कोलकाता में ट्राम: डेढ़ सौ साल का सुहाना सफर

उमेश कुमार राय
train

पूरी स्पीड में है ट्राम।
खाती है हचकै पै हचकै
सटता है बदन से बदन
पसीने से लथपथ।
हिन्दी के मुर्धन्य कवि बाबा नागार्जुन ने यह कविता उस वक्त लिखी थी जब वे कोलकाता में आये हुए थे। ये वो दौर था जब ट्राम महानगर की जीवनरेखा हुआ करती थी। आज ट्राम महानगर की जीवनरेखा तो नहीं है लेकिन इस शहर को एक अलग पहचान जरूर दे रही है।
लगभग 142 साल पहले महानगर में कदम रखने वाली ट्राम के अस्तित्व पर कई बार संकट के घनघोर बादल मंडराये लेकिन ट्राम का सफर नहीं रुका। ट्राम का यह लम्बा सफर बेहद रोमांचक है।
कोलकाता में ट्राम सेवा की नींव पड़ी थी वर्ष 1873 में। उस वक्त देश में अंग्रेजी हुकूमत थी और कोलकाता राजधानी हुआ करती थी। वायसराय लॉर्ड कर्जन ने कोलकाता में ट्राम सेवा शुरू करने की परिकल्पना की थी लंदन की तर्ज पर। लंदन में 23 मार्च 1861 को पहली बार घोड़े से चलने वाली ट्राम सेवा शुरू की गयी थी। इसके 12 वर्षों के बाद यानी 1873 में 24 फरवरी को महानगर में सियालदह से अरमेनियन स्ट्रीट घाट तक 3.9 किलोमीटर लंबी पटरियाँ बिछायी गयीं। लंदन से ट्रामें मंगवायी गयीं और यहाँ ट्राम सेवा शुरू की गयी। उस वक्त इक्का के अलावा यातायात के और कोई साधन नहीं था महानगर में। पहला प्रयास विफल रहा और 24 नवम्बर को यह सेवा बंद कर दी गयी। लगभग 3 वर्षों तक अंग्रेज मंत्रणा करते रहे कि आखिर यहाँ ट्राम सर्विस को किस प्रकार सफल बनाया जाये। इसके लिए जरूरी था एक पृथक संस्था तैयार करना सो ऐसा ही किया गया। वर्ष 1880 में कलकत्ता ट्रामवेज कंपनी लिमिटेड नाम की एक संस्था का गठन किया गया और दुबारा सियालदह से बहूबाजार, डलहौजी स्क्वायर और स्ट्रैंड रोड होते हुए अरमेनियन स्ट्रीट घाट तक पटरियाँ बिछायी गयीं। 1 नवंबर को तत्कालीन वायसराय लॉर्ड रीपन ने इस रूट का उद्घाटन किया और यहाँ घोड़ा चालित ट्राम सेवा का आगाज हुआ। यह रूट इतना सफल रहा कि एक के बाद एक कई रूट तैयार किये गये और विदेश से ट्रामें मंगवायी गयीं। 19वीं शताब्दी के अंत तक महानगर में 166 ट्रामें चलने लगीं जिनके लिए 1000 घोड़े रखे गये थे।
लंदन में ट्राम सेवा का विकास हुआ और वर्ष 1901 में घोड़ों के बजाय बिजली से ट्रामें चलनी शुरू हुईं फिर भला कोलकाता (पहले कलकत्ता) पीछे कैसे रहता। एक साल बाद ही यानी 1902 में 27 मार्च को धर्मतल्ला से खिदिरपुर के बीच पहली बार बिजली से ट्राम चलायी गयी। उस वक्त कोलकाता एशिया का एक मात्र शहर था जहाँ बिजली से ट्राम चलनी शुरू हुई थी। करीबन 3 वर्षों के बाद हावड़ा में भी बिजली चालित ट्राम सेवा का आगाज हुआ।
