माना तथा अहिंदी भाषा प्रांतों में राजभाषा प्रचार समितियों का जाल बिछा दिया था। उन्होंने कहा था कि आज कि पहली और सबसे बड़ी समाज सेवा यह है कि हम अपनी देशीय भाषाओं की ओर मुड़ें तथा हिन्दी को राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करें।
‘कोई भी देश सच्चे अर्थों में तब तक स्वतंत्र नहीं है, जब तक वह अपनी भाषा में नहीं बोलता।’                                        -मोहनदास करमचंद गांधी
                          सहायक ग्रंथ
  1. डॉ॰ क्षीरदा कुमार शइकीया (संपा॰), द्विभाषी राष्ट्रसेवक , असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, ISSN 2321-4945.
  2. मनोरमा गुप्ता (संपा॰), हिन्दी शिक्षण : विविध आयाम, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा,
  3. समन्वय पूर्वोत्तर, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, शिलांग, ISSN 2231-6132.
शोधार्थी, हिन्दी विभाग
 तेजपुर विश्वविद्यालय
ई॰ मेल – jazo_15@yahoo.co.in
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