शब्द की सीमा_आवारा!

limit of word

कुछ स्थिरता मिली होती,
जहन में जंग हैं,
सवालो की।
रुद्रन को है प्याशी,
आँखे,
एक ज़माने से।
कव्वाली की ताली सी,
हर रोज बदलती हैं,
कुछ टूट गया हैं बितर,
क्या यही उगलती है?
कल रातें बिस्तर में,
करवट बदलती थी,
कुछ अटक गया दिल में?
यूँ नींद सुलगती थी।
जग सो गया लेकिन,
मेरी आँख न सोयी थी,
जी भर के आता था,
जबान थार सी होई थी।
कुछ शब्द कहे जाने,
दिल से दिलदारो ने,
जो छूट गयी घड़ियां, उनके
खरीददारो ने।
बड़े नाप तोल किये सजनी,
दिलके बाजारों में।
दिलकी बोली करी फीकी,
उन्ही प्रेम के मारो ने।
क्या डूबने की चाहत,
दिलमे समायी है।
या भूल हुयी हमसे,
जो बात 'आवारा' हो आयी हैं।

राकेश कुमार वर्मा
Share on Google Plus

About EduPub

0 comments:

Post a Comment