इसके बाद महानगर में एक के बाद नये-नये रूट बनते गये और इसका विस्तार होता गया। चूंकि उस वक्त बसें नहीं चलती थीं लिहाजा ट्रामें खूब फूली-फली। वर्ष 1943 तक महानगर में 67.59 किलोमीटर तक ट्राम लाइन बिछ गयी थीं। इसी साल हावड़ा और कोलकाता को ट्राम से जोड़ा गया। चूंकि अंग्रेजों ने अपनी सहूलियत के लिए ट्रामों का परिचालन शुरू किया था इसलिए उन्होंने ट्राम में दो डिब्बे लगाये। इंजन के साथ लगा पहला डिब्बा यानी फर्स्ट क्लास अपने लिए और दूसरा डिब्बा यानी सेकेंड क्लास भारतीयों के लिए। फर्स्ट क्लास में भारतीयों के सफर करने पर प्रतिबंध था। फर्स्ट क्लास का भाड़ा सेकेंड क्लास से कुछ अधिक था क्योंकि फर्स्ट क्लास में पंखे लगे होते थे।
सन् 1947 में देश आजाद हुआ। शासन की बागडोर भारतीयों के हाथों में आयी। इसके बाद भी तकरीबन 1 दशक तक ट्राम का विस्तार-विकास होता रहा। मानिकतल्ला-उल्टाडांगा, बेहला-जोका समेत कई नये रूट अस्तित्व में आये। ट्रामों की संख्या भी बढ़ी लेकिन इसके साथ ही यातायात के दूसरे साधनों का भी प्रवेश होने लगा। धीरे-धीरे बसों, निजी वाहनों ने सड़कों को अपनी गिरफ्त में ले लिया।
यहाँ यह भी बताते चलें कि भारत के दूसरे शहरों में भी ट्राम सेवा शुरू हुई थी लेकिन वहाँ उनकी अकाल मृत्यु हो गयी। दिल्ली में वर्ष 1962 में ट्राम सर्विस ने दम तोड़ दिया और मुंबई में इसने वर्ष 1964 में अंतिम सांस ली। कानपुर में तो देश के आजाद होने से 14 वर्ष पहले ही ट्रामों का परिचालन बंद हो गया लेकिन कोलकाता भारत का एकमात्र शहर है जहाँ अब भी ट्रामें चल रही हैं।
बताया जाता है कि 50 के दशक के बाद महानगर में ट्रामों के खिलाफ आवाजें बुलंद होने लगीं और यहीं से शुरू हो गयी ट्राम के अस्तित्व की लड़ाई। मेट्रो रेलवे प्रोजेक्ट समेत अन्य परियोजनाओं के चलते कई रूटों में लम्बे समय तक ट्रामों का परिचालन ठप रहा। हावड़ा में तो ट्राम सेवा पूरी तरह बंद हो गयी और कोलकाता से हावड़ा जाने वाली ट्राम रूट भी खत्म कर दी गयी। पिछले ढाई दशकों में एक भी नया ट्राम रूट नहीं बना बल्कि कुछ रूट बंद जरूर हो गये।
ट्रामों की संख्या घटकर 257 पर आ गयी है जिनमें से रोजाना 125 ट्रामें सड़कों पर उतरती हैं। रोजाना महज 60-70 हजार लोग ही ट्राम से सफर करते हैं जो यातायात के दूसरे साधनों की तुलना में बहुत ही कम है।
अलबत्ता ट्राम से क्लास सिस्टम खत्म कर और एसी ट्राम बनाकर, ट्रामों को अत्याधुनिक रूप देकर इसके इतिहास में नये अध्याय जोड़े गये।
ट्राम यातायात का सबसे किफायती साधन है। इसमें न्यूनतम किराया महज 5 रुपये है। ट्राम बिजली से चलती है इस लिहाज से इससे प्रदूषण भी नहीं फैलता है। जानलेवा हादसों की बात करें तो इस मामले में भी यह सबसे सुरक्षित साधन है। बंगला साहित्य के नामचीन लेखक जीवनानंद दास की ट्राम के धक्के से मौत और पिछले वर्ष ट्राम के धक्के से 10 वाहनों के क्षतिग्रस्त होने की घटना के अलावा ट्राम से कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ।
