***चुन्नू का बचपन***(बालकहानी)

CHILFREN STORIES

शालिनी साहू
ऊँचाहार,रायबरेली
हे कमीने!! आयूष-दीदी देखो चुन्नू हमें गाली दे रहा है!सुधा-चुन्नू गन्दी बात!!अच्छे बच्चे गाली नहीं देते ना!!और तुम तो बेस्ट बॉय हो ना!!तब फिर गन्दी बात क्यूँ??
चुन्नू-ताली मोसी अब ते हम नहीं तहेंगें!!
चुन्नू की ये तोतली जुबान सुधा का मन मोह लेती और उसे सीने से आलिंगन बद्ध कर लेती!पुचकारती,दुलराती बहुत सा प्यार करती!चुन्नू की अटखेलियाँ उसे बहुत भाती!!
चुन्नू महज चार साल का बाल कृष्णा जैसा है एकदम!
मॉसी के काम में चुन्नू खूब हाथ बँटाता!
....सुधा ने कहा चुन्नू बाबू-पानी की बोतल भरकर फ्रिज में लगा दो!
तब से चुन्नू हर रोज सारी बोतलें लगाता!
और अपनी तोतली जुबान में पूछता-मोसी ताली बोतल भलना है ना!तेखो हमने सब भल दी है!
बचपन भी कितना सुखद होता है ना कोई चिन्ता ना कोई फिक्र बस...मजे से खाना और घूमना जो बड़े होने के बाद खत्म होता नजर आता है...
चुन्नू को मोटू-पतलू वाला कुरकुरे और चाउमीन बहुत पसन्द है!और बस खाने में मगन चुन्नू अपनी मम्मी को भूल गया था..
...कहते हैं ना..खायी मीठ की माई मीठ...
रूक गया मॉसी के पास!कहते हैं ना मॉसी भी तो माँ जैसी होती है!और सुधा के तो प्राण ही बसते अपने दुलारे में....
हर रोज अटखेलियाँ-...आज चुन्नू कह रहा था...नारियल पानी टकला हरामी!
सुनकर....सुधा !अरे चुन्नू ये सब कहाँ से हाँ!!गन्दी बात!!
चुन्नू-मोसी हमाले वहाँ सब बत्ते ऐता बोलते हैं....नहीं..गन्दी बात होती है चुन्नू!!अत्ता मोसी अब से नहीं!!
लुक्का-छिप्पी का भी खेल चुन्नू दिन भर खेलता घर में...कभी-कभी जब वह अकेले ही अपने मन से ही बात करके अपने में खेलता तो सुधा..उसे देखकर हँसती!!देखो अकेले में भी कितना मजा है... पुलिस का डण्डा,मुर्गी का अण्डा ,कुत्ते की पूँछ....बन गया 'क' से कबूतर...
रोते हुए को हँसाता चुन्नू का बाल मन!
सुधा भी रिझती,खीजती और खूब प्यार करती!... आज चुन्नू ने रिशी की किताब फाड़ दी!तब शिकायत लेकर रिशी सुधा के पास आया अब!!चुन्नू को लगा कि मोसी बहुत मारेंगी...तब आकर कहने लगा मोसी हमने तिताब नहीं फाली है हम पेद पलट रहे ते तो वह फट गयी!!अब सुधा करती भी क्या किताब तो फट चुकी थी और चुन्नू को मारने पर वाुस भी तो नहीं आने वाली....रिशी को किसी तरह खैर समझा दिया!...चुन्नू की गलती होने पर भी वह बड़े बच्चों को ही डाँटती यह कहकर कि वह तो अभी छोटा है उसको समझ नहीं है....
पड़ोस का साल भर का बाबू...भी भागा चला आता नन्हें कदमों से ना उसे मोटरगाड़ी का डर ना चोट लगने का...क्योंकि वह तो निश्छल बालमन हैं...न कोई फिक्र ना कोई तनाव...
सुधा हर रोज चुन्नू को नयी-नयी कहानियाँ सुनाती...नहलाती..सजाती सवाँरती और गले से लगाती....इनसब की अटखेलियों में उसे अपना बचपन पल भर के लिए मानों सामने आ जाता हो ऐसा लगता हो...उधर चुन्नू फिर शुरू...ए,बी,सी,डी,ई,एफ,जी उसमें निकले पण्डित जी.......सुधा को अपनी बोली याद आ गयी!!अरे वाह!चुन्नू!!
...सुबह-सुबह चुन्नू की मम्मी का फोन आया....हैलो मम्मी केती हो...नमत्ते मम्मी!!कब आओगी!!कल आऊँगी..चुन्नू!!अत्ता मम्मी!अब चुन्नू को तो जाना ही है अपने घर ये सुनकर..सुधा की आँखें कुछ नम हो चली!कि चुन्नू चला जायेगा तो कौन दिन भर मासी-मासी करेगा!!फिर कहाँ वो अटखेली!पूरा घर काटने को दौड़ेगा..फ्रिज में पानी की बोतल कौन लगायेगा..ये कम तो वह बखूबी करता था...सुधा का मन मन ही मन आहत हो रहा था!
सुधा ने चुन्नू से कहा चुन्नू रूक जाओ-
लेकिन चुन्नू बस यही..मोती यहाँ पापा नहीं हैं...क्योंकि चुन्नू अपनी मम्मी से भी ज्यादा पापा का दुलारा है...
फिर बालमन कहाँ रूकने वाला...गीत गाने लगा...अच्छे बत्ते मंजन करते ,मंजन कलके कुल्ला तरते कुल्ला तरते रोज नहाते रोज नहाकर पढ़ने जाते!...गीत से फिर सुधा के होंठों पर मुस्कान वापस ला देता....
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