इन तमाम खूबियों के बावजूद ट्राम सर्विस पूर्ववर्ती सरकार की प्राथमिकता सूची में जगह नहीं पा सकी। बहुत कम लोगों को पता होगा कि लंदन में ट्रामों का परिचालन वर्ष 1952 में बंद हो गया था और वर्ष 2000 तक यह बंद रहा। वहाँ के प्रशासन ने ट्राम को प्राथमिकता सूची में डाली और इसके बाद वहाँ फिर से ट्राम सेवा बहाल की गयी। लंदन के अलावा विश्व के 50 से अधिक देशों में ट्रामें चल रही हैं। जाहिर सी बात है कि इन देशों में ट्राम को लाभकारी परिसेवा में तब्दील किया जा चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि ट्राम के कायाकल्प के लिए दीर्घावधि योजनाएँ बनाने की जरूरत है।
पता चला है कि राज्य सरकार ने ट्राम सेवा को बहाल रखने के लिए कई परियोजनाएँ तैयार की हैं। इसके अंतर्गत रूटों को कांक्रीटाइज करना, बंद रूटों को खोलना और महानगर से सटे साल्टलेक में नये ट्राम रूट बनाना शामिल है। कलकत्ता ट्रामवेज कंपनी लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर नीलांजन शांडिल्य कहते हैं, जिन रूटों में ट्राम सेवा बंद हैं उन्हें पुनः चालू किया जायेगा जिनमें गरियाहाट-बालीगंज, बालीगंज-टालीगंज, जोका-बेहला आदि रूट शामिल हैं। इसके अलावा ट्रामों को अत्याधुनिक चेहरा भी दिया जा रहा है। पहले चरण में 25 ट्रामों का कायाकल्प किया गया है। नयी एसी ट्रामें भी बनायी जा रही हैं। वे आगे कहते हैं, कुछ रूटों को पक्का किया गया है और दूसरे रूटों में भी शीघ्र ही काम शुरू होगा। सब्सिडी के सवाल पर शांडिल्य ने कहा, हमनें सब्सिडी में 5 फीसदी की कटौती की है। ट्राम सर्विस को आर्थिक रूप से स्वनिर्भर होने में वक्त लगेगा। इसके लिए हर संभव प्रयास किया जा रहा है।
राज्य सरकार की ओर से किये जा रहे प्रयास अगर सही राह पकड़ लें तो उम्मीद की जानी चाहिए कि ट्राम का यह सुहाना सफर यों ही जारी रहेगा और आने वाली पीढ़ी ट्रामों को किताबों में नहीं पढ़ेगी बल्कि अपनी आँखों से देखेगी।
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ट्राम का सफरनामा
24 फरवरी 1873 – सियालदह से अरमेनियन स्ट्रीट घाट तक ट्राम सेवा शुरू की गयी।
1873 – 24 नवम्बर को रूट बंद कर दी गयी।
1880 – 22 दिसंबर को कलकत्ता ट्रामवेज कंपनी लिमिटेड का गठन। सियालदह से अरमेनियन स्ट्रीट घाट तक ट्राम लाइनें बिछायी गयीं। इसका उद्घाटन वायसराय लॉर्ड रीपन ने किया था पहली नवंबर को।
1882 – इस्टीम इंजिन चालित ट्राम शुरू की गयी।
1902 – 27 मार्च को धर्मतल्ला से खिदिरपुर तक पहली बार इलेक्ट्रानिक ट्राम चलायी गयी और एशिया में कोलकाता पहला शहर बन गया।
1927 – सीटीसी का पावर स्टेशन बंद। सीईएससी से बिजली लेकर चलायी गयी ट्राम।
1943 – कलकत्ता और हावड़ा को ट्राम रूट से जोड़ा गया।
1985 – 17 अप्रैल को मानिकतल्ला से उल्टाडांगा तक नयी ट्राम लाइन बिछायी गयी।
वर्ष 1986 – 31 दिसंबर को बेहला से जोका तक ट्राम लाइन बिछायी गयी।
2013 – 15 अगस्त को ट्राम से क्लास सिस्टम खत्म कर दिया गया।
2013 – 19 जून को वातानुकूलित (एयर कंडिशन्ड) ट्राम सेवा शुरू की गयी।
2014 – 30 सितम्बर को कोलकाता ट्राम को मिला अपना म्यूजियम।
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